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असम का एक स्कूल, जहाँ की फीस है बेकार प्लास्टिक

तर्कसंगत

May 9, 2019

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जैसे ही सूरज उगता है वैसे ही बच्चे अपने कंधे पर किताबों से भरा बस्ता और चेहरे पर मुस्कुराहट लेकर पमोही की गलियों से होकर असम की राजधानी में स्थित एक स्कूल में जाते है. हालाँकि, बच्चे केवल किताबों से भरे बैग के साथ इस स्कूल में नहीं जाते हैं. वे अपने साथ प्लास्टिक कचरे से भरे पॉलिथीन बैग लाते हैं जिसे यह स्कूल उनकी फीस के रूप में लेता है.

यह अविश्वसनीय लगता है लेकिन गुवाहाटी के इस ‘अक्षर स्कूल’ में फीस के रूप में पैसे जमा करने की जगह बच्चे हर सप्ताह कम से कम 10 से 20 प्लास्टिक के आइटम जमा करते हैं और प्लास्टिक ना जलाने का संकल्प करते हैं.

“हम बच्चों के लिए एक नि:शुल्क स्कूल शुरू करना चाहते थे. इस क्षेत्र में एक बड़ी सामाजिक और पारिस्थितिक समस्या का एहसास होने के बाद हमने इसका विचार किया. मुझे अभी भी याद है कि जब भी आसपास के इलाकों में प्लास्टिक जलाया जाता था तो कैसे हमारा क्लासरूम हर बार जहरीले धुएं से भर जाता था. यहां बेकार प्लास्टिक को जलाने की एक प्रथा थी जिसे हम इसे बदलना चाहते थे और इसलिए हमने अपने स्कूल के छात्रों को फीस के रूप में उनके प्लास्टिक कचरे को लाने के लिए प्रोत्साहित करना शुरू कर दिया.” परमिता सरमा ने तर्कसंगत से बात करते हुए साझा किया.

परमिता सरमा और माजिन मुख्तार ने जून 2016 में ‘अक्षर स्कूल’ की शुरुआत की थी. स्कूल में आर्थिक रूप से पिछड़े वर्ग के 100 से अधिक बच्चों को औपचारिक शिक्षा दी जाती है. The Northeast Now के अनुसार, स्कूल ने गरीबी से जूझ रहे बच्चों के लिए बुनियादी तौर पर पाठ्यक्रम तैयार किया है. बच्चों को न केवल विज्ञान, भूगोल और गणित पढ़ाया जाता है बल्कि व्यावसायिक प्रशिक्षण भी दिया जाता है ताकि वे पाठ्यक्रम के अंत तक एक कुशल पेशेवर बन सकें.

 

अक्षर स्कूल का विचार

साल 2013 में माज़िन मुख्तार एक स्कूल प्रोजेक्ट के सिलसिले में न्यूयॉर्क से भारत आये थे और उनका परिचय परमिता सरमा से हुआ जो टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज (TISS) में एक सामाजिक कार्य छात्रा थीं और शिक्षा क्षेत्र में काम करना चाहती थीं. मूल रूप से असम की रहने वाली, परमिता ने माजिन का मार्गदर्शन किया. उन्होंने उन्हें सामाजिक परिदृश्य और क्षेत्र की चुनौतियों के बारे में जागरूक किया और इन सभी चीजों के बाद 2016 में स्कूल अक्षर, जिसका अर्थ ‘शब्द’ होता है, की स्थापना की.

माज़िन ने बताया कि स्कूल शुरू करने के दौरान उन्हें सबसे बड़ी चुनौती ग्रामीणों को अपने बच्चों को स्कूल भेजने के लिए मनाने की थी क्योंकि उनमें से ज्यादातर पत्थर की खदानों में मजदूरों के रूप में काम करके अपना जीवन-यापन करते थे. इसलिए उन्होंने पाठ्यक्रम को इस तरह से डिजाइन किया जो बच्चे की जरूरतों को पूरा करे और शिक्षा के बाद रोजगार और रचनात्मक भविष्य का निर्माण करे.

