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नरेंद्र मोदी जी की जीत कहीं से भी कमजोर विपक्ष, मुग्ध मीडिया, अल्पज्ञानी जनता के लिए चौकाने वाली बात नहीं है

तर्कसंगत

May 27, 2019

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17 वीं लोकसभा के लिए शपथ ग्रहण समारोह की तारीख और समय तय होने के साथ ही, मोदी-शाह की जोड़ी ने एक बार फिर अपनी राजनीतिक कुशलता को ज़ाहिर किया है. इसी के बदौलत उन्हें पिछले बार से ज़्यादा सीट और वोट प्रतिशत भी मिले. चुनाव के पहले 2014 के तरह की ‘मोदी लहर’ जैसी बातें नहीं थी. न ही किसी भाजपा कार्यकर्ता या नेता ने अपने भाषणों में इसका बढ़ चढ़ कर ज़िक्र किया हो. यह कहना कहीं से भी ग़लत नहीं होगा कि भाजपा के जीतने में उसकी नीतियों, उसके नेताओं, सांसदों से ज़्यादा भूमिका मोदी-शाह जोड़ी की रही. इस चुनाव में इनके कैबिनेट के मिनस्टरों ने चुनाव भी नहीं लड़ा और न ही चुनावी सभायें आयोजित की, जिस मैराथन तरीके से इस जोड़ी ने रैलियों को सम्बोधित किया. तो एक तरह से भाजपा ने नहीं बल्कि मोदी-शाह ने यह चुनाव जीत लिया है और अब अपनी सरकार बनाएंगे जिसमें भाजपा के कुछ नेताओं को भी जगह दी जाएगी.

इस चुनाव में ध्यान देने वाली कुछ बातें है, जिनका पिछली मोदी सरकार से कोई सरोकार नहीं दिखाया गया था. जीएसटी, नोटबंदी, दो आरबीआई गवर्नर का इस्तीफा, बैंकों के बढ़ते एनपीए, 45 साल की बढ़ती बेरोज़गारी, किसानो का लगातार आंदोलन जिसे मीडिया पर भी कम जगह दी गयी.

गुजरात के मुख्यमंत्री से लेकर भारत के प्रधानमंत्री बनने तक मोदी जी के इस सफर में, ब्रांडिंग की भूमिका सबसे अहम थी और अभी भी है. इन्हें तब के प्रधानमंत्री स्वर्गीय अटल बिहारी वाजपेयी जी ने गुजरात के मुख्यमंत्री रहते हुए राजधर्म का पालन करने की आशा जताई थी, उस समय से लेकर अभी तक के समय में इनकी ब्रांडिंग कई तरीके से हुई 2002 के दंगो के बाद विकास पुरुष के तौर पर पहचान दी गयी,  2014 में यह चाय वाले के इमेज में थे, 2019 में चौकीदार हुए. इन सारे ब्रांडिंग से जनता केवल अपने आपको इनमें तलाश रही थी, और यह ट्रिक विपक्ष के नेताओं में नहीं थी.

जनता भावनात्मक रूप से इनसे जुड़ने लगी, और जहाँ भावना का खेल होता है वहां व्यवहारिकता का कोई माने मतलब नहीं होता.

 

