मेरी कहानी

मेरी कहानी: अपनी पत्नी के हरेक मुश्किल हालातों से लड़ने के जज़्बे को सलाम करने का मन होता है

तर्कसंगत

May 28, 2019

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मध्यप्रदेश के मुरैना से ताल्लुक रखने वाला, मैं एक कट्टर वैश्य संयुक्त परिवार का तीसरा और सबसे छोटा बेटा था. शहर के मुख्य बाज़ार में दुकान थी, जिसे तीनों भाई सम्मिलित रूप से चलाते थे. साल 1985 में जब नज़दीक के आगरा शहर से मेरे लिए विवाह का सम्बन्ध आया तो पूरे परिवार के लिए आश्चर्य वाला था कि बचपन में ही पिता को खोने वाली मेरी होने वाली पत्नी ने, 9 भाइयों बहनों वाले परिवार में रहकर एम.ए. बीएड किया था.

मोहल्ले के दोस्तों ने डराया था कि पढ़ी लिखी बीवी का घर पर रौब रहेगा. मैं भी शंकाओं से आसक्त था और शादी के कई सालों बाद तक अपना रौब बरक़रार रखा. बिन मां बाप की मेरी पत्नी भी, बिना कुछ कहे सब सहती रही. परिवार आगे बढ़ा और हमें दो पुत्रों की प्राप्ति हुई. वहीं दूसरी ओर, संयुक्त परिवार की हमारी दुकान, एक बड़े परिवार के खर्चों को बस पूरा ही कर पा रही थी.

रोज़गार कार्यालय से आई एक विज्ञप्ति के जवाब में, मेरी पत्नी ने सहायक सरकारी शिक्षक के पद के लिए आवेदन भर दिया. ग्रेड्स अच्छे थे ही और परीक्षा इंटरव्यू पास करने के बाद, उसका ऑफर लेटर भी आ गया. अब ये पूरे परिवार के लिए चिंता का विषय हो गया क्यूंकि उस समय तक, जब घर के किसी पुरुष सदस्य ने कभी नौकरी ही नहीं की थी तब मेरी पत्नी का बाहर निकलना और वो भी नौकरी करना, एक मुश्किल प्रश्न था, साथ ही समाज की दुश्वारियां अलग.  

ख़ैर, पूरे परिवार के विरोध के बावजूद मेरी पत्नी ने अपना निश्चय अडिग रखा. मैं तो उसके आत्मविश्वास से ही उलझन में था कि हां करूं या ना. शुरू में शहर के पास के एक गांव में पोस्टिंग थी लेकिन कुछ समय बाद, उसने शहर में ही स्थानांतरण ले लिया. संयुक्त परिवार वाला घर भी छोटा पड़ने लगा और हमने शहर में ही एक अलग छोटा सा घर ले लिया.

मैं अधिकतर दुकान पर ही व्यस्त रहता लेकिन मेरी पत्नी ने घर और बाहर की जिम्मेदारियों को बखूबी निभाया. दोनों पुत्रों की अच्छे से शिक्षा दीक्षा हुई और  दोनों की बड़े शहरों में अच्छी तनख्वाह पर नौकरी लगी. मेरी पत्नी ने दोनों पुत्र वधू भी अपनी तरह पढ़ी लिखी और नौकरी वाली ली, आज सभी अच्छे से सेटल्ड हैं. 

उम्र के इस पड़ाव पर, जब मैं अपने भरे पूरे परिवार को देखता हूं तो अपनी पत्नी के हरेक मुश्किल हालातों से लड़ने के जज़्बे को सलाम करने का मन होता है. मैं शायद कभी भी अकेला इतना सब नहीं कर पाता, अब पत्नी के लिए सम्मान कई गुना बढ़ चुका है और जितना संभव हो सके उसका हाथ बंटाता हूं. शास्त्रों ने बिल्कुल सही कहा है.

यत्र नार्यस्तु पूज्यंते रमंते तत्र देवता:

 
कहानी : महेश चंद्र जैन
 
स्त्रोत: आयरा अविशि

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