पर्यावरण

15 साल बाद सलवा जुडूम से विस्थापित 25 आदिवासी परिवार घर लौटे

तर्कसंगत

May 6, 2019

SHARES

राजू राणा जो वर्तमान में उन आंतरिक रूप से विस्थापित लोगों (IDP) की मदद कर रहे हैं जो सलवा जुडूम हिंसा की वजह से छत्तीसगढ़ भाग गए थे, बताते हैं “सलवा जुडूम के डर से, वे लोग 2006 में छत्तीसगढ़ भाग गए थे. पुलिस ने सोचा कि वे माओवादी की सहायता करते थे और नक्सली मानते थे कि वे पुलिस के साथ हैं. उन पर हमला किया गया, उनके घरों को जला दिया गया और इस हिंसा में कई लोग मारे भी गए थे.”

 

सलवा जुडूम

‘सलवा जुडूम’ – एक गोंडी शब्द है जिसका मतलब है “शांति मार्च” या “पवित्रता से शिकार”. यह 2005 के अंत में क्षेत्र में नक्सली गतिविधि पर रोक लगाने के उद्देश्य से एक उग्रवाद-विरोधी बल के रूप में शुरू किया गया था. इस आंदोलन में स्थानीय आदिवासियों और युवाओं की भागीदारी देखी गई जिन्हें ‘कोया कमांडो ’और ‘विशेष पुलिस अधिकारियों’ (SPO) के रूप में भर्ती किया गया था. राज्य सरकार ने उन्हें  नक्सली गतिविधि का मुकाबला करने के लिए हथियार भी दिए थे.

सलवा जुडूम की हिंसा 2011 तक चली जब उच्चतम न्यायालय ने इस जागरूकता समूह रोक लगा दी थी. हालाँकि, आंदोलन ने एक खूनी नरसंहार छोड़ दिया, गांवों को जला दिया गया और हजारों को उनके घर से बाहर कर दिया गया जिन्हें मजबूरन पड़ोसी राज्य तेलंगाना और आंध्र प्रदेश में भागना पड़ा. जागरुकता समूह पर आदिवासी महिलाओं के साथ बलात्कार सहित कई मानवाधिकारों के उल्लंघन का आरोप लगाए गये थे.

 

घर वापसी 

डेक्कन हेराल्ड ने बताया “अपने लोगों को वापस लाने का काम कांग्रेस नई की सरकार ने  दिसंबर 2018 में कार्यभार संभालने के बाद शुरू किया. अधिकारी और अनौपचारिक दोनों तरह के लोग इसमें लगे हुए थे.”

CGnet swara (Voice of Chattisgarh) के प्रमुख शुभ्रांशु चौधरी ने द लॉजिकल इंडियन से बताया कि प्रयास पहले से काफी गति में था, बता दे कि वे खुद इस प्रक्रिया में लगे हुए हैं.

The New Peace Process दो साल पुरानी पहल है जिसकी शुरुआत जो ‘सर्वो आदिवासी समाज’ ने की थी इसमें दर्जनों आदिवासी संगठन शामिल हैं जो इन परिवारों के पुनर्वास में मदद कर रही हैं. अक्टूबर 2018 में छत्तीसगढ़ से जगदलपुर तक पद-यात्रा आयोजित की गई. जिसके बाद फरवरी-मार्च में इस साल के शुरू में जगदलपुर से रायपुर तक 300 किलोमीटर की साइकिल यात्रा निकाली गई. बस्तर संवाद (एक विश्वास-निर्माण प्रक्रिया) के तीन संस्करण, जिसका अंतिम चरण 2 और 3 मार्च, 2018 को हुआ था, भी आयोजित किए गए हैं. इस तरह की पहल ने आदिवासियों को आगे आने और पूर्वजों के गाँव वापस लौटने की इच्छा व्यक्त करने के लिए प्रोत्साहित किया है.

