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RRB 6 और RRB 7 के आवेदकों के मसले में 12 तारीखें पड़ने के बाद भी एक सुनवाई नहीं हुई; अगली सुनवाई 1 जुलाई तक टली

तर्कसंगत

May 30, 2019

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30 सितंबर 2018 को आयोजित IBPS (इंस्टीट्यूशन ऑफ बैंकिंग पर्सनेल सिलेक्शन) RRB 7 को क्लीयर करने वाले तक़रीबन 11000 छात्र अभी भी अपने जॉब ऑफर्स का इंतजार कर रहे हैं. उन छात्रों की भर्ती प्रक्रिया को रोक दिया गया है और उनकी दलीलें अनसुनी रह गई हैं. तत्काल भर्ती की मांग का मामला सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के लिए लंबित है.

सभी आवेदकों में, 11000 का चयन विभिन्न पदों और श्रेणियों के लिए किया गया. शामिल होने से पहले, उम्मीदवारों को दस्तावेज़ सत्यापन के एक अंतिम चरण से गुजरना पड़ता था जिसके लिए हर उम्मीदवार के लिए बायोमेट्रिक डेटा की आवश्यकता होती है. कुछ बैंकों ने जनवरी के महीने में दस्तावेज़ सत्यापन के साथ शुरू किया क्योंकि 30 जनवरी 2019 को उच्चतम न्यायालय द्वारा स्टेटस क्वो लागू की गई थी, और 1000 छात्रों ने अपने दस्तावेजों के सत्यापन के तुरंत बाद अपने संबंधित बैंकों में शामिल हो गए. हालांकि, कुछ उम्मीदवारों के पास अप्रैल के महीने में उनके दस्तावेज सत्यापन की तारीख थी, जिससे आईबीपीएस को दस्तावेजों के साथ बैंकों को प्रदान करना मुश्किल हो गया. उन छात्रों को अब अनिश्चित अवधि के लिए इंतजार करना पड़ रहा है क्योंकि मामला अब कोर्ट में है.

 

मामला क्या है

IBPS का यह पूरा मामला RRB 6 के आवेदकों से जुड़ा है. दरअसल विवाद इस बात पर है कि RRB की परीक्षा में मेन लिस्ट में जिनका नाम आता है, वह अगर उस स्केल या उस बैंक में काम नहीं करना चाहते हुए ऑप्ट आउट करते हैं तो, उनके द्वारा रिक्त जगहों पर रिज़र्व लिस्ट के कैंडिडेट्स को लिया जाना चाहिए या नहीं. RRB 6 के आवेदकों के उम्मीदवारों का कहना है बैंकों द्वारा प्राप्त संख्या के अनुसार IBPS ने RRB 6 में जो रिक्त जगह थीं उन्हें RRB 7 में जोड़ कर विज्ञापन निकाला गया, नतीजा यह कि RRB 6 रिज़र्व लिस्ट के कैंडिडेट्स का मानना है कि उन्हें मौका ही नहीं मिला कि वो मेन लिस्ट में खाली रह गयी नौकरियों को ले सकें.

जानकार रिज़र्व लिस्ट के कैंडिडेट्स के बारे में यह बताते हैं कि उस लिस्ट की मियाद 1 साल या तब तक के लिए होती है जब तक नयी अलॉटमेंट लिस्ट न आ जाये. इस केस में RRB 6 के लिए 1 Feb 2018 से शुरू होकर 31 Jan 2019 को खत्म हो जानी थी. इस मौके को हाथ से छूटता देख रिज़र्व लिस्ट के कुछ आवेदकों में कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया और RTI द्वारक प्राप्त विभिन्न बैंकों से विभिन्न स्केल के लिए रिक्त स्थानों की स्तिथि का भी हवाला दिया जिसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने RRB 6 और RRB 7 पर स्टेटस क्वो लगा रखा है. मगर मामला इतना ही नहीं है. 30 जनवरी 2019 जब से स्टेटस क्वो लगाया गया है. उस वक़्त से कोर्ट की 12 तारीखें पड़ चुकी हैं मगर ठोस निष्कर्ष किसी एक में भी नहीं निकला है. वेकेशन बेंच में इस केस की सुनवाई वकील की अनुपस्थिति के कारण भी नहीं हो पायी.

RRB 7 के पक्ष का कहना यह है कि उनकी परीक्षा 2019 में रिक्त पदों की नियुक्ति के लिए थी जबकि RRB 6 की परीक्षा 2018 में रिक्त पदों के लिए, मगर पेंच यहाँ अटकी है कि 2018 के लिए रिक्त पदों को रिज़र्व लिस्ट के कैंडिडेट्स द्वारा भरे बगैर उसे RRB 7 की परीक्षा में मिला दिया गया. जिससे RRB 6 के आवेदक अपने मौके से वंचित हो गए.

