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चार्टर्ड अक्काउन्टेड रह चुकी, कॉर्पोरेट जॉब छोड़ अब करती हैं ऑर्गेनिक खेती

तर्कसंगत

May 10, 2019

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विशाला (यानी विशालक्षी पद्मन्भान) खेती के क्षेत्र मे कदम रखने से पहले, 4 सालों से कॉरपोरेट सेक्टर मे काम कर रही थी। यह कार्य उनके जुनून से मेल खाता है। विशाला ने पाया की देश के कृषी शेत्र को पुनः निरीक्षण की ज़रुरत है। एक ऐसे प्रणाली के निर्माण की आवश्यकता है। जो किसानों के साथ ग्राहकों का भी उत्थान करे।

“हम अक्सर ही किसानों की अफ़सोसजनक आत्महत्या की ख़बरे सुनते ही रहते है कभी आर्थिक रूप से असक्षम होने तो कभी सिंचाई सुविधा की कमी होने के कारण। जब कोई ऐसी चीज़ को उपजा रहा है जो हमे रोज़ चाहिए और खुद जीवन जीने मे ऐसा संघर्ष कर रहा है (हालांकि परिस्थिति और बिगड़ रही है) इसका सीधा मतलब यह है कि बहुत बड़ी कमी है जिसका इलाज जल्द से जल्द होना चाहिए। हम एकजुट होकर काम नही कर रहे है और इस कारण किसान की मुश्किलें कम नही हो रही हैं।” विशाला तर्कसंगत से बात करते हुए कहती हैं। 

 

 

 

बफैलो बैक’ एक सामुहिक प्रयास

बफैलो बैक एक ऐसी कृषि तकनीक है जो शहरी ज़रूरत और ग्रामीण परंपरागत ज्ञान को साथ लाती हैं। “यह एक ऐसा मंच है जहां लोगों को उनका हक़ मिलता है। कोई अनुक्रमण नही है हर व्यक्ति इस प्रयास की स्थिरता को बनाये रखता है।

9 साल के खेती के इस अनुभव के साथ-विशाला अपने बन्नेरघटा के खेत से काम करती है जो बेंगलूर,कर्नाटक से 40 किमी दूर है।इस प्रयास मे कोई निवेशक नही है और इनका पूर्ण रूप से कार्य बन्नेरघटा के जंगल से खरीदी ज़मीन से चलता है।

 

 

“हमे सबसे पहले उन मुख्य खाद्य पर ध्यान देने की आवश्यकता है जिन्हे सभी को चाहिए। फिलहाल अभी प्रोसेस्ड फूड्स के बारे में सोच भी नही रहे हैं। बफैलो बैक के पीछे मुख्य विचार है की हर जगह खाना सुरक्षित हो जो खाए स्वस्थ खाए। चाहे गरीब या अमीर यह हर व्यक्ति का अधिकार है। सुरक्षित खाद्य से मेरा कहना है खाना जो पौष्टिक है।” इसे लेकर बफैलो बैक किसानों के साथ सहायता प्ररूप से काम करता है। यह हर गांव की स्तिथि पर निर्भर करता है। यह एक ऐसा बिज़नेस मॉडल है जहां हर एक व्यक्ति उत्पादन और वितरण की प्रक्रिया के माध्यम से उत्तरदाई है। यहाँ हर व्यक्ति अपने काम का मालिक खुद ही है।

मिसाल के तौर पर जहां विशाला के खेत हैं वहां सिर्फ सोलह परिवार हैं क्योंकि यह एक एलीफेंट कॉरिडोर में स्थित है यहाँ खेती की ज़्यादा जगह नही है। लेकिन वहां की महिलायें स्वयंसेवी संघठनो से जुड़ी हुई हैं। जहां वे अपने आंगन में खेती करती हैं।

 

 

कभी छोटे एनजीओ भी सहयता कर देते हैं। सभी समूह जो प्रक्रिया से किसी भी स्टेज से जुड़े हैं। उन्हे सुरक्षित खाद्य का अनुमान है। यह प्रकिया इस तरीके से चलती है की उत्पादन में पोशण तत्व अधिक होते हैं। साथ ही बिना किसी प्राकृतिक साधनों के नुक्सान के।

“हम इस कार्यक्रम की शुरुआत ही इसी तरीके से करते हैं। पहले किसानों को शिक्षित करते हैं। कैसे किसी भी तरह के नुक्सान से बचा जाए चाहे वह पर्यावरण का हो या खुद का क्योंकि दुनिया में आधी फसल उत्पादन के समय ही खराब हो जाती है हमने एक ऐसे मॉडल का निर्माण किया है जहां हर एक चीज़ स्थिर है। स्थानीय व नुक्सान मुक्त” विशाला ने कहा।

 

बफैलो बैक नुक्सान मुक्त खेती कैसे सुनिश्चित करता है?

