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कारगिल युद्ध में देश के लिए दो गोली खाने वाले सतबीर सिंह दिल्ली में एक जूस की दुकान चलाते हैं

तर्कसंगत

May 7, 2019

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18 साल से ज्यादा समय हो चुका है जब उन्होंने आखिरी बार भारतीय सेना में काम किया था. 1999 के कारगिल युद्ध के दौरान उनका ज्यादातर सामान नष्ट हो गया था लेकिन सतबीर सिंह ने अपनी सेना की टोपी को संभालकर रखा है जिसे उन्होंने राजपुताना राइफल रेजिमेंट के लांस नायक के रूप में पहना था. आर्मी की टोपी पहनकर सतबीर सिंह अपने घर से केवल अपनी जूस की दुकान तक जाते हैं जो उत्तरी दिल्ली के मुखमेलपुर गांव में है.

अपनी छड़ी के सहारे 53 वर्षीय सतबीर सिंह अपनी जूस की दुकान तक जाते हैं. हालांकि, रिटायर्ड लांस नायक जिन्होंने एक बार फल-जूस विक्रेता होने के अलावा देश के लिए कई गोलियां भी खाईं, ने कई अन्य काम भी किए हैं. 1999 में तोलोलिंग पर्वत को जीतना एक उनके लिए एक कठिन लड़ाई थी, लेकिन सतबीर सिंह के व्यक्तिगत जीवन का संघर्ष उनके लिए ज्यादा मुश्किल था.

 

सतबीर सिंह की कहानी

तर्कसंगत से बात करते हुए, सतबीर सिंह ने अपने अध्यादेश और 19 साल से अधिकारियों के साथ हो रही अपने हक़ की लड़ाई के बारे में बताया जो 1999 के कारगिल युद्ध के बाद शुरू हुई. सिंह 1986 में भारतीय सेना की राजपूताना राइफल्स रेजिमेंट में शामिल हुए थे. अपने करियर की शुरुआत में, सिंह की कई अलग अलग जगहों पर तैनाती हुई. लेकिन कारगिल युद्ध उनके और अन्य सैनिकों के लिए सबसे कठिन चुनौती थी. जिसमें उन्होंने पूरे जोश और उत्साह से लड़ाई लड़ी थी.

 

 

एक सच्चे योद्धा की तरह, सतबीर ने अपनी कहानी सुनाते हुए बताया “जब मेरी रेजिमेंट को लड़ाई के बारे में सूचित किया गया तो हमें पहाड़ों पर चढ़ने के बारे में कठोर प्रशिक्षण दिया गया. 12 जून की आधी रात को भारत ने पाकिस्तानी सेना के खिलाफ हमला किया. सतबीर की टोली में 24 सैनिक शामिल थे जिनमें से सात मारे गए थे और अन्य गंभीर रूप से घायल थे. इस जीत को भारत के लिए एक महत्वपूर्ण बिंदु माना जाता है जिसने देश को लड़ाई जीतने के लिए प्रेरित किया था.”

सतबीर अपनी यूनिट में गाइड थे. वह फोरमैन का काम कर रहे थे और उन्होंने अपनी यूनिट को तीन उग्रवादियों के बारे में सूचना दी जो चट्टानों के पीछे छुपे थे. उन्होंने बताया “मैंने उन पर हैंड ग्रेनेड फेंका और गोलियों का एक गोला दाग दिया.” तीनों को सतबीर ने मार दिया था लेकिन एक और जो पीछे छुपा हुआ था उसने सतबीर की टोली पर गोलियों की बौछार कर दी. एक गोली सतबीर के टखने में लगी और दूसरी उनके घुटने के नीचे लगी जिसने आने वाले समय में उन्हें अपंग बना दिया. अगले 12 महीनों के लिए, सतबीर को दिल्ली के आर्मी अस्पताल में रहना पड़ा क्योंकि वह चलने में असमर्थ थे. इसके बाद, चलने में असमर्थता के कारण सतबीर को सेना से जल्दी सेवानिवृत्ति दे दी गई.

 

 

हक के लिए लड़ाई

कारगिल युद्ध में जो सिपाही या तो घायल थे या शहीद हो गए थे उनके परिवार को या तो पेट्रोल पंप लाइसेंस मिले थे या अपनी आजीविका के लिए एक एकड़ जमीन मिली थी. लेकिन सतबीर, जो अस्पताल के बिस्तर पर अपने दिन बिता रहे थे, उस फॉर्म को भरने में भी असमर्थ थे जो इन सुविधाओं के लिए जरुरी था. उनके दो बच्चे हैं, जो उस समय बहुत छोटे थे.

