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एक ऐसी महिला जो आपदा की स्तिथि में महिलाओं के लिये पीरियड-फ्रेंडली शेल्टर होम की मांग कर रही है

तर्कसंगत

May 30, 2019

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28 मई को विश्व भर में मेंस्ट्रूअल हाइजीन दिवस मनाया जाता है. यह विषय ऐसा है जिसकी चर्चा आज तक हमारे समाज में खुले में नही होती लेकिन इसका कलंक पूरे समाज में बना रह्ता है.

“घर में बहुत पानी भर गया था और मैं अपनी जान बचाने के लिये घर से बाहर निकल गई और बाढ़ पीड़ितों के लिये आश्रय गृह जा पहुंची और अगले ही दिन मेरे पीरियड शुरू हो गए, मेरे पास कोई पैड नही था, यहाँ तक कि कपड़े का टुकड़ा भी नही. मैने आस पास मदद के लिये देखा तो वहां सिर्फ पुरुष बचाव दल और आपदा प्रबंधन कर्मचारी ही थे, जिनसे मैं सम्पर्क करने में संकोच कर रही थी. मेरा खून लगातार बह रहा था, जब तक मेरी चाची वहां नहीं पहुँची मेरा संघर्ष जारी रहा और उनके आने के बाद मैने राहत पाई”

यह अनुभव असम के गाँव की एक 15 साल की लड़की का था जो बाढ़ की चपेट में आ गयी थी.

“इस लड़की की कहानी सुनने के बाद मैंने महसूस किया कि प्राकृतिक आपदाओं के मामलों में मेन्स्ट्रुअल हाइजीन जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों को अक्सर अनदेखा कर दिया जाता है.तब मैने जाकर दर्शकों में अन्य महिलाओं से पूछा कि क्या वे इसी तरह के मुद्दों का सामना करती हैं.उनमें से बहुतों ने उत्तर दिया.एक महिला ने यहा तक कहा की वह अपने नष्ट हो चुके घर में वापस गई कपड़ा खोजने ,क्यूंकि वहां कोई मेंस्ट्रुअल किट उपल्बध ही नही थी” मयूरी भट्टाचार्जी बताती हैं.

मयूरी भट्टाचार्जी एक कार्यकर्ता,प्रशिक्षक और मासिक धर्म शिक्षक हैं. असम में बाढ़ प्रभावित गाँव में आयोजित कार्यशाला ने उनकी आँखें खोल दी, जब से उन्होने जाना की किस प्रकार असम में आश्रय घरों में महिलाओं ने तकलीफ़ सही तब से वह “पीरीयड-फ्रेंडली” आश्रय घरों के लिये ज़ोर दे रहीं हैं. उन्होने change.org के साथ एक अभियान भी शुरू किया है, जिसे ‘डिग्निटी इन फ्लड’ कहा जाता है जिसके पास अब 30,500 से अधिक हस्ताक्षर हैं.

 

 

डिग्निटी इन फ्लड्स

भट्टाचार्जी बताती हैं कि एक पीरियड फ्रेंडली शेल्टर होम वह होता है, जहाँ महिलाओं को बेसिक सैनिटरी प्रॉडक्ट्स और मासिक धर्म सहायता प्रदान की जाती है, जिसमें पैड या कपड़े और साबुन शामिल होते है, इनमे शेल्टर महिलाओं के लिये अलग शौचालय भी होते हैं.

वह यह भी बताती हैं कि क्यूंकि अधिकतर पुनर्वास कार्य पुरुषों द्वारा किए जाते हैं, इसलिये मेंस्ट्रुअल हाइजीन उनके लिये महत्वपूर्ण पहलू नही है. उचित सैनिटरी सुविधाओं के अभाव में, महिलाएं खुले में शौच करने के लिये मजबूर हो जाती हैं, जिससे उन्हे बीमारियों और संक्रमण का सामना करना पड़ता है.

 

 

भट्टाचारजी कहतीं है,”जब भी आपदा आती है, महिलाएँ विकट स्थिति में फँस जाती हैं और ऐसा न केवल गाँवों में होता है बल्की शहरों में भी होता है जिनमे से एक उदाहरण चेन्नई बाढ़ का भी है.”

 

 

वह आगे कहती हैं न केवल सैनिटरी सुविधाएँ और स्वच्छता के मामले में, बल्कि आश्रय घरों में महिलाओं की सुरक्षा भी चिंता का विषय है.”महिलाएँ आपदाग्रस्त स्थानों में असुरक्षित हैं. यह आश्रय गृह, अधिक से अधिक बार, तस्करों और नशेबाज़ों के लिये एक आश्रय बन जाते हैं. यह आवश्यक है कि सामाजिक कल्याण अधिकारी ऐसे आश्रय गृहों में महिलाओं और बच्चों को सुरक्षित रखने के लिये जाँच करते रहें.

 

 

भट्टाचारजी,अपने अभियान के माध्यम से असम सरकार से राज्य के 10 सबसे अधिक बाढ़ वाले जिलों में 50 महिला-अनुकूल बाढ़ आश्रयों का निर्माण करने के लिये कह रहे हैं. “एक बार असम में कामयाब होने के बाद,हम इसे देशव्यापी अभियान बनना चाहते हैं” वह कहती हैं.

 

 

तर्कसंगत भट्टाचर्जी द्वारा आपदाग्रस्त क्षेत्रों में मेंस्ट्रूअल हाइजीन के लिये की गई पहल की सराहना करता है.

 

 

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