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क्या हमारे प्रजानतंत्र में सवाल पूछने की कला खोती जा रही है?

तर्कसंगत

Image Credits: Free Press Journal/Samachar 4 Media

May 6, 2019

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निष्ठुर आलोचना और स्वतंत्र विचार,यह दोनो क्रांतिकारी सोच के दो अहम लक्षण हैं।”-भगत सिंह

 

भारत की स्वतंत्रता से भी वर्षों पूर्व महान क्रांतिकारी भगत सिंह ने कहा था की भारत का हर नागरिक अपने देश की सत्ता से तीखे और अहम सवाल करे उसके छोटे से छोटे फैसले पर सवालात करे और हिसाब माँगे और कड़ी आलोचना करने से ना घबराए यही एक बेहतर और प्रगतिशील समाज व मुल्क की स्थापना करता है.

कुछ साल पहले हमारे देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी लंदन में प्रसून जोशी को इंटरव्यू देते समय कहा:

“मैं मानता हूं आलोचना तो लोकतंत्र की सुंदरता है. अगर लोकतंत्र में विरोध नही होता या आलोचना नही होती तो वह लोकतंत्र नही हो सकता,आप मोदी सरकार की भी खूब आलोचना करे क्योंकि ‘क्रिटिसिस्म’ से ही तप कर ‘डेमोक्रेसी’ पनप्ती है और मेरी सरकार की आलोचना मेरा सौभाग्य है.”

हालांकि इस कथन से करनी में काफी अंतर है क्योंकि उन्होने आज तक एक भी प्रेस कांफ्रेंस नही की,जनता व मीडिया के सवालों का सीधे तौर पर सामना नही किया है और लोकतंत्र में सवालों और आलोचना का वह माहौल नही बना पाये हैं.

 

नागरिक सवालों का अधिकार खो रहे हैं  

नागरिक भी आज कल रोष के बावजूद सरकार से सवाल नही करते या कर पाने का कोई माध्यम ही नही है, शायद उनके सावलो के लिये मौजूदा लोकतंत्र में जगह ही नही है. अगर वे सवाल नही कर पा रहे हैं तो कम से कम अपनी पकड़ ना छोड़े, हो सकता है वे किसी राजनीतिक पार्टी के समर्थक हो और उनकी अपनी सरकार से सवाल पूछने में दिलचस्पी ना हो और वे अपने सरकार को अपने सवाल से नाराज़ नही कर सकते, तो उन्हे सतर्क हो जाना चाहिए की वे ऐसे फैन ना बने और खुद ही अधिकारों का सरेंडर ना करें ये आप से धीरे धीरे आपकी नागरिकता छीन लेगा और फिर आपके अधिकार और जब आप के पास यह कुछ नही होगा तो आप देशभक्त भी कैसे होंगे? सच्चा नागरिक और सच्चा देशभक्त वही है जो अपने सवाल पूछने के अधिकार को ज़िन्दा रखे. अपनी सरकार की लगाम असल में देश के नागरिक के हाथ ही होती है. तो नागरिक बनें समर्थक नही और देश के लोकतंत्र में भाग लें.

 

सवाल पूछने का डर

लोगों में सवाल पूछने का डर है की कहीं वे अपने सवालों से देशद्रोही, नक्सल या कम्युनिस्ट ना बता दिए जाएं और इसी तरह सवाल और आलोचना लोकतंत्र की हवा से ग़ायब होने लगे हैं और जब लोकतंत्र में यह ना दिखे तो समझ जाना चाहिए तानाशाही के काले बादल सर पर हैं. इस कारण सिर्फ लोकतंत्र ही नही देश का वजूद भी खतरे में है क्योंकि यह माहौल भारत के विचार के ही विरुद्ध है.

राजेश जोशी ने अपनी कविता में कहा है-”जो गुण नहीं गाएँगे वे मारे जाएंगे” और यह इस वातावरण को खूब दर्शाता है. हर नागरिक का अधिकार है की वह रोज़ सवाल पूछे,गेहरे सवाल,तीखे सवाल,आलोचनाओं और कटाक्ष से भरे सवाल इससे परहेज ना करे. सरकार के विरुद्ध किसी भी तरह का प्रश्न उठाना हमारे देश के विरुद्ध प्रश्न उठाना नही है इसमे फर्क है. बल्कि यह दर्शाता है की आप अपने मुल्क को लेकर कितने चिंतित हैं. हमारे नागरिकों को सीखना होगा ‘द आर्ट ऑफ़ डिसेंट’. जब आप सवाल नही करते तो आप अपनी सरकार से कट जाते हैं और अपनी ओथोरिटी का इस्तेमाल नही करते हैं परिणाम में ओथोरिटी खो देते हैं और कारण है ‘कम्युनिकेशन गैप’. तो अपने सवाल को विपक्ष या मीडिया पर न छोड़े विपक्ष पहले ही मजबूर और बेसहारा नज़र आता है और मीडिया अपनी नैतिकता खो चुका है. तो सही यही होगा की हम अपनी वफ़ादारी लोकतंत्र के प्रति दिखाय ना की सरकार के प्रति.

 

सवाल पूछने की कला

सवाल पूछ्ने की कला में एक महत्वपूर्ण स्थान है मुद्दों का,सवाल हमेशा मुद्दों पर ही किये जाने चाहिये क्योंकि जैसे सवाल आजकल सरकार के प्रतिनिधियों से किये जा रहे हैं उनके- सोने की, खाने पीने की आदतों के बारे में ये सब मुद्दों से कोसो दूर हैं और इससे बचा जाए इससे आपको कोई फायदा नही होगा बलकी आपके सामने ऐसी तस्वीर प्रस्तुत की जाएगी जो पूजनीय है आपको इनसे सवाल नही इनसे बातचीत दिखाई जा रही है. दरअसल सवाल पूछने से मतलब है हिसाब माँगना इसमे सेंसरशिप नही होनी चाहिये. यह सरकार के काम में किसी तरह का दखल नही है बल्कि कंटुनियुस औडिटिन्ग है. तो इसे नकारात्मक संदर्भ में ना देखा जाए. बाकी तो मौजूदा स्तिथि इसे लेकर खराब ही है आज कल मीडिया अपनी ज़िम्मेदारी सही तरीके से नही निभा रहा है, पार्लियामेंट में विपक्ष संख्या बल से ही काफी कमज़ोर है तो आम जनता पर सवालों और आलोचनाओं की ज़िम्मेदारी और बढती है इस अधिकार को ना जाने दें यह सरकार भी आपकी है और देश भी आप ही का है.

 

लेखक: शिवम अरोड़ा 

 

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