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महिला को हाथों से कपड़े धोते देख, यूके में रहने वाले नव साहनी ने 2400 रूपये की मैनुअल वॉशिंग मशीन बनाई

तर्कसंगत

June 26, 2019

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भारत, एक ऐसा देश है जहां 276 मिलियन लोग गरीबी के स्तर से नीचे रहते हैं, पानी, बिजली, भोजन, कपड़े और आश्रय जैसी कई बुनियादी आवश्यकताएं अभी भी कुछ लोगों के लिये ख्वाब ही हैं.

28 वर्षीय, लंदन में जन्मे इंजीनियर नव साहनी  की पांडिचेरी के पास कुइलापलायम गाँव यात्रा ने उन्हे इस वास्तविकता से सामना कराया उन्होने ने वहां,अपने नंगे हाथों से कपड़े धोने वाली भारतीय महिलाओं की दुर्दशा को देखा और इसे दूर करने के लिये नव ने एक मैनुअल वॉशिंग मशीन विकसित की  लिए जो समय और पानी दोनो की बचत करती है.

 तर्कसंगत से विशेष रूप से बात करते हुए,सौहनी ने भारत की अपनी यात्रा को याद किया और बताया कि किस तरह उन्होंने हैंड-क्रैंकड वॉशिंग मशीन के बारे में सोचा.

2016 में, नव साहनी ने अपनी नौकरी से विश्राम लिया और ब्रिटेन स्थित एक चैरिटी – ‘इंजीनियर्स विदाउट बॉर्डर्स’ में शामिल हो गए, जहां उन्हें पांडिचेरी के एक गाँव में लोगों को स्वच्छ और कुशल चूल्हा प्रदान करने का प्रोजेक्ट सौंपा गया.

“मुझे हमेशा से ही यह अहसास होता था कि मैं लोगों की समस्याओं को जानने के बाद बहुत उनकी मदद कर सकता हूँ.”

यह उनके गांव में रहने के दौरान ही था,जब उन्होंने देखा कि उनके पड़ोसियों के पास बिजली तक नही पहुंची थी और महिलाओं को घर के काम करने के लिये घंटो खर्च करने पड़ते थे, जो अपने घर के उन्नत उपकरणों के साथ काम करने में कुछ ही मिनट लगते थे.

गाँव में रहने के दौरान उनकी दिव्या नामक महिला से दोस्ती हुई और उन्हे दिव्या का घंटों तक परिवार के कपड़े धोने का दृश्य याद है.

 

 

“दिव्या गाँव में मेरी एकमात्र दोस्त थी और वह अंग्रज़ी अच्छे से जानती थी और हमारी बातों के दौरान ही मैने जाना की दिव्या कपड़े धोने के कारण ही कमर दर्द से जूझ रही थी.”

दिव्या की समस्या समझ में आने पर, साहनी को एहसास हुआ कि इलाके के अन्य घरों में भी स्थिति बेहतर नहीं थी. इसे आगे समझने के लिए उन्होंने 10 सरल प्रश्नों के साथ गाँव में एक छोटा सर्वेक्षण किया.

साहनी बताते हैं, ” उनके द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले डिटर्जेंट, कपड़े धोने की संख्या या उनके स्थान पर बिजली की उपलब्धता जैसे सवाल मुझे इन महिलाओं को होने वाले दर्द के बारे में एक गहन विचार दे सकते थे.

अपने सर्वेक्षण में उन्होंने पाया कि महिलाएं हर हफ्ते 20 घंटे कपड़े धोने में खर्च करती हैं और इस प्रक्रिया में 40 लीटर पानी बर्बाद होता है “कल्पना कीजिए, अगर वे सभी अपने घरों में वाशिंग मशीन रखते तो वे कुछ उत्पादक काम करके समय का अधिक कुशल तरीके से उपयोग कर सकते थे”, साहनी ने कहा.

जरूरतमंद लोगों की मदद करने के लिए एक चाह के साथ, यह सब जानकारी साथ रखी गई और तब साहनी ने मैनुअल वॉशिंग मशीन बनाने का विचार किया.

अपनी साफ चूल्हा परियोजना को समाप्त करने के बाद, साहनी लंदन लौट गए. उन्होंने अपनी योजना पर सावधानी से काम किया और एक हाथ से चलने वाली वाशिंग मशीन विकसित की, जो एक बार में 10 किलोग्राम कपड़े धो सकती है.

एक आम वॉशिंग मशीन में 7.5 किलोग्राम से 12 किलोग्राम कपड़े धोने की क्षमता होती है. स्व-निर्मित वाशिंग मशीन में तीन प्रकार के वॉश होते हैं: वॉश फेज, क्लीन फेज और एक ड्राई फेज.” कपड़े धोने के एक पूरे चक्र को पूरा करने के लिए, यह वॉशिंग मशीन केवल 15 मिनट का समय लेगी,” साहनी ने कहा.

 

 

धुलाई का एक चक्र पूरा करने के लिए यह मैनुअल वॉशिंग मशीन केवल 10 लीटर पानी की खपत करेगी.

एक बार प्रोटोटाइप पूरा हो जाने के बाद, संयुक्त राष्ट्र ने इराक में विभिन्न आईडीपी (आंतरिक रूप से विस्थापित लोगों) शिविरों में अपने मैनुअल वॉशिंग मशीन को चलाने के लिए साहनी और उनकी टीम की मदद भी की.“हमने अपना प्रोटोटाइप लिया और इस वाशिंग मशीन और गनर फीडबैक का परीक्षण करने के लिए शिविरों में स्थापित किया. परिणाम अभूतपूर्व थे ”साहनी ने कहा.

 

 

वॉशिंग मशीन को एक दाम देना एक वास्तविक चुनौती थी, क्योंकि दुनिया के सभी वर्गों के लोगों की मदद करने के लिए मशीन को सस्ता होना था.“भारत में रहने के दौरान, मैं समझ गया कि एक निश्चित राशि तक, ग्रामीण क्षेत्रों की महिलाओं को खर्च करने की स्वतंत्रता है, इसके बाद उन्हें अपने पति से अनुमति लेनी होगी. मैंने वॉशिंग मशीन की कीमत एक ऐसी सीमा में लगाना चाहा, जहां महिलाएं किसी से अनुमति लिए बिना उत्पाद खरीद सकें ”, साहनी ने कहा.

कीमत $35 या 2,400 रुपये तय की गई थी, जो भारत में एक मानक वॉशिंग मशीन की कीमत का एक-चौथाई है. इस साल दिसंबर में दिव्या को उपहार देने के लिए एक प्रोटोटाइप के साथ साहनी भारत आयेंगे.  

तर्कसंगत  भारत और विदेशों में कैम्प की महिलाओं के लिए अपने प्रयासों के लिए नव साहनी की सराहना करता है.

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