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यह पहल न्यूनतम लागत पर दक्षता में वृद्धि करके सार्वजनिक अस्पतालों को बेहतर बना रही है

तर्कसंगत

May 15, 2019

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हममें से ज्यादातर लोग सरकारी अस्पतालों का दौरा करते हैं. हालाँकि अच्छा उपचार वहाँ पर शायद ही कोई पाता हो, विभिन्न विभागों के चक्कर लगाने के विचार ने मरीजों के शरीर और समय दोनों की क्षति करता है. उत्कृष्ट रूप से प्रशिक्षित डॉक्टरों और एडवांस डायग्नोस्टिक ​​और सर्जिकल प्रौद्योगिकी के बावजूद भी सरकारी अस्पतालों में लोगों का अनुभव सबसे ज्यादा अक्षम है.

अस्पताल के कर्मचारी भी अक्सर अपना आपा खो देते हैं, क्योंकि वह बहुत तनाव में होते हैं, सैकड़ों प्रश्नों का उत्तर देते हैं, और पूरे दिन में एक से निर्देशों को विभन्न लोगो को दोहराते हैं. किसी भी सरकारी अस्पताल में जाने के बाद, हम अक्सर सोचते हैं, कि अगर शासन और प्रशासन में एक बेहतर सुधार हो जाये, तो यह अस्पताल बहुत अच्छे हो जाएंगे.

दिल्ली की संस्था सुश्रत फाउंडेशन इस परिदृश्य में बदलाव लाने की कोशिश कर रही है ताकि एक सरकारी अस्पताल आम तौर पर कैसे काम करता है उसमे सुधार हो सके. परिवर्तन खुशहाल कर्मचारियों, संतुष्ट रोगियों और सामान्य रूप से एक खुशहाल राष्ट्र का निर्माण करके सकारात्मक परिणाम ला रहे हैं.

पिछले चार महीनों में, उन्होंने 25,000 रोगियों के जीवन को लाभ दिया है और एक सरकारी अस्पताल में तीन विभागों के बेहतर कामकाज में मदद की है. यह संख्या काफी बड़ी है, ऐसा नहीं है क्या? इस तरह के बदलाव लाने के कठिन कार्य को पूरा करने के बारे में अधिक जानने के लिए आगे पढ़ें.

 

सुश्रत फाउंडेशन क्या है?

जब तर्कसंगत ने सुश्रत फाउंडेशन के संस्थापक सदस्यों में से एक, शितिज मल्होत्रा ​​से बात की, तो उन्होंने कहा, “हम सभी अक्षमता के बारे में शिकायत करते हैं, लेकिन जो हम अक्सर समझने में विफल होते हैं वह उच्च स्तर का तनाव है जिसे हर दिन अस्पताल के कर्मचारियों को निपटाना पड़ता है. सुश्रत फाउंडेशन जो करने की कोशिश कर रहा है, उसमे वह ऐसे काम का माहौल बना रहा है जो तनाव से मुक्त हो. इससे निश्चित रूप से उत्पादकता में वृद्धि होगी.

सुश्रुत फाउंडेशन की स्थापना AIIMS और स्टैनफोर्ड इंडिया बायोडिजाइन एलुमनीज के सर्वश्रेष्ठ चिकित्सा चिकित्सकों द्वारा की गई है. संगठन पांच स्तंभों, रोगी सुरक्षा, प्रौद्योगिकी, बुनियादी ढांचे और सुविधाओं, प्रक्रियाओं और नीति और अंत में, संचार पर काम करता है.

सुश्रत दिल्ली के स्वास्थ्य मंत्रालय के साथ मिलकर काम कर रही हैं और उनका शुरुआती प्रोजेक्ट तेलंगाना के निजामाबाद जिले में एक सरकारी अस्पताल था. सुश्रत ने जिस हस्तक्षेप के माध्यम से कार्य किया है, वह टोयोटा प्रोडक्शन सिस्टम का एक क्रमचय-संचय है, जो कार्यप्रणाली में त्रुटियों का पता लगाता है और त्रुटियों को दूर करने के लिए समाधान बनाता है और कुल परिचालन प्रदर्शन के लिए टाटा का टाटा एडवांस्ड सिस्टम समाधान करता है.