अब यह तय कोर्ट को करना है कि क्या रिज़र्व लिस्ट से उम्मीदवारों की चयन पर बैंकों के लिए कुछ नियम कानून हैं? और अगर नहीं है तो कुछ बैंक द्वारा रिज़र्व लिस्ट के कैंडिडेट्स को लिए जाने के बाद किस तर्क से बाद बाकि बैंक रिज़र्व लिस्ट से कैंडिडेट्स को नहीं लेते?

NABARD और IBPS की इस पूरी प्रक्रिया में भूमिका क्या है? अगर रिज़र्व लिस्ट का मतलब यह नहीं कि आपको बैंक से बुलाया जायेगा ही तो फिर ये मान लें कि रिज़र्व लिस्ट केवल बैंकों की सहूलियत के लिए रखा गया है?

किसी उम्मीदवार के ऑप्ट आउट कर जाने के बाद बैंक उसके रिक्त स्थान को भरने के लिए बाध्य है या नहीं?

 

RRB 6 के आवेदकों का पक्ष

बीते चार महीने से ज़्यादा हो चुके हैं. 30 जनवरी 2019 को स्टेटस क्वो लगने के बाद से RRB 6 के आवेदकों का यह कहना है कि जब कुछ बैंक रिज़र्व लिस्ट से कैंडिडेट की बहाली मैन लिस्ट के खाली पदों पर कर सकते हैं तो यह नियम हर बैंक के लिए लागु क्यों नहीं है? इसी प्रश्न के नींव पर उन्होनें IBPS, NABARD को केस में सम्मिलित करते हुए न्यायपालिका में गुहार लगायी है.

आवेदकों में से एक ने अपना नाम न बताये जाने की शर्त पर यह कहा कि ” हमारा RRB 7 वालों से कोई भी विवाद नहीं है. हम बस इस प्रक्रिया में एक यूनिफॉर्मिटी चाहते हैं”

RRB 6 के अभ्यर्थियों का कहना है कि बैंकों में बहाली के नियम सभी के लिए बराबर होने चाहिए, उन्होनें इस बात पर ज़ोर देते हुए कहा कि उन्हें RTI से प्राप्त जानकारी के अनुसार यह पता चला है क़ी कुछ बैंकों ने अपने यहाँ की रिक्त पदों को रिज़र्व लिस्ट से भरे हैं.

इन आवेदकों ने बैंकों से आवंटन के लिए याचिका दायर की है क्योंकि वह यह मानते हैं कि वे सिलेक्शन और गाइडलाइन्स के अनुसार इसके हकदार हैं.

 

RRB 7 के आवेदकों का पक्ष

चयनित उम्मीदवार रंजन कुमार ने तर्कसंगत से बात करते हुए कहा “हम लगभग 10500 अभ्यर्थियों का एक समूह हैं जो न्याय पाने की कोशिश कर रहे हैं और हम में से कई अपने परिवारों में एकमात्र कमानेवाले हैं. हमारे सभी ईएमआई और ऋणों का भुगतान करना उन उम्मीदवारों के लिए मुश्किल हो रहा है और हमारा धैर्य टूट रहा है.”

“हर तारीख पर, हमारे केस की सुनवाई नहीं होती और अगली तारीख मिल जाती है आईबीपीएस, नाबार्ड जैसे निकायों में से कोई भी इसके बारे में चिंतित नहीं दिखता है, यही कारण है कि हम जैसे उम्मीदवारों को अपनी तरफ से अधिवक्ताओं को उनकी महंगी फीस का इंतजाम करना पड़ रहा है. हम वरिष्ठता और धन दोनों ही गँवा रहे हैं” रंजन कुमार ने कहा.

RRB 7 के चयनित सारे उम्मीदवार इस स्टेटस क्वो से खुद को ठगा भी महसूस कर रहे हैं. सभी छात्र अपनी अपनी तरफ से कयास लगा रहे हैं कुछ इतने मायूस हैं कि अब वापस से प्राइवेट नौकरी की तलाश करने की सोच रहे हैं. इन सारे उम्मीदवारों का भी यही कहना है कि RRB 6 वालों की साथ की गयी अनियमितता या बैंकों की कोताही का खामियाज़ा उन्हें भुगतना पड़ रहा है.

टाइम टेबल के हिसाब से देखा जाए जनवरी 2019 में इन सभी की नौकरी लग चुकी होती यह अपने अपने बैंक में कार्यरत रहते. मगर हालात इसके विपरीत है कि कइयों की शादी टूट चुकी है, कुछ के परिवार हैं और यह अकेले कमाने वाले हैं जो चार महीने से ज़्यादा से बेरोज़गार हैं और इस मामले में लटके पड़े हैं.

 

कई उम्मीदवारों ने कई अधिकारियों तक पहुंचने की कोशिश की है ताकि उनकी कड़ी मेहनत और समर्पण के बेकार न जाए मगर कोई फायदा नहीं हुआ.  छात्र अब भारत के मुख्य न्यायाधीश से मदद लेने की कोशिश करेंगे और सुनवाई शुरू होने पर एक विशेष तारीख के लिए अनुरोध कर सकते हैं. उन्होंने नाबार्ड से भी संपर्क किया है लेकिन उनकी ओर से कोई सकारात्मक प्रतिक्रिया नहीं मिली.

