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मैन्युफैक्चरिंग और इनोवेशन के क्षेत्र में बदहाली के बाद, सरकार को अपने प्रयास में बदलाव लाने होंगे

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Image Credits: Business World

May 28, 2019

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नेशनल सैंपल सर्वे ऑफिस (NSSO) की रिपोर्ट के अनुसार, 2017-18 में भारत की बेरोजगारी 6.1% थी. जो की 40 साल में सबसे ज़्यादा है. रिपोर्ट में यह भी उल्लेख किया गया है कि 2018 में 1.1 करोड़ भारतीयों ने अपनी नौकरी खो दी थी. आगामी सरकार को अपने  “सबका विकास” वाले नारे को एक वास्तविकता बनाना  होगा.

देश में इस रोजगार दर के प्राथमिक कारणों में से एक ‘मैन्युफैक्चरिंग और इनोवेशन’ की कमी है. देश को इस खतरे से बाहर निकालने के लिए, आगामी सरकार को भारत को मैन्युफैक्चरिंग हब में बदलने के अपने प्रयासों को दोगुना करना होगा.

2014 में, ‘मेक इन इंडिया’ शुरू करने वाली योजनाओं के बीच भाजपा ने सत्ता में आने के बाद इस योजना की परिकल्पना घरेलू कंपनियों को अवसर देकर और बहुराष्ट्रीय कंपनियों को देश में कारखानों को स्थापित करने के लिए भारत को एक वैश्विक मैन्युफैक्चरिंग सेंटर बनाने की परिकल्पना की थी. सरकार ने मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्र में वृद्धि को 12-14% प्रति वर्ष करने का लक्ष्य रखा, सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में मैन्युफैक्चरिंग का हिस्सा 2022 तक 25% बढ़ाने का लक्ष्य है. सरकार ने मैन्युफैक्चरिंग में 100 मिलियन नौकरी देने की भी योजना बनाई है.

हालांकि, अगले पांच साल में विशेषज्ञों का कहना है कि केवल स्मार्टफोन उद्योग ही बेहतर होने वाला है. ‘मेक इन इंडिया’ की घोषणा के बाद से लगभग 40 मोबाइल फोन प्लांटों ने भारत में स्थापित हुए है. इस क्षेत्र में 2020 तक आठ लाख नौकरियों का उत्पादन होने की उम्मीद है.

प्रौद्योगिकी की कमी और खराब बुनियादी ढांचा निवेशकों के लिए भारतीय बाजार में गिरावट के प्रमुख कारक हैं.

वर्तमान ट्रेडिंग वॉल्यूम बताता है कि ‘मेक इन इंडिया’ ने अपेक्षित प्रगति नहीं की है. भारत में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) वित्तीय वर्ष 2017-2018 में केवल 3% बढ़कर 61.69 बिलियन डॉलर हो गया है, जबकि 2014-15 में 27% FDI विकास हुआ था.

विशेषज्ञों का सुझाव है कि अधिक विदेशी निवेशों को आकर्षित करने के लिए, सरकार को घरेलू निवेशों को पुनर्जीवित करना और भारत में व्यापार करने में और आसानी करना आवश्यक है. वर्तमान शासन के तहत, मैन्युफैक्चरिंग में एफडीआई ने कुल विदेशी प्रत्यक्ष निवेश का 28% का गठन किया, जो यूपीए-एल के दौरान 44% के औसत से नीचे है.

वैश्विक इनोवेशन सूचकांक में भारत 53 वें स्थान पर है. एशियाई देशों में, भारत सिंगापुर, मालदीव, जापान और थाईलैंड से पीछे है. इससे स्पष्ट होता है कि यदि भारत को वैश्विक इनोवेशन सूचकांक में अपना रुख सुधारना है, तो अगले पांच वर्षों में देश को सेवा और उपभोग से इनोवेशन आधारित और ज्ञान-आधारित अर्थव्यवस्था से आगे बढ़ना होगा. सरकार और नीति निर्माताओं को उद्यमियों का समर्थन करना और एक ऐसा वातावरण बनाना होगा जो रिसर्च और इनोवेशन  को बढ़ावा दे.

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