भाषण की कला

हालाँकि इनके दिए गए भाषणों का फैक्ट चेक करना एक ज़रूरी पहलु बन चुका है, जिससे इनके भाषण के बाद जनता को उसकी सत्यता से अभी अवगत कराया जाए मगर जनता को इनके भाषा शैली निरंतर अपने तरफ लुभाती रही है. अगर हम यह कहें कि इनकी भाषण की शैली में शालीनता, मृदुभाषिता जैसे चीज़ें व्यापत हैं तो हम इनके भाषण का अपमान कर रहे होंगे. इनके भाषण की शैली में वो बातें हैं जो एक आम आदमी  सुनना चाहता है,  वैसा आम आदमी जो अपनी नाकामियों के लिए सरकार (कांग्रेस), परिवार (गाँधी), पड़ोसी (पाकिस्तान), भगवान आदि को दोषी मानता है, जिसे यह लगता है कि हमारे पूर्वजों ने कोई गलती की जिसकी वजह से हमें आज मुसीबत उठानी पड़ रही है. कुछ समर्थकों का यहाँ तक कहना है कि यह भारत के ‘इलीट क्लास’ के विरोध में बोलते हैं. तो एक आम आदमी अपनी कुंठा को इनके आवाज़ में सुनता है. इतना बस हो जाना काफी है वह यहीं से भावनातमक रिश्ते से जुड़ने लगता है और मान लेता है कि पीछले 70 सालों में देश ने उसके लिए कुछ नहीं किया.

 

चुनाव अभियान की पहचान

2014 की चुनाव में इन्होनें खुद को चायवाले के रूप में जनता के सामने पेश किया, भावनात्मक रूप से जनता जुड़ गयी, 2019 में चौकीदार के भेष में भी इतिहास की पुनरावृति हुई, नतीजा यह कि भावनात्मक रूप से जनता जुड़ते चली गयी. जनता को यह अच्छा लगता है कि कोई उच्च पद पर आसीन व्यक्ति खुद को उनके जैसा या उनको अपने जैसा बता दे, फिर वह उस गुरबत में रह कर भी खुश और संतुष्ट हो जाती है, उसमें आशा की दीप जल जाती है कि यह हमारे लिए कुछ करेगा. न सिर्फ मोदी जी बल्कि भाजपा के सभी नेताओं ने अपने नाम के आगे चौकीदार लगाना शुरू कर दिया, और जैसे ही परिणाम की घोषणा हुई ‘चौकीदार’ आगे से हटा दिया  गया.

बहरहाल यह गुण विपक्ष में किसी भी नेता के पास या उनके आईटी सेल के पास नहीं थी, जिसका वो फायदा उठा सके.

 

मतदातों का ज्ञान

इस विषय में हमें निराशा ही हाथ लगी, कई सारे समर्थकों को बस यह विश्वास था की मोदी जी पाकिस्तान को मुंहतोड़ जवाब देंगे, राष्टभक्ति अचानक से इस चुनाव का बड़ा मुद्दा बन गया, काले धन को रोकने वाले महत्वकांक्षी कदम नोटबंदी के बाद इस चुनाव में लगभग 3500 करोड़ के काल धन, कॅश, शराब, जेवर आदि के रूप में जब्त हुआ मगर उस पर जनता निशब्द थी. इलेक्टोरल बांड के ज़रिये सबसे ज़्यादा चंदा भाजपा को दिया गया मगर किसने दिया इसका सवाल जनता के मन में नहीं कौंधा. पाकिस्तान को जवाब देना हमारे लिए एक बड़ी चुनौती बन गयी पुलवामा और बालाकोट के विवादित एयर स्ट्राइक के बाद बाकी सारे मुद्दे बौने हो गए, रोजगार, अर्थव्यवस्था, बैंकों की खस्ताहाल, किसानों की ख़ुदकुशी, शिक्षा के लिए लगातार गिरता बजट, पेट्रोल और डीजल की दामों में समानता और उसके कारण बढ़ती महंगाई सब छूमंतर हो गयी थी. जनता मौन उसे लगा राष्ट्र इतनी मुसीबतों से जूझ रहा है तो उसको मुंह खोलना कैसे सही हो सकता है? यह सवाल नहीं हुआ कि पुलवामा में किसकी गलती थी, या उसकी नैतिक जिम्मेदारी किसकी बनती थी और उसके खिलाफ क्या कदम उठया गया ? बेरोज़गारी इतनी कैसे बढ़ी? मेक इन इंडिया आदि जैसे योजनाओं का क्या हुआ? कौशल विकास योजना से कितने लोगों को आज सम्मानजनक नौकरियां मिली ? जन धन योजना के अंतर्गत अकाउंट तो खुले मगर मनरेगा के तहत उसमें पैसे कितने जमा हुए? इसके आंकड़े इस बार सरकार ने भी साझा नहीं किये और न ही इन सवालों का जवाब दिया गया.

