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टाटा का चुनावी चंदा 25 करोड़ से 500 करोड़ हुआ, 2014 से 20 गुना ज़्यादा

तर्कसंगत

Image Credits: Dailyhunt

May 9, 2019

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बिजनेस स्टैंडर्ड की एक खबर के मुताबिक देश के सबसे बड़े समूह टाटा उद्योग ने 2019 के लोकसभा चुनाव के लिये कुल 500 से 600 करोड़ की बड़ी रकम चंदे में दी है जो की 2014 लोकसभा चुनाव के मुकाबले में दिए गए 25 करोड़ से 20 गुना ज़्यादा है। तमाम पार्टियों में बाँटा गया चंदा बेशक टाटा की राजनीतिक पार्टियों को बड़े पैमाने पर की गई मदद है।

 

‘प्रोग्रेसिव इलेक्टोरल ट्रस्ट’

बिजनेस स्टैंडर्ड की इस खबर में बताया गया कि दरअसल टाटा समूह ने एक ‘प्रोग्रेसिव इलेक्टोरल ट्रस्ट’का गठन किया था, जिसके तहत सभी कंपनियों ने पैसा डाला और बिजनेस स्टैंडर्ड ने हिसाब लगाया कि इस 500 करोड़ के चंदे में किस पार्टी को कितना चंदा गया है, हालांकि ग्रुप से अखबार को कोई आधिकारिक जवाब नही दिया गया है पर अलग अलग दलों के हिसाब के मुताबिक अनुमान लगया जा रहा है कि 500 करोड़ की रकम में सबसे ज़्यादा हिस्सा सत्ता में मौजूद ‘भारतीय जनता पार्टी’ के हाथ लगा जिसका अनुमान करीब 300 से 350 करोड़ के करीब लगाया जा रहा, वहीं 50 करोड़ ‘कांग्रेस’ के खाते में आए बाकी रकम टीएमसी,’भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी’,एनसीपी व सीपीआई एम को गए। 2014 में सिर्फ 25 करोड़ बतौर चंदे में देने वाले टाटा समूह ने 2019 में चुनाव लड़ रही पार्टियों पर इस बार ख़ासी मेहरबानी की है।

 

चंदे की रकम का हिसाब

समूह के मुताबिक वे चंदे का गणित पार्टी की वर्तमान लोकसभा सीटों के हिसाब से लगाते हैं इसी कारण वर्ष भाजपा को सबसे ज़्यादा चंदा मिला। समूह के इलेक्टोरल ट्रस्ट में केवल टीसीएस ने ही 220 करोड़ की मोटी रकम डाली। ज़ाहिर है 2019 का लोकसभा चुनाव भारतीय इतिहास का सबसे महँगा चुनाव होने जा रहा है और इससे किसी पार्टी को परहेज नही है वे सब इस चुनाव में पूरा प्रयास करना चाहते हैं और किसी रैली में कोई कमी नही चाहते और इस के लिये कितनी भी रकम कम है।

 

इलेक्टोरल बॉन्ड का कमाल

भाजपा सरकार ने पार्टियों के चंदे को लेकर अपनी गंभीरता दिखाई है इसलिये वे पिछले साल ‘इलेक्टोरल बॉन्ड’ जारी कर नया और चतुर कानून लाए जिसके तहत कोई भी किसी भी पार्टी को चंदा दे उसकी पहचान गुप्त रखी जायेगी बस उसे स्टेट बैंक की किसी भी शाखा से इलेक्टोरल बॉन्ड खरीदना है। इस कानून के द्वारा सरकार ने अपारदर्शिता की एक नयी मिसाल कायम की। अब जब चुनावी माहौल में पार्टियों की रैलियों और सभी तामझाम से उनका अन्धखर्च साफ ज़ाहिर है तो सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया की वे अपने चंदे का हिसाब एक सील्ड लिफाफे में चुनाव आयोग में जमा करवायें और बताया जाये की किसने कितना चंदा दिया है और बता दें की यह जानकारी आम जनता से गुप्त ही रखी जायेगी जिससे सरकार के इस अपारदर्शिता के कानून को कोई चोट ना पहुंचे और यह इसी तरह सुरक्षित रहे। भाजपा को आ रहे इतने बड़े पैमाने पर चंदे से उनका वित्तीय बल साफ है और विपक्ष पहले ही हताश है और आधा चुनाव तो यही हार गया है। गौर की बात है यह सभी जानकारियाँ अखबारों से और न्यूज़ चैनलों से गायब हैं, यह क्या आधे तो मुद्दे ही ग़ायब हैं और किसी भी तरह से यह चुनाव मुद्दों पर नही लड़ा जा रहा और अचार संहिता के तमाम उल्लंघनों के बाद भी चुनाव आयोग हाथ पर हाथ धरे बैठा है।

 

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