हमारा उद्देश्य भारत के सरकारी अस्पतालों की गुणवत्ता में सुधार लाने में निहित है. हमारे उद्देश्य को प्राप्त करने के बारे में अंतरराष्ट्रीय सर्वोत्तम तरीकों को अपनाते हुए, मौजूद नीतियों को बदलने और खाली जगह को भर देने के बारे में स्मार्ट और सरल तकनीक को अपनाकर इछुक परिणाम प्राप्त करना है.

 

इनोवेशन लाना और जीवन को बदलना

शितिज ने कहा, “हमें यह समझने की जरूरत है कि अधिक कर्मचारियों या डॉक्टरों को नियुक्त करना हताशा/फ्रुस्टटेसन से निपटने का समाधान नहीं है. एक वरिष्ठ योग्य चिकित्सक संगठन चला रहा है और रोगियों को भी देख रहा है. वह प्रबंधन के किसी भी पूर्व प्रशिक्षण के बिना संगठन चला रहा है. हम बस एक प्रेरणा के रूप में कार्य कर रहे हैं ताकि आवश्यक प्रेरणा और परिवर्तन को बढ़ावा दिया जा सके.

 

 

अधिकांश कर्मचारी छह घंटे के बाद पूरी तरह से हताश हो जाते हैं क्योंकि वह लगातार मूर्खतापूर्ण चीजों से तनावग्रस्त में रहते हैं. यदि उन्हें अतिरिक्त बोझ से छुटकारा दिलाया जाता है, तो वह निश्चित रूप से अधिक उत्पादक होंगे, पूरे संगठन में अधिक कार्य करने में सक्षम होंगे.

 

स्टोर विभाग

सुश्रत द्वारा उठाया गया ऐसा ही एक तरीका स्टोर डिपार्टमेंट में था. स्टोर विभाग एक अत्यंत महत्वपूर्ण क्षेत्र है जहाँ से सभी चिकित्सा आपूर्ति व्यक्तिगत वार्डों तक पहुँचती हैं.

पहले की प्रक्रिया: वार्ड बॉय सभी आवश्यक दवाओं की एक सूची बनाता है, स्टोर पर जाता है, सूची तैयार करता है और कुछ घंटों के लिए स्टोर पर इंतजार करने के बाद दवा लेता है. इससे अत्यधिक नुकसान हुआ, मानवीय प्रयासों का नुकसान हुआ और समय का नुकसान हुआ. सोलह लड़के इस तरह की इधेर उधर घूमने वाली प्रक्रिया में शामिल हैं.

ट्वीकेड प्रोसेस: शितिज ने कहा, “हमने पिज्जा स्थानों पर भी यही अभ्यास अपनाया. स्टोर विभाग के दो लड़के वार्डों का दौरा करते हैं और वह दवाओं की आवश्यक सूची एकत्र करते हैं. स्टोर पर मौजूद कर्मचारी आवश्यक दवाएं तैयार करते हैं. इस बीच, दोनों लड़के दूसरे वार्डों में जाते हैं और अपनी-अपनी सूची बनाते हैं. तब तक, वह अन्य वार्डों से सूची एकत्र करके वापस आते हैं, पहली सूची के लिए आवश्यक दवाएं तैयार की जाती हैं और उन्हें वार्ड तक पहुंचाने के लिए तैयार किया जाता है.

उन्होंने कहा, अब किए गए इस अभ्यास ने मानव प्रयास और समय की बर्बादी को कम कर दिया है. साथ ही, 16 कर्मचारी भी स्वतंत्र हैं, वह आसानी से खुद को अन्य गतिविधियों में संलग्न कर सकते हैं”.

