मेरी कहानी

मेरी कहानी : दूधो नहाओ – पूतो फलो, एक आशीर्वाद या अभिशाप

तर्कसंगत

May 9, 2019

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मेरी दादी अक़्सर मेरी मां को आशीर्वाद देते हुए कहती थी “दूधो नहाओ, पूतो फलो“. मैं तीन बहनों में मझली थी और बचपन में, मां से इसका मतलब पूछा करती, मां भी मुस्कुराकर टाल दिया करती थी, कभी अर्थ नहीं बताती.

जोधपुर के मध्यम वर्गीय संयुक्त परिवार में मेरी परवरिश हुई. बेटा परिवार को आगे ले जाने के लिए ज़रूरी होता है, ऐसा कई बार मैंने सुना. मां पापा को हम तीन बहनों के होने पर कोई दुःख नहीं था लेकिन गाहे बगाहे कोई ना कोई रिश्तेदार ताना देे कर सहानुभूति जता ही दिया करता.

मेरे इकलौते ममेरे भाई की आकस्मिक मृत्यु पर, परिजनों की संत्वना में मेरी मां से तुलना, मेरे लिए कभी ना भूलने वाला संस्मरण था. मां का हम छोटी बहनों को अकेले में समझाना मुझे आज भी शब्दशः याद है.

ख़ैर पापा की प्राइवेट नौकरी की छोटी सी आय में भी, हम तीन बहनों की अच्छे से परवरिश और शिक्षा दीक्षा हुई. मेरी बड़ी बहन MBA करने के बाद जहां एक स्टार्टअप में एचआर में अच्छी पोस्ट पर हैं वहीं मैं भी मुंबई में एक प्रतिष्ठित कंपनी में कंपनी सेक्रेटरी के पद पर कार्यरत हूं, छोटी आज NIT से एम. टेक. कर रही है.

तीनों बहन जोधपुर से दूर एक अच्छे भविष्य को सुनिश्चित करने की जुगत में लगी हुई हैं. मां पापा के पास तो नहीं लेकिन हां, हर रोज़ सुबह शाम उनसे फोन पर काफ़ी तफ़्सील से बात होती है. मां पापा की हर छोटी बड़ी परेशानी में हम तीनों बहनों में शरीक होने का जैसे कोई कॉम्पटीशन सा होता है. कोई भी परेशानी ना उनसे हमारी देखी जाती है और ना ही हम तीन बहनों से उनकी. संभवतः दूर होते हुए भी, हम सभी आपस में गहरे बुने जुड़े हैं.

वहीं मेरे बड़े मां पापा, जो जयपुर में अकेले रहते हैं, दो बेटे होने के बावजूद एक बेटी होने की आकांक्षा करते हैं, जिनसे वे अपना एकाकीपन बांट पाते. दोनों भाई भी दूर शहरों में प्रतिष्ठित कम्पनियों में अच्छे पदों पर कार्यरत हैं लेकिन जिंदगी की भाग दौड़ में शायद ज्यादा व्यस्त रहते हैं और बड़े मां पापा, बेटियों से बनने वाले करीबी भावनात्मक रिश्ते के लिए मेरे मां पापा को अक्सर सौभाग्यशाली बताते हैं.

मेरे पापा दादी के बहुत करीब थे और वो उनके लिए एक बेटा होने की कामना अपने आख़िरी वक़्त तक करती रहीं. लेकिन मुझे आज भी समझ नहीं आया कि उनका दूधो नहाओ – पूतो फलो, एक आशीर्वाद था या एक अभिशाप.

कहानी : अक्षिता 
स्रोत : सुलभ जैन 

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