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“हम गहरे संकट में हैं” यू एन ग्लोबल रिपोर्ट की चेतावनी

तर्कसंगत

May 15, 2019

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यू एन वैश्विक मूल्यांकन रिपोर्ट के ड्राफ्ट में अगले 10 सालों में 10 लाख जातियों के लुप्त होने की आशंका का जताई गई है.

पिछ्ले 3 सालों से 400 विशेषज्ञों द्वारा जुटाई गई यू एन की क्लाइमेट चेंज रिपोर्ट इशारा करती है की हमे जल्द से ही कोई ऐक्शन लेना होगा जिससे उन जातियों,जिन पर मानव जाती अपने खाने,परागन,साफ पानी और स्थिर पर्यावरण के लिये निर्भर है उन्हे बचाया जा सके.

“अगर हम कोई कदम नही उठाते है तो हम एक गहरे संकट में होंगे”-रोबर्ट वॉटसन,आई पी बी ई एस चेयर.”ऐसे बहुत से कदम अभी भी लिये जा सकते है जो पर्यावरण को बचा सके और मानव जाती की स्वास्थ व विकास संबंधित ज़रूरतों को पूरा कर सके,”उन्होने द गार्डिअन से बात करते हुए कहा.

6 मई को जारी की गई यू एन ग्लोबल असेसमेंट रिपोर्ट जीवन अध्ययन पर सबसे व्यापक रिपोर्ट है.

हांलाकि विशेषज्ञ काफी समय से पर्यावरण में हो रहे बदलावों से होने वाले नतीजो की चेतावनी दे रहे थे. 2018 अक्टूबर की एक रिपोर्ट में कहा गया की अगर चल रहे ग्लोबल वार्मिंग पर शीघ्र कड़े फैसले नही लिये गए तो नतीजे विनाशकारी होंगे.

 

भारत पर प्रभाव

भारत में ओड़िशा जैसे राज्य पहले से प्राकृतिक आपदाओं का सामना कर रहे हैं।

ग्लोबल स्ट्रेटजिक कम्युनिकेशंस काउंसिल के मुताबिक साइक्लोंन फ़ानी बे ऑफ़ बंगाल की बढ रही गर्मी के कारण उत्पन्न हुआ था.और विश्व में इस तरह से बढ रही सभी समुद्रों के तापमान का भी कारण ग्लोबल वार्मिंग ही है.

“विश्व में बढ रहे समुद्री स्तर और तीव्र तूफानों के मेल का ही असर है की आज करोड़ों लोग किस तरह के विनाश का सामना कर रहे हैं और फ़ानी इसका नवीनतम उदाहरण बना.अगर हम फौसिल फ्युल्स के इस्तेमाल से पृथ्वी को इसी तरह जालाते रहेंगे और पर्यावरण में कार्बन छोड़ेंगे तो खतरा इसके आगे और बढने ही वाला  है.”- माइकल ई. मन(डायरेक्टर,अर्थ सिस्टम साइन्स सेंटर पैन्सिल्वेनीया स्टेट यूनिवर्सिटी) ने टाइम्स ऑफ़ इंडिया से कहा.

पिछ्ले 20 सालों में भारत से टकराने वाले सबसे भयंकर तूफान फ़ानी के कारण केवल ओडिशा से ही 11 लाख से अधिक लोगो को घरों से निकालना पड़ा और घर खाली करवाने पड़े. 2017 में जर्मन वाच द्वारा प्रकाशित की गए ग्लोबल क्लाइमेट रिस्क इंडेक्स ने दुनिया में पर्यावरण के प्रभावों से झूझते देशों में भारत को छटा स्थान दिया.

रिपोर्ट के अनुसार 2016 में हुई पर्यावरण और प्राकृतिक घटनाएँ पूरे विश्व में भारत में सबसे ज़्यादा हुई और विशेषज्ञों का मानना है की यह संख्या और बढ़ेगी.

 

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