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मिलिए इस मध्य प्रदेश के टेकी से जिसने अपनी नौकरी छोड़ दी और अपने गाँव के युवाओं को शिक्षित करने के लिए अपना घर बेच दिया

तर्कसंगत

May 20, 2019

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प्रांजल दुबे एक 40 वर्षीय सॉफ्टवेयर प्रोफेशनल हैं, जिन्होंने अपने गाँव के युवाओं को शिक्षित करने के लिए अपना सब कुछ न्यौछावर कर दिया है.  उन्होंने कर्नाटक के बेंगलुरु में एक प्रोग्राम मैनेजर के रूप में अपनी नौकरी छोड़ दी और अपना घर बेच दिया. उस पैसे से दुबे ने मध्य प्रदेश (एमपी) के एक गाँव में संत सिंगाजी इंस्टिट्यूट ऑफ़ साइंस एंड मैनेजमेंट (SSISM) नाम से एक कॉलेज शुरू किया.

“मैंने इस इमारत को बनाने के लिए अपना घर बेच दिया, जो बहुत आवश्यक था.  मैं अपने गाँव के युवाओं को शिक्षित करना चाहता था ताकि वे अपने जीवन में बेहतर कौशल, नौकरी के अवसर और स्थान प्राप्त कर सकें.”

2010 तक, दुबे ने लगभग 13 वर्षों तक प्रोग्राम मेनेजर के रूप में बेंगलुरु में एक जर्मन मल्टीनेशनल सॉफ्टवेयर कॉर्पोरेशन में काम किया.  मप्र के संदलपुर में पैतृक घर होने के कारण उनका हर साल अपने गाँव धार्मिक अनुष्ठानों के लिए आना जारी रहा, जो गांव के पुजारी या “महंत”  की एक तरह से जिम्मेदारी थे.

यह पूछे जाने पर कि क्या अपना घर बेचना और नौकरी छोड़ना एक आसान निर्णय था, उन्होंने कहा, “मुझे लगता है कि किसी को अपने जीवन में कुछ निर्णय लेने चाहिए जो हमारे लिए कई बार बहुत मुश्किल होते हैं.  दोनों फैसले पूरी तरह से लेना बहुत मुश्किल था.”

 



काम की शुरुआत

उनका काम जुलाई 2010 में संत सिंगाजी इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस एंड मैनेजमेंट के पहले बैच के साथ शुरू हुआ. वह 50 छात्रों के ग्रुप को बेंगलुरु और पूरे भारत के कई अन्य शहरों में ले गए इस उम्मीद के साथ कि छात्र अपने जीवन में कुछ बड़ा करेंगे.  उन्होंने कहा कि ग्रामीण युवाओं से जुड़ना मेरे लिए आसान काम नहीं था क्योंकि मेरा बैकग्राउंड और परवरिश इन बच्चों से काफी अलग था. इसलिए उनके सपनों को साकार करने के लिए, मैंने उन्हें मल्टीनेशनल कंपनियों जैसे इन्फोसिस, बायोकॉन, एसएपी और कई अन्य फर्मों में ले जाने का फैसला किया, जहां वे एक अच्छी ज़िंदगी जीने की कल्पना कर सकते थे.”

प्रांजल दुबे कई वर्षों तक संदलपुर में संत सिंगाजी मंदिर के महंत रहे थे और अब उन्होंने डिग्री स्तर पर अच्छी गुणवत्ता की कॉलेज शिक्षा प्रदान करके आसपास के क्षेत्रों में आर्थिक और सामाजिक रूप से उत्थान करने का निर्णय लिया है.  संस्थान का नाम भी गुरु संत सिंगाजी की शिक्षाओं से प्रेरित था.

दुबे ने कहा कि गतिविधि शुरू में एक स्थानीय धर्मशाला में 100 छात्रों और 15 शिक्षकों के साथ शुरू की गई थी. “बाद में, हमने पीजी कॉलेजों का दौरा किया और नए स्नातकों को काम पर रखा और फिर अपने अनुसार उन्हें प्रशिक्षण दिया. अब 30 से अधिक शिक्षक सक्रिय हैं.”