 

अंतिम बार बस्तर संवाद 2 और 3 मार्च को आयोजित किया गया था जिसमें दो प्राथमिकताये थीं

  1.     30,000 IDP (लगभग 5,000 परिवार) का स्थानांतरण.
  2.    राजनीतिक कैदियों की रिहाई. जिसके लिए एक विशेष समिति बनाई गई है जिसका नेतृत्व सुप्रीम कोर्ट    के सेवानिवृत्त जज न्यायमूर्ति ए.के. पटनायक कर रहे हैं. छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने एक संवाददाता सम्मेलन में बताया कि इस उद्देश्य के लिए एक विशेष नीति बनाई है लेकिन इसे 2019 के लोकसभा चुनाव के अंत तक स्थगित कर दिया गया है.

ये ग्रामीण पिछले 15 वर्षों से आंध्र प्रदेश में दिहाड़ी मजदूर के रूप में काम कर रहे हैं. उनमें से कुछ ने वन भूमि पर खेती का अभ्यास किया. वे कच्चे झोंपड़ियों में रहते हैं और उन्हें कई मौकों पर स्थानीय पुलिस द्वारा छत्तीसगढ़ वापस जाने के लिए कहा गया है. राजू राणा, जो चौधरी के CGnet से जुड़े हैं और वर्तमान में इन लोगों को स्थानांतरित करने और पुनर्वास में मदद कर रहे हैं, बताते हैं “उनकी बस्तियां 12-13 बार जल चुकी हैं लेकिन वे फिर भी उसी जगह पर वापस आ जाते हैं क्यूंकि उनके पास कोई दूसरी जगह नहीं है. उनके पास पहचान के उचित दस्तावेजों की कमी है और यहां तक ​​कि जाति प्रमाण पत्र भी नहीं है. उन्हें छत्तीसगढ़ में आदिवासी माना जाता था लेकिन आंध्र प्रदेश में उन्हें आदिवासी नहीं माना जाता है.”

 

 

आदिवासियों की मदद करने वाले CG Basket, ने 30 अप्रैल को तेलंगाना में आदिवासियों पर मंडरा रहे खतरे के बारे में बताया.

“आज सुबह वन अधिकारियों ने तेलंगाना में भद्राद्रि कोटादुडेम जिले के मुल्कुलपल्ली ब्लॉक के रसानुगुडेम गांव का दौरा किया और सभी 25 आईडीपी परिवारों को छत्तीसगढ़ वापस जाने के लिए कहा. पिछले महीने भी इसी तरह के अधिकारी पुलिस आए थे और उन्होंने आईडीपी के 58 घरों को तोड़ दिया और इसी तरह के आदेश दिए. हमने सुना है कि ये दौरे आने वाले महीनों में बढ़ सकते हैं.”

चौधरी बताते हैं “हालांकि, सभी आदिवासी वापस नहीं लौटना चाहते. आईडीपी के अधिकांश लोग अपने घर लौटने पर प्रतिशोध और हमले का डर रखते हैं. उनके कुछ पुश्तैनी गाँव छत्तीसगढ़ के अंदरूनी हिस्सों में हैं और उन्हें अपनी सुरक्षा का डर है. वे वैकल्पिक भूमि पाने के लिए 2006 के वन अधिकार अधिनियम के प्रावधानों के तहत अपील कर रहे हैं.”

 

आगे का मार्ग

यदि उन्हें वैकल्पिक जमीन मिलती है तो योजना यह है कि इन विस्थापित परिवारों को महात्मा गांधी की 150 वीं जयंती के उपलक्ष्य में एक नए गाँव, “गांधी 150” के निर्माण के लिए आयोजित किया जाएगा जहाँ उन्हें अपनी सुरक्षा के लिए कोई खतरा नहीं होगा.

starindia.org से जुड़े डॉ हनीफ बताते हैं, “उनमें से कई विस्थापित परिवार ने अपना नाम बदल लिया है और नई पहचान बनाई है. उनकी अगली पीढ़ी आंध्र प्रदेश में बढ़ी हुई है और अपनी पैतृक भाषा या छत्तीसगढ़ के अतीत के बारे में नहीं जानती है.”

