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सरकारी स्कूल को बंद होने से बचाने के लिए, यह शिक्षक अब पार्ट-टाइम बस चालक है

तर्कसंगत

May 6, 2019

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47 वर्षीय राजाराम कर्नाटक के उडुपी जिले के बराली गांव के छात्रों के लिए सिर्फ सरकारी शिक्षक नहीं हैं. वह स्कूल के बस ड्राइवर भी है. हर दिन, वह स्कूल शुरू होने से पहले, वह अपने-अपने घरों से छात्रों को साथ लेते है और फिर स्कूल खत्म होने पर उन्हें वापस घर भी छोड़ देते है.

कुल 24 वर्षों के शिक्षण अनुभव के साथ, राजाराम ने सरकारी उच्चतर प्राथमिक विद्यालय, बराली के छात्रों को गणित, विज्ञान और शारीरिक शिक्षा पढ़ाना शुरू किया, यह 14 साल से अधिक हो गया है. राजाराम ने तर्कसंगत से बात करते हुए कहा, पिछले कुछ सालों में, बहुत सारे बच्चों ने स्कूल छोड़ना शुरू कर दिया. एक समय पर तो स्कूल में केवल 60 बच्चे ही बचे थे. मैंने बच्चों का तेजी से स्कूल छोड़ने के पीछे का कारण जानने की कोशिश की”.

समस्या का खुलासा करते हुए राजाराम ने कहा कि स्कूल तक पक्की सड़क नहीं है. उन्होंने कहा, यह एक कीचड़ वाला रास्ता है जिसके माध्यम से बच्चों को स्कूल तक पहुंचने के लिए 6 किमी के वन क्षेत्र में चढ़ाई करना पड़ता था. बहुत सारे माता-पिता ने मुझे बताया कि वह अपने बच्चे को स्कूल भेजने में सुरक्षित महसूस नहीं करते हैं. मुझे इस बात की चिंता हो रही थी कि इतने बच्चों का स्कूल छोड़ने के कारण हमें स्कूल बंद भी करना पड़ सकता है”.

 

स्कूल छोड़ने वालो की संख्या में बढ़ोतरी देख, दुखी होकर राजाराम ने स्कूल से आने जाने के लिए एक बस लेने का सोचा. राजाराम ने कहा, “मैंने सोचा कि अगर छात्र को घर ले जाने और छोड़ने के लिए कोई बस होगी, तो माता-पिता अपने बच्चों को स्कूल भेजने के लिए अनिच्छुक नहीं होंगे. मैंने अन्य शिक्षकों को इस विचार का प्रस्ताव दिया और सभी को यह पसंद भी आया. लेकिन, एकमात्र समस्या बस के लिए थी, वह थी वित्त(पैसे) की व्यवस्था करना था”.

राजाराम स्कूल के कुछ पूर्व छात्रों के पास कुछ मदद के लिए गए.

राजाराम के अनुसार, पिछले साल, विजय, जो बेंगलुरु में एक प्रॉपर्टी मैनेजमेंट कंपनी चलाते हैं, ने अपने परिवार के सहयोग से एक बस प्राप्त करने के लिए स्कूल अधिकारियों को तीन लाख रुपये दिए.

राजाराम ने गर्व से कहा,हमें कुछ ही दिनों में 16 सीटर की एक छोटी बस मिल गई. कुछ अन्य दाताओं (donors) ने मासिक डीजल और बस के रखरखाव के लिए भुगतान करने पर सहमति व्यक्त की. अब, बाधा एक चालक को प्राप्त करने की थी, जब हमने कुछ ड्राइवरों से पूछा, तो उन्होंने कहा कि वह कम से कम 7,000-8,000 प्रति माह चार्ज करेंगे, जो दाताओं(donors) के लिए अधिक बोझ था. फिर मैंने स्वयं ही बस चलाने का फैसला किया”.

जल्द ही, राजाराम की दिनचर्या में भी बदलाव आया. राजाराम अब अपनी पिछली दिनचर्या से डेढ़ घंटा पहले सुबह 05:30 बजे उठते है. जिसमे वह अपनी सुबह की सैर से वापस आने के बाद, राजाराम अपना दैनिक पाठ्यक्रम पूरा करता है. सुबह 8 बजे, राजाराम अपने पहले बैच के छात्रों को लेने के लिए बस लेकर निकल जाते है.

 

 

सभी छात्रों को इकट्ठा करने के लिए चार यात्राएँ करनी पड़ती हैं. मैं सुबह 9:15 बजे स्कूल की अपनी अंतिम यात्रा समाप्त करता हूं. राजाराम ने कहा, स्कूल सुबह 9.30 बजे शुरू होता है और एक शिक्षक के रूप में यही से मेरा दिन भी शुरू होता है.

राजाराम, जिनकी व्हाट्सएप डिस्प्ले पिक्चर एक पीले रंग की बस है जिसमें स्कूल का नाम कन्नड़ में लिखा हुआ है, उन्होंने हमें बताया कि बस लेना एक अच्छा निर्णय था. पिछले एक साल में, हमारे स्कूल में सुधार हुआ है, जहाँ संख्या 60 से 90 छात्रों तक पहुंच गई है. स्कूल में अब 47 लड़कियां और 43 लड़के हैं. अब अभिभावक अपने बच्चों को हमारे स्कूल भेजने में सुरक्षित महसूस करते हैं.

जब उनसे पूछा गया कि सरकार स्कूल के लिए बस का पैसा क्यों नहीं दे रही है, तो उन्होंने कहा कि स्कूल को बच्चों की ड्रेस और किताबों के लिए ही सरकार से बहुत मुश्किल से पैसे मिलते हैं. सरकार “अतिरिक्त सुविधाओं” के लिए हमें (स्कूल को) पैसा नहीं देगी.

 

तर्कसंगत राजाराम के समर्पण की सराहना करता है.

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