 


 

 

वह घटना जिसने जीवन बदल दिया

प्रांजल दुबे एक ऐसे परिवार से हैं, जिन्होंने परंपरागत रूप से संत सिंगाजी मंदिर के लिए मुख्य पुजारी प्रदान किया है.  इसलिए साल में एक बार वार्षिक अनुष्ठान करने के लिए उन्हें अपने पैतृक गाँव वापस जाना पड़ता था. गाँव पहुँचने पर वह खुद की और गाँव की बुनियादी दूरियों को देख कर सोच में पड़ जाते थे, उनकी जीवनशैली और गाँव की जीवनशैली के बीच एक गाँव के अभाव की गहरी खाई थी. मगर यह सारा सोच संकोच उसी वक़्त तक रहता जब तक वह गांव में रहते बैंगलोर आने पर सब कुछ पहले की तरह सामान्य हो जाता.  

साल 2006 में जब एक माता-पिता अपने बेटे के साथ दुबे के पास पहुंचे और उनसे कहा, “कृपया, महंतजी, आपको मेरे बेटे को नौकरी खोजने में मदद करनी होगी.  मैंने सुना है जिस कंपनी के लिए आप काम करते हैं वह बहुत बड़ी है. क्या आप कृपया उसे वहाँ एक छोटी सी नौकरी दिलवा सकते हैं? ”

प्रांजल ने देखा लड़के ने केवल अपनी बुनियादी स्कूली शिक्षा पूरी की है;  उन्होंने उसे एक डिग्री प्राप्त करने की सलाह दी, जिसके बिना नौकरी करना मुश्किल होगा. दो साल बाद, दुबे की संदलपुर यात्रा के दौरान, उनसे पिता और पुत्र दोनों दुबारा आ कर मिले.

माता-पिता ने निवेदन किया, “हमने इसे एक डिग्री दिलाई है.  हमने अपनी जमीन बेची और यह डिग्री खरीदी. अब तुम उसे तुम्हारी तरह नौकरी दिलवाओगे?”

अपनी एक लापरवाह सलाह का यह परिणाम देख कर वह चौंक गए.  लड़के और उसके पिता ने जो ‘डिग्री’ खरीदी थी, वह केवल एक कागज़ का टुकड़ा था.  हालाँकि, परिवार की आजीविका का एकमात्र स्रोत वो  ज़मीन जिसे बेच दिया गया था वह अब इस बेकार कागज पर निर्भर था.

यह घटना, प्रांजल के लिए, साथ ही साथ संदलपुर के लिए, परिवर्तन की उत्पत्ति बन गई, जिसने तकनीकी और उनकी शिक्षाविदों की टीम के माध्यम से आशा की एक किरण देखी.  इस प्रकार 1,000 से अधिक छात्रों के साथ संत सिंगाजी इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस एंड मैनेजमेंट (SSISM) कॉलेज की स्थापना हुई.

 

शिक्षा से बदलाव का प्रयास 


SSISM के संस्थापकों ने आशा व्यक्त की कि प्रशिक्षण और इंटर्नशिप के माध्यम से रोज़गार, कैरियर काउन्सलिंग, आर्थिक सहायता और निम्न आर्थिक स्तर से छात्रों को छात्रवृत्ति और माता-पिता के माध्यम से लड़कियों की शिक्षा पर विशेष ध्यान देना, इस क्षेत्र के समग्र सामाजिक-आर्थिक विकास में मदद करेगा.

तर्कसंगत से बात करते हुए दुबे कहते हैं, “हमारे पास लगभग 200 गांवों के 1000 छात्र हैं, और उनमें से 50-60% लड़कियां हैं, जबकि कई छात्रों को एमएनसी आदि में भी रखा गया है.”