 

सोशल मीडिया पर पकड़

सबसे महत्वपूर्ण कड़ी यह है जिसके कारण से हमें जो दिखाया गया हमने उसे सही समझा और माना भी. अकेले लोकसभा चुनाव के लिए ट्विटर पर 369 मिलियन ट्वीट किए गए और इसमें से, प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी (@NarendraModi) चुनावों के दौरान सबसे अधिक उल्लेखित राजनीतिक व्यक्तित्व के रूप में उभरे, जबकि @ BJP4India लाइवमिंट के अनुसार सबसे अधिक उल्लेखित राजनीतिक दल थी.

द हिंदू ने बताया कि सत्ताधारी पार्टी भाजपा ने फेसबुक पर 2,500 से अधिक विज्ञापनों के लिए Facebook पर 4.23 करोड़ खर्च किए. ‘My First Vote for Modi’, ‘Bharat Ke Mann Ki Baat’ और ‘Nation with NaMo’ जैसे विज्ञापनों के लिए 4 करोड़ से अधिक का खर्च किया गया. Google के विज्ञापन प्लेटफार्मों पर, इसी उद्देश्य के लिए 17 करोड़ से अधिक खर्च किए गए थे.

यह सारा खर्च मोदी ब्रांड को जनता से जोड़ने के लिए किया गया, गैर राजनीतिक इंटरव्यू जैसे चीज़ें ने भी अपनी भूमिका निभाई, और इस पूरा तंत्र के सामने बिखरा विपक्ष मूकदर्शक बना खड़ा रहा है.

टेलीविज़न पर भी देखा जाए तो मोदी जी को सबसे ज़्यादा घंटों के लिए दिखया गया, बिज़नेस टुडे की एक रिपोर्ट की मानें तो मोदी जी को 722 घंटों का एयरटाइम मिला, मिला जबकि राहुल गाँधी को केवल 252 घंटे का और यह आँकड़ा 15 मई तक का है.

 

जनतंत्र में विपक्ष

लोकतंत्रा में विपक्ष की भूमिका और रणनीति इस बार कहीं से भी  जनता के समझ से बाहर थी, और इसका खामियाज़ा भी लोकतंत्र को ही उठाना पड़ा, पिछले बार की तरह इस बार भी सरकार से सवाल पूछने के लिए विपक्ष नहीं है, इसके मायने ये हैं कि हमने यह मान लिया कि मोदी जी जो करेंगे अच्छा करेंगे, यह ब्रांडिंग का कमाल नहीं तो और क्या है? इतना विश्वास तो हम अपने घर के लोगों पर भी नहीं करते जितना विश्वास हमने सत्ता को दिया है, एक मजबूत सरकार के साथ मजबूत विपक्ष भी लोकतंत्र के लिए उतनी ही ज़रूरी है, जनता राजनीती का ज्ञान अपने फायदे और नुक्सान से तौल कर करती है, सरकार के कदम और योजनाओं पर नज़र रखना पत्रकारिता और विपक्ष का काम है जिससे जनता और राष्ट्र के हक़ में लिए गए फैसलों की जांच कर सके. विपक्ष और जनता का कर्तव्य है कि विपक्ष को भी मज़बूत बनाये जो सरकार पर कड़ी नज़र रख सके.

कुल मिलाकर इस बार का चुनाव देश का अब तक का सबसे महंगा चुनाव राष्ट्रवाद, निम्न भाषण स्तर, कमज़ोर विपक्ष, मोदी ब्रांडिंग पर लड़ा गया और मोदी-शाह की जोड़ी द्वारा जीता भी गया.

 

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