हालांकि, उन लोगों के लिए ये रास्ता आसान नहीं है. जो अपने पैतृक गांव वापस लौट आए हैं उनके पास पैसों का आभाव है, रहने की जगह नहीं है और नक्सलियों से भी खतरा है. हालांकि स्थानीय लोग उनका स्वागत कर रहे हैं लेकिन वापसी में कोई खुशी की बात नहीं है. कई और आदिवासी अब वापस लौटने की उम्मीद कर रहे हैं. अपने छोड़े गए खेतों पर काम कर रहे हैं, जो 15 वर्षों से ऐसे ही बंजर पड़े हैं.

 

 

वन अधिकार अधिनियम 2006 और आई.डी.पी.

2006 के वन अधिकार अधिनियम की धारा 3.1 (m) में बताया गया है कि दिसंबर 2005 के 13 वें दिन से पहले, यदि अनुसूचित जनजाति या अन्य पारंपरिक वनवासी किसी भी विवरण की वन भूमि से अवैध रूप से बेदखल या विस्थापित होते हैं और पुनर्वास के लिए उनके पास कोई कानूनी अधिकार नहीं है, तो उन्हें वैकल्पिक भूमि और in-situ (संसाधन के रूप में भूमि का उपयोग करके पुनर्विकास) का अधिकार है.

आंध्र प्रदेश और तेलंगाना के विभिन्न हिस्सों में रहने वाले आईडीपी अब इस तहत की अपील करते हैं और ‘वैकल्पिक भूमि’ की तलाश करते हैं. हालांकि, फिर भी उनके सामने दो समस्याएं हैं:-

पहली, उन्हें आंध्र प्रदेश में आदिवासी के रूप में नहीं माना जाता है और तेलंगाना सरकार से किसी भी तरह का समर्थन प्राप्त नहीं हुआ है. अपनी पहचान स्थापित करने के लिए उनके पास उचित दस्तावेज भी नहीं हैं. डॉ हनीफ बताते हैं “चूंकि उनके गांवों में आग लगी थी इसलिए वे सब कुछ खो बैठे और अपने जीवन को बचाने के लिए भाग आये थे.” चौधरी बताते हैं कि जिनकी वे मदद कर रहे हैं उनमें से लगभग 99% आदिवासी लोगों के पास उचित दस्तावेजों या रहने का प्रमाण नहीं है. अपने प्रयासों में, उन्होंने दिल्ली में राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग से संपर्क किया है और उम्मीद जताई है कि सरकार का ध्यान वन अधिकार अधिनियम के इस विशेष खंड को लागू करने में मदद करेगा जो पहले कभी लागू नहीं किया गया.

दूसरी ये है कि उनका जबरन पलायन 13 दिसंबर, 2005 के बाद का था, जो 2006 के वन अधिकार अधिनियम के अंतर्गत नहीं आता है. इसलिए क्या आदिवासियों को वन अधिकार अधिनियम के तहत लाभ मिलेगा या नहीं यह एक मुख्य समस्या है.

 

 

तर्कसंगत के विचार

इन IDP का सफल पुनर्वास एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें पूरी तरह से लागू होने में कई महीने और साल भी लग सकते हैं. यह कुछ परिवारों की कहानी नहीं है बल्कि हजारों आदिवासी कि कहानी हैं जो अपना जीवन बचाने के लिए भाग गए और अब गुमनामी में अपने अतीत से बिछड़ गए हैं. 2019 के लोकसभा चुनावों की सुगबुगाहट के बीच उनकी चिंताओं को दूर करने के लिए राजनीतिक इच्छाशक्ति की जरूरत है. सवाल यह है कि क्या आदिवासियों की आवाज सुनी जाएगी या समय के साथ उन्हें भी भुला दिया जाएगा.

अपने विचारों को साझा करें

संबंधित लेख

लोड हो रहा है...