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इनके एक मरीज की आत्महत्या ने इन्हें छात्रों की आत्महत्या को रोकने की दिशा में काम के लिए प्रेरित किया

तर्कसंगत

May 9, 2019

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डॉ. कनन गिरीश एक मनोचिकित्सक थे. उनके रोगियों में कुछ स्कूल जाने वाले बच्चे थे जिन्हें पढाई करने में कठिनाई होती थी और अपने माता-पिता और परिवार के सदस्यों के साथ समस्याओं का सामना करना पड़ता था. एक दिन, एक माँ और एक बेटे ने डॉ. गिरीश से सलाह ली और माँ ने अपने बेटे के बेहद शरारती और बेचैन होने की शिकायत की. फिर लड़के की जांच के बाद पता चला कि उसे ADHD (अटेंशन डेफिसिट / हाइपरएक्टिविटी डिसऑर्डर) से पीड़ित है. डॉ. गिरीश ने कुछ दवाएँ दीं और माँ और बेटे को एक हफ्ते के बाद वापस आने के लिए कहा. लेकिन वह कभी नहीं आये. लगभग 6 महीने के बाद, डॉ. गिरीश मां के पास गये और लड़के के बारे में पूछने पर वह टूट सी गयी. उन्होंने डॉ. गिरीश को बताया कि परामर्श के बाद, लड़के के शिक्षक ने उसके पिता से स्कूल में उसके शरारती व्यवहार की शिकायत की और उसे स्कूल से निकाल दिया. उग्र पिता ने घर वापस आकर लड़के को अपनी बेल्ट से मारा. इसने लड़के को इतना आघात पहुँचाया कि उसने अपने पिता को बताया कि वह खेलने के लिए बाहर जा रहा है, चौथी मंजिल तक गया और वहाँ से कूदकर अपनी जान दे दी.

यह वह घटना है जिसने जीवन में डॉ. गिरीश के उद्देश्य को बदल दिया. तब से वह छात्रों की आत्महत्या को रोकने और माता-पिता और उनके बच्चों के बीच संबंधों को बेहतर बनाने की दिशा में काम कर रहे है. उनका मानना ​​है कि एक बच्चे का व्यक्तित्व उस पेरेंटिंग शैली(देखभाल/संस्कारों) से काफी हद तक निर्धारित होता है जो उनके अधीन है.

 

लीडर-इन-मी कार्यक्रम:

डॉ. गिरीश और उनकी टीम ने 3 दिनों तक चलने वाले इस कार्यक्रम पर ज़ोर लगाया. वह कॉलेजों और स्कूलों में जाते हैं और इस कार्यक्रम का संचालन करते हैं, जहां वह छात्रों को उनकी क्षमता का एहसास करने और उनकी रुचियों और क्षमताओं की खोज करने में मदद करते हैं. डॉ. गिरीश कहते हैं कि हमें यह स्वीकार करना चाहिए कि अलग-अलग व्यक्तियों की सीखने की अलग-अलग शैली होती है और हमें उन सभी को बलपूर्वक पूरा करने के बजाय उन सभी को निर्देशन वाली एक ही शैली के अधीन करना चाहिए.

लीडर-इन-मी कार्यक्रम में भाग लेने के बाद छात्रों को खुद का बेहतर ज्ञान होता है और वह जो उनके लिए सही मानते हैं उसे आगे बढ़ाने के लिए आत्मविश्वास प्राप्त करते हैं. ऐसे देश में जहां लगभग हर बच्चा यह मानने के लिए मजबूर हो जाता है कि उन्हें या तो मेडिकल की पढाई या इंजीनियरिंग की पढाई में जाना चाहिए, यह कार्यक्रम उनके लिए आवश्यक से अधिक है. पीयर लर्निंग एक और अवधारणा है डॉ. गिरीश हमारी शिक्षा प्रणाली में सुधार की उम्मीद करते हैं. शिक्षक और माता-पिता केवल शिक्षण की प्रक्रिया करने वाले नहीं होने चाहिए बल्कि छात्रों को अपने साथी छात्रों को भी पढ़ाना चाहिए. यह उनके आत्मविश्वास को बढ़ाते हुए सद्भाव और सह-अस्तित्व की भावना विकसित करता है.