तो, इस फोकस के साथ, कॉलेज ने कंप्यूटर साइंस, माइक्रोबायोलॉजी, बिजनेस एडमिनिस्ट्रेशन, कॉमर्स (बी.कॉम) और आर्ट्स (बी.ए.) में डिग्री (बी.एससी।) और स्नातक डिग्री स्तर के पाठ्यक्रमों को जोड़ा है.



उपलब्धियां

कुछ ही समय में, SSISM ने शानदार परिणाम प्राप्त किए हैं, जहाँ 14 छात्रों (सभी लड़कियों) ने मध्य प्रदेश विश्वविद्यालय रैंक प्राप्त की है.  इसके कुछ ग्रेजुएट कॉग्निजेंट टेक्नोलॉजी सॉल्यूशंस कॉर्प, इंफोसिस लिमिटेड और एसएपी जैसी कंपनियों में बेंगलुरु, हैदराबाद और पुणे के सॉफ्टवेयर हब में काम करते हैं. और इसके 100 से अधिक ग्रेजुएट अब शिक्षक हैं.

वंदना जोशी एक छोटी सी दुकान के मालिक की बेटी हैं, उनका सपना अपने परिवार के लिए कुछ करना था.  SSISM कॉलेज से BCA पूरा करने के बाद, अब वह कॉग्निजंट टेक्नोलॉजी से जुड़ गई हैं.

किसान का बेटा नवीन सरन बहुत अच्छा क्रिकेटर रहा है, वह एक स्थानीय कंपनी में था जहाँ जागरूकता की कमी और उचित मार्गदर्शन के कारण उसकी ऊर्जा और क्षमता को गुमराह किया जा रहा था.  उन्होंने आखिरकार अपना करियर बनाने पर ध्यान केंद्रित करना शुरू कर दिया और स्कॉलर के रूप में एसएपी लैब्स बैंगलोर में शामिल हो गए.

बहुत सारे छात्र ऐसे हैं जिन्होंने बहुत अच्छी नौकरियां प्राप्त की हैं और अपने उत्साह और कड़ी मेहनत के कारण अच्छी कमाई कर रहे हैं.  दुबे ने कहा, “जब मैं इन बच्चों को कड़ी मेहनत करते देखता हूं और अपने जीवन में सफलता प्राप्त करता हूं, तो यह मुझे एहसास दिलाता है कि मुझे उनके साथ कुछ करना है.”

 


 

“कैंपस में दो सॉफ्टवेयर कंपनियां चल रही हैं.  एक लंदन स्थित कंपनी है जिसे ‘क्लाउडिएट’ कहा जाता है, और दूसरे को सिंगाजी सॉफ्टवेयर सॉल्यूशंस (एसएसएस) के रूप में नामित किया गया है, और हम इन कंपनियों के लिए कॉलेज से छात्रों को हायर पर लेते हैं, “दुबे ने कहा.



भविष्य की योजनाएं

अपने परिवार के मदद से, प्रांजल दुबे अपने सपनों को हासिल करने में सक्षम रहे हैं.  उन्होंने कहा, “मैं अपने काम में बहुत अधिक व्यवस्थित और सफल था, इसलिए यह वास्तव में मेरे परिवार और मेरे लिए एक आसान काम नहीं था, लेकिन वे मेरे फैसले के लिए सहमत थे,” उन्होंने कहा.

जब उनसे भविष्य की योजनाओं के बारे में पूछा गया तो उन्होंने कहा कि 2025 तक, संत सिंगाजी एजुकेशनल सोसाइटी एक निश्चित समय पर 15000 छात्रों को समग्र शिक्षा प्रदान करेगी.  इस क्षेत्र को “सिंगाजी एजुकेशनल विलेज” से जाना जाएगा. यह ग्रामीण भारत के सामाजिक-आर्थिक परिवर्तन की ओर अग्रसर समाज पर सकारात्मक सामाजिक प्रभाव डाल सकेगा. वह अपने गांव में जैविक खेती का विस्तार करना चाहते हैं और इस प्रक्रिया में अधिक से अधिक छात्रों को शामिल करना चाहते हैं.

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