छात्र पत्थर की खदानों से प्रतिदिन 150 – 200 रुपये कमाते थे. परमिता के अनुसार, वे पैसे नहीं दे सकते थे. इसलिए उन्होंने एक पीयर-टू-पीयर (साथ के लोगो के साथ) पढ़ने का तरीका बनाया जहां पुराने छात्र छोटे बच्चों को पढ़ाते हैं और बदले में उन्हें खिलौना मुद्रा में भुगतान किया जाता है जिससे वे स्नैक्स, कपड़े आदि खरीद सकते हैं. बड़े छात्र हर दिन छोटे बच्चों को पढ़ाते हैं जो दो उद्देश्यों की पूर्ति करता है – एक, यह उन्हें मूल्यवान और महत्वपूर्ण महसूस कराता है, दूसरा उन्हें ज्यादा अध्यापको की जरुरत नहीं पड़ती है.

 

समुदाय को शिक्षित करना

छात्रों की मदद से स्कूल, गांव के समुदाय को जलते प्लास्टिक के हानिकारक प्रभावों के बारे में समझाते हैं. वे ग्रामीणों को कचरे का पुनर्निर्माण करना सिखाते हैं. स्कूल की पहल के परिणामस्वरूप, गाँव में अधिक से अधिक परिवारों ने रीसाइक्लिंग ड्राइव में भाग लेना और जागरूकता फैलाना शुरू कर दिया है.

शिक्षकों की मदद से छात्र प्लास्टिक कचरे के साथ कई नयी नयी चीजें बनाते हैं. छात्रों ने पहले बेकार सामग्री से  कुछ इको-ईंटें बनाई और स्कूल परिसर में कुछ प्लांट गार्ड बनाए हैं. वे इको-ब्रिक्स की मदद से बाउंड्री वॉल, शौचालय और कुछ रास्ते बनाने की दिशा में काम कर हैं जो स्कूल कैंपस में पानी भर जाने पर बच्चों को एक जगह से दूसरी जगह जाने में मदद करेगा.

 

स्कूल में प्रवेश के लिए आयु की बजाय विभिन्न स्तर हैं

अन्य स्कूलों से विपरीत, अक्षर स्कूल में आयु के आधार पर प्रवेश नहीं होता है बल्कि छात्र खुली जगहों पर बैठकर एक ही कक्षा में भाग लेते हैं. परमिता ने बताया “छात्रों के स्तर ज्ञान के आधार पर तय किए जाते हैं. प्रवेश के समय परीक्षण किया जाता है. स्कूल में प्रत्येक शुक्रवार को परीक्षण होता है जिसमें छात्रों को ऊपरी स्तरों पर बढ़ने के लिए अच्छा प्रदर्शन करना होता है. ऐसा यह सुनिश्चित करता है कि शिक्षा की गुणवत्ता में लगातार सुधार हो रहा है.”

2016 में सिर्फ 20 बच्चों के साथ शुरू हुए अक्षर स्कूल में अब 100 से अधिक बच्चे पढ़ते हैं. उनकी कक्षाओं में आठ बांस की झोपड़ी और दो डिजिटल क्लासरूम हैं जिन्हें कुछ लोगों के सहयोग से बनाया गया है. स्कूल के पाठ्यक्रम में कॉस्मेटोलॉजी, कढ़ाई, गायन, नृत्य, जैविक खेती, बागवानी, सौर पैनलिंग, रीसाइक्लिंग और इलेक्ट्रॉनिक्स सहित विभिन्न व्यावसायिक पाठ्यक्रम पढ़ाये जाते हैं.

माज़िन और परमिता ने 2018 में एक दूसरे से शादी कर ली और अब यह जोड़ी अगले पांच सालों में देश भर में ऐसे 100 स्कूल बनाना चाहते हैं.

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