छात्र दृढ़ता से चयन प्रक्रिया में पारदर्शिता की मांग करते हैं और सभी कार्यों के लिए विस्तृत कारणों की आवश्यकता होती है.

छात्रों ने ट्विटर पर हैशटैग # resumeRRB7 का उपयोग करके PMO तक पहुंचने की कोशिश की है.

 

आईबीपीएस की भर्ती प्रक्रिया

IBPS को भारत सरकार के राजपत्र और राष्ट्रीय कृषि और ग्रामीण विकास बैंक (NABARD) के अनुसार सख्त भर्ती प्रक्रियाओं का पालन करने के लिए कहा जाता है. इंस्टीट्यूशन ऑफ बैंकिंग पर्सनेल सेलेक्शन (IBPS), मुंबई भारत सरकार की ओर से बैंकिंग स्टाफ की भर्ती करता है. कार्यालय सहायकों और समूह ए अधिकारियों से शुरू होने वाले कई पदों के लिए उम्मीदवारों का चयन एक कठोर प्रक्रिया के माध्यम से किया जाता है, जिसमें स्केल I, II और III अधिकारी शामिल हैं और भारत में बैंकों द्वारा राष्ट्रीयकृत बैंकों और क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों में आवंटित और पोस्ट किए जाते हैं.

IBPS के फॉर्म में भी यह बात कही गयी है कि रिज़र्व लिस्ट में आने का मतलब यह कहीं से नहीं कि आपकी नौकरी पक्की है, और अगर बैंकों ने अलॉटमेंट के बाद खाली हुए एक साल के अंदर रिक्त पदों की सुचना नहीं दी तो रिज़र्व लिस्ट कैंडिडेट्स को नौकरी नहीं मिल सकती है.

 

इसके बाद फॉर्म में IBPS और RRB ने अपने अपने तरीके से कुछ जिम्मेदारियों में अपनी भागीदारी नहीं दिखाई है जैसे

RRB द्वारा खाली पदों की सुचना न दिए जाने पर IBPS जिम्मेदार नहीं है.

IBPS और RRB किसी भी RRB में हुए रिक्त पदों की सुचना देने के लिए बाध्य नहीं है.

IBPS  कैंडिडेट्स की रिक्रूटमेंट के लिए जिम्मेदार नहीं है और वह केवल RRB द्वारा रिक्त स्थानों की पूर्ती हेतु उसे संपर्क किये जाने परे ही काम करेगा।

 

लेकिन अब इसके बाद नियम यह कहते हैं कि

प्रोविज़नल अलॉटमेंट पर IBPS का फैसला अंतीम और कैंडिडेट्स को मान्य होगा, साथ ही IBPS आर्गेनाईजेशन के हिसाब से आवंटन करने का या उसे रद्द करने का पूर्ण अधिकार रखता है.

यह दोनों बातें अपनी सहूलियत को देख कर तय की गयी लगती हैं जो कि एक तरह से विरोधाभास का बोध कराते हैं.

 

 

तर्कसंगत का तर्क

तर्कसंगत आईबीपीएस उम्मीदवारों के साथ खड़ा है. यह एक ऐसा मुद्दा है जिसे जनता के बीच आना चाहिए और अधिकारियों को आवश्यक कदम उठाने चाहिए. हमें अपना ध्यान लचर बैंकिंग प्रणाली पर देना होगा. हम उनके प्रयासों के लिए कुछ हज़ारो आवेदकों के लिए सकारात्मक परिणाम देखने की उम्मीद करते हैं और हम उच्च अधिकारियों से यह सुनिश्चित करने का आग्रह करते हैं कि युवा पीढ़ी को न्याय दिया जाए और उनकी मुश्किलों को और ज़्यादा न बढ़ाया जाए. अगली 1 जुलाई को कोर्ट की तारीख है जिसमें हम ये आशा करेंगे कि कोर्ट इसका जल्द से जल्द फैसला करे और स्टेटस क्वो हटा कर आवेदकों की बहाली यथाशीघ्र सुनिश्चित करे.

इतने सारे आवेदकों और उनके साथ जुड़े परिवार का भविष्य भी अधर में लटका पड़ा है, ऐसे में यह नहीं होना चाहिए कि RRB, IBPS और NABARD इस जवाबदेही में कोताही करें या अपनी सुविधानुसार एक स्टैंड ले लें.

दोनों ही तरफ के उम्मीदवारों की बात पर गौर करते हुए जल्द से जल्द इस समस्या का हल निकलना चाहिए, हो सकता है कि आने वाले RRB परीक्षाओं में यह समस्या दोबारा से उठे, उससे बचने के लिए ठोस और स्पष्ट नियम तैयार रहे.

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