सतबीर ने बताया “मुझे पता चला कि कारगिल युद्ध के बाद जो लोग घायल हुए हैं, उन्हें जीविका के लिए एक एकड़ ज़मीन दी जा रही थी.” लगातार प्रयासों के बाद, केंद्र सरकार ने उन्हें एक एकड़ जमीन दी. उन्होंने बताया “मैंने उस जमीन में सब्जियां उगाना और बाजार में बेचना शुरू किया लेकिन 2006 में मजबूत राजनीतिक संबंधों वाले लोगों ने हंगामा किया और जमीन मुझसे छीन ली गई. न केवल इतना बल्कि पेट्रोल पंप का जो वादा किया था उसे भी कभी नहीं दिया.”

इतना ही नहीं लोगो ने उस सेवानिवृत्त सैनिक को धमकी भी दी और उसे इस्तेमाल करने से रोकने के लिए जमीन के चारों ओर दीवार भी बना दी. पिछले 18 वर्षों में, सतबीर ने अपने अधिकारों और अधिकारों के संबंध में विभिन्न नौकरशाही अधिकारियों को सैकड़ों पत्र लिखे हैं. हालांकि, अधिकांश पत्रों के जबाब नहीं आये हैं. उन्होंने पेट्रोल पंप लाइसेंस के आवंटन से संबंधित कई RTI (सूचना का अधिकार) की भी अपील की और बताया कि उनका खेत छीन लिया गया है. उन्होंने बताया “मेरे पास उन सभी प्रपत्रों और पत्रों की प्रतियां हैं जो बताते हैं कि मैं कुछ लाभों का हकदार हूं.”

 

जूस की दुकान

कागजी कार्रवाई में अनियमितताओं के कारण भी सतबीर को केवल अपने मासिक पेंशन का एक हिस्सा ही मिला है. उन्होंने बताया “मुझे हर महीने 40,000 रुपये मिलने वाले थे लेकिन मुझे पिछले महीनों से 22,900 रुपये ही मिल रहे हैं.” हालांकि, उनके रिकॉर्ड अधिकारी ने उन्हें आश्वासन दिया है कि उन्हें भविष्य में पूरी पेंशन राशि मिलने वाली है.

 

 

आज की दुनिया में 22,900 रुपये चार लोगों के परिवार को बनाए रखने के लिए पर्याप्त नहीं है. उनका बेटा कॉलेज में दूसरे वर्ष में पढ़ाई कर रहा है. सतबीर ने शुरुआत से ही अपने परिवार को बनाए रखने के लिए कई नौकरियों में काम करना शुरू कर दिया था. उन्होंने बताया “मैंने फल बेचे, पत्थर काटे और बिजली बोर्ड भी लगाए हैं.” अब वह सिर्फ अपने स्टोर पर जूस बेचते हैं जहां उनका छोटा बेटा उनकी मदद मदद करता है. हालाँकि, उनकी जूस की दुकान से होने वाली कमाई उतनी लाभदायक नहीं है. वह केवल 500 रुपये तक प्रति दिन कमा पाते हैं. उन्होंने बताया कि गांवों में लोग फलों का जूस खरीदने के लिए उत्सुक नहीं होते हैं.

भले ही नौकरशाही की अनदेखी के लिए उनकी निराशा ध्यान देने योग्य है लेकिन सतबीर भारतीय सेना के ऋणी हैं. उन्होंने बताया “सेना मेरा परिवार हैं और मैं हमेशा उनका आभारी रहूँगा.” सेना ने सतबीर के बच्चों की स्कूल की फीस देने में मदद की, जिसका वादा दिल्ली सरकार ने उनसे किया था.

 

तर्कसंगत का तर्क 

2019 में, भारत कारगिल युद्ध की जीत के 20 साल का जश्न मनाएगा लेकिन सतबीर सिंह और शायद उससे भी ज्यादा लोग अपना बकाया पाने के लिए इंतजार कर रहे हैं. सतबीर सिंह ने देश के लिए दो गोलियां खाईं और अपनी टोली को जीत की ओर आगे ले गए.  हम उन सैन्य कर्मियों का सम्मान करने की बात करते हैं जो लाखों देशवासियों की सुरक्षा के लिए अपनी बहुमूल्य सेवाएं देते हैं लेकिन वास्तविकता बहुत अलग है. पूर्व सैनिकों के प्रति इस तरह के अन्याय को उन लोगों को ध्यान में रखना चाहिए जो मामलों के शीर्ष पर बैठे हैं.

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