मेरी कहानी

मेरी कहानी : “माँ क्या तब भी इतना प्यार करती अगर मैं हिजड़ा होती?”

तर्कसंगत

June 27, 2019

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मैंने जीवन मे जब से समलैंगिकता को समझा है तब से इसके हित मे कई छोटे छोटे युद्ध लड़ कर अपने आप को विजेता घोषित करती रही हूँ. LGBTQ+ के अधिकार के हित में मुस्कुराते हुए अपने स्वर रज्जु को हर मौके पर प्रबल रखती हूं. एक मनुष्य होने के नाते दूसरे मनुष्य का तिरस्कार होते देखना एक नास्तिक पद्दति का पाप है.

हाल फिलहाल की बात है, मेरी माँ और मैं यूँ ही छुट्टी के दिन बैठे कुछ गुफ्तगू कर रहे थे. मैंने माँ से पूछा कितना प्यार करती हो मुझसे माँ? माँ ने हंस के बोला निशर्त (unconditional) प्यार करती हूं तुमसे. जब बिजली नही होती थी तो तुम्हे रात भर पंखा झल के सुलाया करते थे. जो पसंद होता वो खिलाते. बड़े अरमान से तुम्हे पढ़ाया. “माँ क्या तब भी इतना प्यार करती अगर मैं हिजड़ा होती?” माँ ने मेरी बात सुन कर भी अनसुना कर दिया. “कब से सोच रखा है कि तुम्हारी शादी एक बेहतरीन नौजवान से करेंगे.” “माँ अगर मैं लेसबियन होती तो….” इस बार शायद माँ और सुन न सकी. अचानक भाव बदल गए, तिलमिला कर कहा, “लेसबियन होती तो ज़िन्दगी भर तड़प के रहती मगर समाज के सामने ऐसी ओछी हरकत करने की इजाज़त नही मिलती तुमको”. “माँ क्या मेरी अभिलाषा तुम्हारे लिए सर्वोपरि नहीं?” “नहीं!”

पूर्वाग्रहों से ग्रसित जिस समाज को मेरे ब्रा के स्ट्रैप से डर लगता है, जिस समाज को मेरे काले रूप से डर लगता है, जो समाज मानसिक रोगीयो का बहिष्कार करता है, उस समाज से बैर करना भी बचकाना ही है. के बावजूद मेरे साथ स्वीकृति और समानता के लिए लड़ रहे हर उस व्यक्ति पर अहंकार है मुझे. ये समाज होमोफोबिक नही फोबिक है. देखा जाए तो इस बनावटी समाज का जो ढांचा है, वो असुरक्षा और भय के बल पे निर्मित है.

वो घृणात्मक टिप्पणियां जो समाज तुमसे करता है उसको फर्क से मैंने भी खंगाला है. तुम्हारे मासूम सी मोहोब्बत पर जब जब सवाल उठे है, उन सवालों को सीने से लगाया है. और वादा करती हूं जब कभी भी ये समाज तुम्हारे स्वभाव के लिए तुम्हे लज्जित करेगा,उस निर्लज्जता को अपने माथे का आभूषण बना कर पहनूँगी. क्योंकि तुम्हारे स्वभाव के लिए तुम्हें कोई कटघरे में खड़ा करे, ये इज़ाज़त तो खुदा के भी पास भी नहीं.

मुझे तो समझ ही नही आया कि अचानक माँ की ममता में शर्त कहा से आ गया था. एक पल में ऐसा लगा के जैसे माँ का प्यार भी एक इत्तफ़ाक़ मात्र ही होता है. ऐसा क्यों है कि इस ममता को पाने के लिए हेटेरोसेक्सयूएल होना अनिवार्य है. ये तो ऐसी लड़ाई है जहा ज़्यादातर दुश्मन वो होता है जिससे हम बेहद प्यार करते है. एक भूरी एशियाई महिला होने के नाते मैं इस बात को समझती हूं कि कुरीतिक और विभेदात्मक मानसिकता के प्रेतों से जूझते हुए विद्रोह कर के आगे बढ़ जाने का क्या अर्थ होता है.

मगर प्रससन्नता इस बात की हुई कि क्रोध में ही सही मगर समलैंगिगता की अभिस्वीकृति तो हुई. ये अभिस्वीकृति साक्षी है इस बात का की इंद्रधनुष के जीवंत रंग सूक्ष्मता से अपना प्रभाव छोड़ रहे है. हमारी जीत हो रही है.

मेरे लिए प्राइड एक लफ्ज़ मात्र नहीं, जीवन को निरपराध और बेगुनाही से जीने का एक मार्ग है. प्राइड, इस संसार को एक बार फिर खुशनुमा कर देने वाला मौसम है. प्राइड, एक स्टेशन है उस सम्मिलित संसार की ओर जहा सहानुभूति के साथ साथ आपसी सम्मान हो और विशेषण का बहिष्कार हो.

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