क्योंकि विशाला का गांव एलीफेंट कॉरिडोर मे स्थित है-वहां महिलायें ज़्यादातर हरी सब्ज़ियाँ उगाती हैं वह भी अपने आंगन में क्योंकि हाथियों के एक हमले से सारी फसल खराब हो जायेगी।

ऐसा सुनिश्चित करा जाय की फसल खराब न हो इस कारण महिलायें अधिकतर देशी पैदावार ही उगाती हैं। क्योंकि वे कताई के दो दिन बाद भी मज़बूत और ताज़ा रह्ती हैं। इसके साथ कम से कम नुक्सान होता है और इस कार्यक्रम में खराब हो चुकी फसल का भी इस्तेमाल किया जा रहा है,सेवन की बजाय।उदाहरण के लिये ’ब्रिनग्राज’ का पौधे की खराब पत्तियों का इस्तेमाल बालों के तेल बनाने में होता है।

 

 

यह एक निरंतर प्रक्रिया है,क्योंकि किसान हर कदम और इसके हर कदम और हर क्षेत्र के लिये शिक्षित व अवगत है। हर गांव की स्थिति के अनुसार विभिन्न नुक्सान मुक्त खेती तकनीक को कार्य में लाया जा रहा है।

 

शहरीयों पर नज़र

शहरीयों की जीवनशैली ग्रामीणो से ख़ासी अलग है और उनका नज़रिया भी काफी वैश्विक है। वे परंपरागत खाना ज़्यादा नही खाते। बफैलो बैक ऐसे तरीके साम्ने लेकर आया है जो शहरी ज़रूरत देसी तरीकों से पूरी करे।

उदाहरण के तौर पर ड्रमस्टिक्स शहर में ज़्यादा नही खाई जाती और किसान इसे काम दाम पर बेचते हैं। तभी उन्हे विचार आया की ड्रमस्टिक्स की कटाई एक खास मौसम में हो और उन्हे बीच में से काट उन्के बीजों को निकाल उन्हे धूप में सुखाया जाए जिससे वे पोपकॉर्न जैसे बन जाएंगे और शहरी लोग इसका सेवन खुशी से करेंगे।

 

 

पिछले तीन सालों से बफैलो बैक शहरी बाज़ार को लक्षित कर रहे हैं पांच वर्षों के ज़मीनी कार्यों के बाद इनका उत्पादन सीधे बाज़ार में जाता है। हालांकि बहुत लोग अभी अभी सुरक्षित खाने को लेकर अनजान हैं।इसे लेकर भी बफैलो बैक का ध्यान उपभोक्ता जागरूकता में है। “पिछले एक माह से बेंगलूर का मौसम गर्मी से असहनीय हो गया है। यह ही सही समय है जब लोगों को स्टेबिलिटी व ससटैन्बिलीटी के बारे में शिक्षित और जागरुक किया जा सके” विशाला ने कहा।

इस संघठन के अनेक कैम्पेन हैं जिससे लोगो को उन छोटे छोटे  कार्यों के बारे में जागरुक किया जा सके जो जीवन में विशाल बदलाव लाते हैं साथ ही पर्यावरण के लिये भी फ़ायदेमंद हैं।

 

‘रूट्स टू ग्रेन्स’ कैम्पेन

आज के समय में जब हमारे पास वैश्विक जानकारियों का भंडार है,और लोगो को सुरक्षित व पौष्टिक खाद्य के बारे में पता होना चाहिए जो वे अपने आन्गन में ही उगा पाए-विशाला ने कहा। इस कैम्पेन के अंतर्गत,अनिल अन्निया ने सुझाया लोगों को पारंपरिक अनाजों के बारे में शिक्षित करना चाहिए उनकी जड़ों से वाक़िफ़ करवाना चाहिए। “ज़मीन में अधिक खाद्य मौजूद है लेकिन इनसे अंजान हैं।ऐसा खाद्य काफी सेहत्मन्द है और पौष्टिक है। विशाला का कहना है। 

 

 

पाया गया है मानवों में ही डीएनए लेवल उनके आहार से जुड़ा है। विशाला ने महसूस किया की लोगों को इसके बारे में शिक्षित करना चाहिए। रूट्स टू ग्रेन्स इसी को लेकर काम कर रहा है।

 

कोई प्लास्टिक का इस्तेमाल नही,उतपादन से वितरण तक

प्लास्टिक की जगह बफैलो बैग गनी बैग्स का इस्तेमाल करते हैं साथ ही कपड़े के बैग्स से लेकर ग्लास की बोतलें का इस्तेमाल होता है जो डिलीवरी के वक्त लौटा दी जाती हैं।

“गनी बैग्स में रखी गईं ‘मुरि’ मुलायम हो रही थी यह फायदेमंद था,यहाँ तक की हमने लोगों के कहने पर भी प्लास्तिक बैग्स का इस्तेमाल नही किया वहीं स्टील अधिक महँगा होता है पर यह परेशानियां आम हैं।लोगो ने हमारा खूब साथ दिया है,पिछले हफ्ते ही मैने मेल भेज सबसे स्टोरैज कन्टैनर्स की मांग की अब हमारे पास तक़रीबन 22 कन्टैनर्स आ गये हैं।इस में खुद का एक रुपया भी नही लगा।” विशाला ने कहा

 

 

इसके पीछे का मकसद भी यही है की लोगो को शिक्षित किया जाए कि प्लास्टिक की जगह क्या इस्तेमाल हो सकता है जिससे वातावरण को नुक्सान ना हो। “किराने की दुकान पर जाते समय भी लोग अगर खुद का कपड़े का बैग ले जाते हैं न की प्लास्टिक बैग की मांग करे तो हम समझेंगे की हम सफल हुए।”-उन्होने कहा।

विशाला ने अपना जीवन किसानों और उपभोक्ता के उत्थान में लगा दिया। तर्कसंगत इनके प्रती आभार प्रकट करता है। विशाला ने ऐसे महत्वपूर्ण काम को तरजीहत दी और अपने हाथों लिया। उनका ओर्गैनिक खेती के प्रति कार्य सराहनीय है और हम आशा करते हैं की वह अपनी इस कोशिश से लोगो को जागरुक करने में कामयाब होंगी।

 

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