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सूरत शहर के हीरो-23 साल के केतन ने छात्रों की जान बचाने के लिये खुद की जान दांव पर लगा दी.

तर्कसंगत

Image Credits: India Today

May 29, 2019

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जब सारा देश उन 20 छात्रों की मौत का शोक मना रहा है जो सूरत ,गुजरात में कोचिंग इंस्टीट्यूट में लगी आग के कारण अपनी जान खो बैठे.अब इस दुखद घटना का एक ऐसा वीडियो सामने आ रहा है जहां एक लड़का बहादुरी दिखाते हुए इन छात्रों की जान बचाते हुए नज़र आ रहा हैं.

जब पूरी इमारत में धुआं फैल चुका था छात्रों ने आग से बचने के लिये खिडक़ीयों से कूदना शुरू कर दिया.माना जा रहा है की आग वहां अधिकारियों की लापरवाही की वजह से लगी. इन्ही वीडियोज़ मे एक आदमी खिड़की से लटकते साफ देखा जा सकता है.वह अपनी जान बचाने के लिये वहां नही है. वह वहां उन छात्रों के जीवन बचाने के लिये है जो उस इमारत में फसे हैं.

 

सूरत के नायक.

मई 24,को सूरत के 23 वर्षीय केतन नरनभाई चोडवाडिया घर की ओर वापस जा रहे थे तभी उन्हे राह पर इमारत से घना धुआं आता दिखा.

तर्कसंगत से बात करते हुए केतन ने कहा-“जब मैने उन बच्चों को खिड़कियों से कूदते हुए देखा मैं अपनी आँखों पर विश्वास नही कर सकता था, मै भयभीत था. लेकिन जानता था कि मुझे कुछ करना चाहिये.”

केतन एक बी.कॉम ग्रैजुएट हैं. वह अपनी पिता की फैक्ट्री के काम में हाथ बँटाते हैं जहां वे डायनींग डिस्पोज़ल का उत्पादन करते है.

हादसे के समय केतन के पिता उन्ही के साथ थे और उन्ही ने केतन को बच्चों की जान बचाने के लिये प्रोत्साहित किया.अधिकारियों के आने से पहले ही केतन ने ऊपर चढने के लिये सीड़ी का इन्तज़ाम किया और वह किसी तरह इमारत के तीसरे माले पर पहुंचे.

“उस आग के धुए ने मुझे लगभग अन्धा कर दिया था, लेकिन मैं डरा नही और साहस बनाए रखा लेकिन वहां यह सब देख कर मै शुरुआत में घबरा ज़रूर गया कि वे छात्र मौत के करीब थे, मैने पहले दो लड़कियों को गिरने से बचाया और निश्चित किया कि वे सुरक्षित रूप से नीचे उतर पाएँ फिर मैं दूसरे लोगों की मदद करने के लिये पहुँचा”- केतन ने कहा.

“मै बहुत निराश हूँ कि मैं सिर्फ आठ से दस छात्रों को ही बचा पाया और बाकी कितने ही लोगो ने अपनी जान खो दी. मैं हैरान हूँ कि किस प्रकार से ऐसी लापरवाही के कारण आग लगी और यह गुस्सा देने वाला था कि कुछ लोग मदद न कर हादसे की फोटो और वीडियो ले रहे थे.”-केतन का कहना था.

केतन ने यह निश्चित किया की वहां मौजूद लोग चोटिल लोगों को अस्पताल ले जायें. लेकिन वह वहीं रहे क्यूंकि बच्चों को उनकी वहां ज़रूरत थी.

 

2006 में बाढ़ पीड़ितों की भी की थी मदद.

यह पहली बार नही है जब केतन ने ऐसी घटना के समय मदद की हो. सूरत 2006 में आई बाढ़ के समय भी 12 साल के केतन ने अपने पिता की खाने के पैकेट्स पैक और बाँटने में मदद की थी और ज़रूरतमंदों में बाँटे थे.

“मै मानता हूँ कि इन्सान के रूप में यह मेरा कर्तव्य है कि मैं लोगों की मदद करूँ और उनके लिये उपस्थित रहूँ जो ज़रूरतमंद हैं.” “कोई उन छात्रों को मरते हुए कैसे देख सकता था और उनकी वीडियोज़ बना सकता था. जबकी और भी जानें बचाई जा सकती थीं.” “किसी और की जान बचाने के लिये मैं खुद की जान को दाव पर लगाने में नही सोचूंगा.जब तक मैं जीवित हूँ, जिसे मेरी ज़रूरत है मैं हर किसी के लिये उपस्थित रहूँगा.”

केतन की इस निस्स्वार्थता ने इंसानियत पर हमारा विश्वास फिर जगा दिया, केतन जैसे ही कुछ आम लड़के/लड़कियाँ ही संकट के समय आगे आकर असली नायक बन कर उभरते हैं.

तर्कसंगत केतन की इस बहादुरी को सलाम करता है.

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