मेरी कहानी

मेरी कहानी : ख़ुश हूं, अपने कस्टमर्स ख़ुद चुनती हूं और जीवन भी अपनी शर्तों पर जीती हूं.

तर्कसंगत

Image Credits: Universityex/Representaional

May 24, 2019

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मैं मुंबई में रहने वाली एक 30 वर्षीय महिला हूं. अकेली रहती हूं और एक ऐसे प्रोफेशन में हूं जिसे समाज ठीक नहीं समझता. किसी दवाब में ये रास्ता नहीं चुना लेकिन अब इसके आगे कुछ नज़र भी नहीं आता. ख़ुश हूं, अपने कस्टमर्स ख़ुद चुनती हूं और जीवन भी अपनी शर्तों पर जीती हूं.

पर हमेशा से ऐसा नहीं था. मध्यप्रदेश के एक छोटे से कस्बे के रूढ़िवादी कायस्थ परिवार में मेरा बचपन बीता. पढ़ाई में मेरा बड़ा मन था और मैं पढ़ लिखकर डॉक्टर बनना चाहती थी. लेकिन शायद तकदीर को कुछ और मंजूर था. मैं बेहद खूबसूरत थी, जब तक कुछ होश सम्हालने लायक हो पाती, मोहल्ले में ही अपनी उम्र से 5 साल बड़े एक हैंडसम लड़के के साथ मेरा अफेयर हो गया.

उस वक़्त उतनी समझ नहीं थी और मैं भी प्यार में साथ निभाने, जीने मरने के सपने उसके साथ देखने लगी. घर पर झूठ बोलकर, छुप छुप के मिलने में, लैंडलाइन पर रातों को लंबी लंबी बातें करने में बड़ा मज़ा आने लगा. कब बहक गई पता ही नहीं चला. वो भी मुझे लेकर सीरियस था लेकिन शायद अपने दोस्तों के बीच मुझको लेकर शेखी बघारता था. मोबाइल तब नए नए ही चले थे और प्यार के उन कीमती पलों को उसने कब मोबाइल में क़ैद कर लिया, मुझको पता ही नहीं चला.

उसकी एक बेवकूफी ने मेरी पूरी ज़िन्दगी बदल दी. वो वीडियो, एक मोबाइल से दूसरे मोबाइल और पूरे शहर भर में पहुंच गई. मेरे परिवार का घर से बाहर निकलना दूभर हो गया. घर में एक मातम सा बना ही रहता. कोई किसी से कोई बात नहीं करता था और परेशानियां थी कि ख़तम होने का नाम नहीं ले रहीं थीं. पापा एक छोटी सी दुकान पर हिसाब का काम करते थे, मेरी वजह से वो भी छूट गया. मन में कई बार ख़ुदकुशी का ख्याल आया, लगा मेरे ख़तम हो जाने के बाद घर की परेशानियां भी ख़तम हो जाएगी लेकिन कभी हिम्मत ना जुटा सकी.

स्कूल 11वीं क्लास में ही छूट गया और घर को दोबारा चलाने के लिए, मुझे बहुत दूर बुआ के पास पूना भेज दिया गया. बुआ ने पापा की मेरे दोबारा स्कूल जाने की इच्छा को सिरे से नकार दिया और वे मुझ पर कड़ी निग़ाह रखतीं. उनका दिन में दो तीन बार मेरे चरित्र को लेकर ताने मार देना आम था. हद तो तब हो गई जब उन्होंने अपने बेटे, जिसे मैंने हमेशा से अपना भाई माना था, मुझ जैसी लड़कियों से दूर रहने को लेकर पूरा एक लेक्चर देे दिया. पूना में शायद अकेला वही था जिससे मैं नॉर्मल थी लेकिन चोर की दाढ़ी में तिनका, मेरा पहले से हिला हुआ आत्म विश्वास रसातल को चला गया.

घर लौट कर जा नहीं सकती थी, उसी रात को मैंने अकेले ही पूना छोड़ दिया. पास का बड़ा शहर मुंबई था और मेरी क़िस्मत मुझे वहीं ले गई. एक अनजान शहर में, मैं एक अकेली लड़की, जिसके अतीत से वो भाग रही थी. अब कैसे कैसे समझौते कर मैं इस प्रोफेशन में आ गई और किन किन मुश्किलों से गुजरी, मैं यह बताकर बात भटकाना नहीं चाहती.

घर की बहुत याद आती थी और एक दो बार मां पापा को मिलने पास वाले शहर भी गई, मां ने फ़ोन पर कई बार मुझे समझाया भी, लेकिन जिस रास्ते पर मैं निकल आयी थी वहां से लौटना मेरे लिए मुश्किल था. धीरे धीरे मैंने उनसे भी बात करना कम कर दिया और ख़ुद को एक कोकून में क़ैद कर लिया.

आज जीवन के इस पड़ाव पर, मुंबई में लड़के लड़कियों को ख़ुशी ख़ुशी प्यार की पींगे डालते हुए देखती हूं तो मन कई बार शंकाओं से घिर जाता है. लगता है रोक लूं उन लड़कियों को और सावधान कर दूं. अगले ही पल यथार्थ में लौटती हूं और उनकी अच्छी किस्मत के लिए कामना करती हूं. ख़ुद को समझाती हूं कि सभी की किस्मत एक जैसे थोड़े ना होती है.

पर क्या मेरी क़िस्मत सच में ख़राब थी? या मुझे समाज ने अपनी खुन्नस निकालने का जरिया बनाया? समाज ने मुझे भी उस लड़के की तरह क्यों नहीं अपनाया जो आज भी उनके बीच, बड़े आराम से परिवार के साथ रह रहा है? क्यों जो भी हुआ उसके लिए सिर्फ़ मुझे ही जिम्मेदार ठहरा दिया गया? आख़िर मेरी वर्तमान परिस्थिति का जिम्मेवार कौन है?

स्रोत : आयरा अविशि

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