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तमिलनाडु के वेल्लोर जिले की महिलाओं ने सालों से सूखी पड़ी एक नदी को फिर से जिंदा कर दिया है

तर्कसंगत

Image Credits: Times Of India

June 20, 2019

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कहानी है तमिलनाडु के जिले वेल्लोर कि जो कि सूखाग्रस्त घोषित किए हुए 24 जिलों में से एक है, नागा नदी यहां पर कई दशकों से पानी का मुख्य स्रोत हुए करती थी,लेकिन पंद्रह साल पहले खत्म होने की कगार पर पहुंच चुकी थी,जिस वजह से यहां के कृषि मजदूर अपने जीवन यापन के लिए शहरों का रुख करने लगे थे, उसी सूखी हुई नदी को लगभग 20000 महिलाओं ने अपने अथक श्रम से ज़िंदा करने का एक बहुत ही महान काम किया है.

देश के कई क्षेत्रों में आपने सूखे के भयावह मंजर देखे होंगे, पानी के लिए आपस में जद्दोजहद करते हुए, गड्ढों और कुछ कुओं के गंदे पानी के लिए घंटो अपनी बारी का इंतजार करते हुए कई इलाकों में ये दृश्य आम हो चुके है, क्यूंकि देश में लगभग आधे इलाकों में पानी की बेहद कमी है, यहां के लोग सरकार और बरसात के भरोसे पर बैठे हुए है.

इस सबके बीच तमिलनाडु के वेल्लोर जिले की 20,000 महिलाओं ने सालों से सूखी पड़ी एक नदी को फिर से जिंदा करने का बेमिसाल काम अंजाम दिया है.

टाइम्स ऑफ इंडिया में प्रकाशित खबर के मुताबिक आर्ट ऑफ लिविंग (एओएल) फाउंडेशन के कुछ लोगों ने जिले में नदी कि स्थिति देखकर नदी को पुनर्जीवित करने का सुझाव दिया. चूंकि कर्नाटक में इस तरह की परियोजनाओं से सूख चुकी दो नदियों को फिर से जिंदा किया जा चुका है, इसलिए वेल्लोर की नागानदी को फिर से ज़िंदा करने के लिए सरकार ने इस प्रोजेक्ट में अपनी दिलचस्पी दिखाई, इसके बाद एक टीम गठित की गई और सैटेलाइट के जरिये नदी को मापा गया. फिर वेल्लोर के नदी वाले इलाके को कवर करते हुए कार्य योजना तैयार की गई. इसके तहत महिलाओं को परियोजना का हिस्सा बनाया गया और उन्हें मनरेगा के तहत मजदूरी देना सुनिश्चित किया गया.

महिलाओं को इस नदी को ज़िंदा करने में चार साल लगे हैं. इस दौरान उन्होंने बारिश के पानी का भी इस्तेमाल करने के लिए कई छोटे-छोटे स्टॉप डेम और कुंए बनाए. उसी पानी का इस्तेमाल नदी को जिंदा करने में भी किया गया. इन स्टॉप डेमो के पानी से आज यहां कई इलाकों में पानी की जरूरत पूरी हो रही है. महिलाओं के अनुसार अब जिले के कुछ इलाकों में फिर से खेती भी होने लगी है.

नागानदी पुनर्जीवन परियोजना के निदेशक चंद्रशेखरन के अनुसार ‘नदी की सतह पर जो पानी बहता है ज़मीन की पूर्ति के बाद ही बहता है. इसलिए नदी को फिर से जिंदा करने का मतलब केवल ये नहीं के नदी के उपरी बहाव पर फोकस है बल्कि इसमें जमीन के अंदर तक पर्याप्त मात्रा में पानी पहुंचाना है.

पानी की भविष्य में होने वाली समस्याओं को देखते हुए उत्तराखंड में भी कई ग्रामीण पानी इकट्ठा करने की तकनीकें इस्तेमाल कर रहे हैं. यहां पौरी गढ़वाल में बच्चे भी अपने स्तर पर प्रयास करके अलग-अलग आकार के तालाब बना रहे हैं. वहीं,बरसात का पानी इकट्ठा करने के लिए लोग लिखित प्रतिज्ञा पर हस्ताक्षर कर रहे हैं.

देश की महिलाओं की स्थिति को देखते हुए ये बहुत ही बड़ी बात है कि यदि महिलाओं को उचित मार्गदर्शन और ज़रूरी सहायता मुहैया कराई जाय तो वो भी पुरुषों से कहीं भी कम नहीं,जिस तरह नागा नदी को पुनर्जीवित महिलाओं के द्वारा किया गया है, उसी तरह उत्तराखंड में बच्चो द्वारा किए जा रहे कार्य तारीफ के काबिल है, ये दोनों घटनाएं हमे भविष्य में पानी के संरक्षण के लिए प्रेरित करने वाली है, क्यूंकि यदि आज पानी के लिए हमने कोई उपाय नहीं किया तो फिर हमे पानी के लिए तरसना पड़ सकता है.

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