 

माता-पिता और शिक्षक बच्चे की उत्पादकता निर्धारित करने में भूमिका निभाते हैं

हमारी वर्तमान शिक्षा प्रणाली बच्चों के सपनों को चकनाचूर करती है और उन्हें उनकी क्षमता का एहसास नहीं कराती है. बच्चों को सपने देखने और उनकी क्षमता का पालन करने के लिए प्रशिक्षण बेकार हो जाएगा यदि वह प्रशिक्षण से कक्षाओं और घरों में जब वापस जाते हैं जहां उनके शिक्षक और माता-पिता उन्हें उसी पुराने तरीको के अधीन करते हैं. यही कारण है कि डॉ. गिरीश और उनकी टीम शिक्षकों को भी प्रशिक्षित करती है. उनका मानना ​​है कि अगर शिक्षकों को प्रशिक्षित करके उनमे बदलाव लाया जाता है, तो वह बच्चों को बदल देंगे, और बदले में, बच्चे घर जाकर अपने माता-पिता को भी बदल सकेंगे.

लाइव लाइफ एजुकेशन एक प्रोग्राम भी करवाती है जिसे वह Gratitude Sessionsकहते हैं. यह प्रोग्राम बच्चों को उनके माता-पिता के मूल्य का एहसास कराने और उनके रिश्तों को बेहतर बनाने में मदद करने के लिए डिज़ाइन किए गया हैं.

यह पूछे जाने पर कि क्या शिक्षा से जीवन को केंद्र में स्थानांतरित करने से छात्रों की उत्पादकता और रोजगार की लागत में कमी आने वाली है, डॉ. गिरीश ने हंसते हुए कहते हैं कि यह पूरी तरह से दूसरा रास्ता है. यदि आप बच्चों को यह निर्णय लेने देते हैं कि वह जीवनयापन के लिए क्या करने जा रहे हैं, तो उनकी उत्पादकता को बढ़ावा मिलना तय है. अगर बच्चों को भावनात्मक रूप से संतुलित जीवन जीने की शिक्षा दी जाती है, तो उनकी उत्पादकता को बढ़ावा मिलता है. यदि बच्चों को अपने जीवन पर नियंत्रण रखने और नेतृत्व के गुणों को विकसित करने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है, तो उनकी उत्पादकता बहुत बढ़ जायेगी.

 

Live Life Education ने क्या हासिल किया है?

जब हमने डॉ. गिरीश से पूछा कि उनकी उपलब्धियां क्या हैं, तो उन्होंने अवार्ड ऑफ एक्सीलेंस इन एडोलसेंट साइकियाट्रीका जिक्र नहीं किया, यह उन्हें भारत के राष्ट्रपति द्वारा दिया गया, उन्होंने इसके बजाय mild muscular dystrophy वाली एक लड़की की कहानी सुनाई, जिसने अपनी शारीरिक दुर्बलता के कारण आत्महत्या की कोशिश की थी. डॉ. गिरीश के कार्यक्रम में भाग लेने के बाद, उस लड़की ने स्वर्ण पदक के साथ अपने स्नातक स्तर की पढ़ाई पूरी की और अब एक प्रतिष्ठित कंपनी में काम कर रही हैं. लड़की नौकरी हासिल करने के बाद डॉ. गिरीश के पास वापस आई और उन्हें यह एहसास दिलाने के लिए धन्यवाद दिया कि यह उसकी मानसिक रुकावटें थीं जो उसे उसके सपनों से दूर रख रही थीं न कि उसकी शारीरिक विकलांगता/दिव्यंगता. डॉ. गिरीश ने एक उदेश्य के नाते काम करना जारी रखा. वह न केवल देश भर में, बल्कि विश्व भर में बहुत सारे भाषण देते हैं. उनके काम को दुनिया भर में कई मशहूर हस्तियों द्वारा सराहा गया है, लेकिन उनका मानना ​​है कि यह उनकी सराहना नहीं है, बल्कि यह उनके द्वारा किये गया काम है जिसे सराहा जा रहा है.

तर्कसंगत ने डॉ. कनन गिरीश और उनकी टीम को उनके इस बहुत जरूरी काम के लिए सराहा है और हमें उम्मीद है कि देश डॉ. गिरीश द्वारा किए गए परिवर्तन का गवाह बनेगा.

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