 

 

एक अस्पताल में कलर कोडिंग

एक सरकारी अस्पताल में, ऐसे कई मरीज हैं जिनके परिजन और रिश्तेदार अनपढ़ हैं. एक प्रयोगशाला से दूसरे चिकित्सक या किसी अन्य वार्ड में फेरबदल करते समय, उन्हें अक्सर साइन बोर्ड के नाम पढ़ने में कठिनाई होती है. उन्हें अस्पताल के कर्मचारियों से निर्देश पूछने का सहारा लेना पड़ता है. एक ही दिशा को बार-बार दोहराना थकाऊ होने के साथ-साथ समय बर्बाद करने वाला भी है. यहाँ पर लायी गयी ट्वीक प्रक्टिस, कलर कोडिंग के माध्यम से अस्पताल की प्रक्रिया है.

उदाहरण के लिए: जैसे, प्रयोगशाला का रंग लाल है. डॉक्टर मरीज को लाल पर्ची जारी करता है. रोगी जानता है कि लाल रंग प्रयोगशाला को दर्शाता है. अस्पताल में लाल तीर हैं जो प्रयोगशाला की ओर इशारा करते हैं. इसी तरह, फार्मेसी को पीले रंग में कोडित किया जा सकता है. डॉक्टर से पीले रंग की पर्ची प्राप्त करने के बाद, सभी रोगी को अस्पताल में चित्रित पीले तीर का पालन करना होगा और वह फार्मेसी तक पहुंच जाएगा.

इस हस्तक्षेप के माध्यम से, प्रयासों को कम से कम किया जाता है और मरीजों को अस्पताल में अपना काम करने में भी आसानी होती है.

 

 

सामान्य निर्देश

टूटे पैर के साथ अस्पताल में आने पर, चिकित्सक उपचार की प्रक्रिया को तेज करने के लिए क्या करना है और क्या नहीं करता है, की एक सूची पर विस्तार से बताते है. दिन भर में लोगों के विभिन्न सेटो के लिए निर्देशों के एक ही सेट को विस्तृत करने के बजाय, प्रयासों को कम करने का एक व्यवहार्य हैंडआउट्स या सचित्र पैम्फलेट्स जिसे डिजीज FAQ’s नाम दिया जा सकता है. इन पर्चे में हिंदी में या यहां तक कि प्रचलित क्षेत्रीय भाषा में टाइप किए गए या सचित्र सभी निर्देश होंगे.

इससे मरीजों को रेफर करना आसान होगा और डॉक्टरों के लिए प्रयास के घंटे भी बचेंगे. डॉक्टरों के लिए अतिरिक्त तनाव को दूर करने के साथ-साथ उत्पादकता में वृद्धि होगी.

 

 

आगे का रास्ता

“2023 तक मरीजों की सैलरी में 300 करोड़ रुपये की बचत करने का लक्ष्य सुश्रत फाउंडेशन का पांच साल का मुख्य उदेश्य है”. सरकारी अस्पतालों में ज्यादातर मरीज दिहाड़ी वाले मजदूर होते हैं और अस्पताल में पूरा दिन बिताने से आदमी अपने दिन और अपने दैनिक मजदूरी दोनों का नुकसान करता है. हम इन सरकारी अस्पतालों के कामकाज की प्रभावकारिता को इस हद तक बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं कि रोगियों को अस्पतालों में घंटों खर्च करके अपनी दैनिक कमाई का त्याग नहीं करना पड़े. इस तरह के सस्ते, नये इनोवेटिव समाधान और अभ्यास निश्चित रूप से एक अधिक कुशल काम का माहौल बनाएंगे और कर्मचारियों के लिए तनाव को कम करेंगे. वह 30,000 जीवन बचाने का लक्ष्य भी रखते हैं. यदि कर्मचारी कम तनावग्रस्त रहते हैं, तो इससे त्रुटियों की संख्या में भी कमी आएगी.

तर्कसंगत समुदाय सुश्रत फाउंडेशन द्वारा किए गए प्रयासों की तहे दिल से सराहना करता है. वह हम में से कई लोगों के लिए एक प्रेरणा हैं.

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