ख़बरें

कौन हैं उम्रकैद की सज़ा पाने वाले IPS संजीव भट्ट?

तर्कसंगत

June 27, 2019

SHARES

कौन हैं गुजरात काडर के बर्ख़ास्त किए गए आईपीएस अफ़सर संजीव भट्ट जिन्हे स्थानीय कोर्ट ने 30 साल पुराने मामले में आजीवन कारावास की सज़ा सुनाई है. बता दें की संजीव क़रीब आठ महीने से जेल में बंद हैं. उन्हें नार्कोटिक्स के एक मामले में पैसा उगाही के आरोप में बीते सितम्बर में गिरफ़्तार किया गया था. संजीव भट्ट वही अफ़सर हैं, जिन्होंने 2002 में हुए गुजरात दंगों में तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी की भूमिका पर सवाल खड़े किए थे.उनका कहाना था कि दंगों की जांच के लिए गठित विशेष जांच दल (एसआईटी) पर उन्हें भरोसा नहीं है.

वह हमेशा से ही नरेंद्र मोदी के ख़िलाफ़ काफ़ी मुखर रहे, साथ ही उन्होने मार्च 2011 में कोर्ट में हलफ़नामा दायर कर तत्कालीन मुख्यमंत्री पर गंभीर आरोप लगाए थे.

उन्होंने दावा किया था कि ‘गोधरा कांड के बाद 27 फरवरी, 2002 की शाम मुख्यमंत्री के आवास पर हुई एक सुरक्षा बैठक में वे मौजूद थे. इसमें मोदी ने कथित तौर पर पुलिस अधिकारियों से कहा था कि हिंदुओं को अपना ग़ुस्सा उतारने का मौका दिया जाना चाहिए.’ और मोदी सरकार का कहना है की इसका कोई सबूत नही की संजीव उस बैठक में मौजूद थे.

 

मोदी का विरोध और गिरफ्तारी

संजीव ने अपनी ओर से तत्कालीन गुजरात सरकार पर गंभीर आरोप लगाते हुए हलफ़नामा भी दर्ज कराया और इसके बाद सरकार और भट्ट के बीच और गहमा-गहमी हो गई और इसी के बाद संजीव पर सरकारी वाहन के दुरुपयोग और बिना अनुमति के ड्यूटी से अनुपस्थित रहने के आरोप में निलम्बित कर दिया गया.

उस दौरान भट्ट की गिरफ़्तारी भी की गई और तब उनके परिवार ने उनकी जान की सुरक्षा को लेकर चिंता जताई थी और पुलिस के आला अधिकारियों को पत्र लिखकर न्याय की गुहार लगाई थी.

30 सितम्बर 2011 को संजीव भट्ट को किया गया घर से गिरफ्तार ये गिरफ़्तारी उनके मातहत ही काम कर चुके एक कॉन्सटेबल केडी पंत की ओर से दर्ज पुलिस रिपोर्ट के आधार पर हुई. इस रिपोर्ट में संजीव भट्ट पर आरोप लगाए गए कि उन्होंने दबाव डालकर मोदी के ख़िलाफ़ हलफ़नामा दायर करवाया.

उनकी पत्नी श्वेता भट्ट ने उस समय आरोप लगाया था कि “संजीव के ख़िलाफ़ घाटलोदिया पुलिस स्टेशन में मामला दर्ज हुआ और इसके बाद उन्हें क्राइम ब्रांच को सौंप दिया गया, जिसे एनकाउंटर विशेषज्ञ माना जाता है, मैं उन पर भरोसा नहीं कर सकती. मुझे उनकी जान की चिंता है.”

गिरफ़्तारी के मामले में श्वेता भट्ट ने कहा कि, “35-40 पुलिसकर्मियों ने बिना किसी सूचना के हमारे घर की दो घंटों से अधिक समय तलाशी ली. वे संजीव को अपने साथ ले गए और तब से उनसे हमारा कोई संपर्क नहीं है.”

 

सेक्स वीडियो और बर्खास्तगी

श्वेता भट्ट के मुताबिक, गिरफ़्तारी के दूसरे दिन भी पुलिस उनके घर की तलाशी लेने पहुंची थी लेकिन वारंट के बारे में पूछने पर पुराना वारंट दिखाया गया. उन्होंने पुलिस पर बार बार तलाशी कर परेशान करने का आरोप लगाया.

श्वेता भट्ट का कहना था, ” एक वारंट पर दो बार तलाशी लेना हमें परेशान करना है. एक ही वारंट के आधार पर वे हमारे घर की दो बार तलाशी नहीं ले सकते.”

साल 2015 में आए एक कथित सेक्स वीडियो को लेकर संजीव भट्ट को पहले गुजरात सरकार ने कारण बताओ नोटिस जारी किया और फिर बर्ख़ास्त कर दिया.नोटिस में कहा गया कि वे अपनी पत्नी के अलावा किसी अन्य महिला के साथ रिश्ते पर सफ़ाई दें.

संजीव भट्ट को 19 अगस्त 2015 को पद से बर्ख़ास्त कर दिया गया. भट्ट ने कथित सेक्स वीडियो में ख़ुद के होने से इंकार किया था और कहा था कि वीडियो में मौजूद आदमी उनकी तरह दिखता है, पर वे स्वयं उसमें नहीं हैं. तब उन्होंने गुजरात सरकार पर राजनीतिक द्वेष से कार्रवाई करने का आरोप लगाया था.

वीडियो के मामले में उनका कहना था, “यह वीडियो सबसे पहले बीते साल मई महीने (मई 2014) में सामने आया था. इसे तेजिंदर पाल बग्गा के ट्विटर अकाउंट से अपलोड किया गया था. बग्गा ‘नमो’ पत्रिका के संपादक हैं और दक्षिणपंथी संगठन भगत सिंह क्रांति सेना से जुड़े हुए हैं.”

 

दोबारा गिरफ़्तारी

भट्ट सोशल मीडिया पर सोशल मीडिया पर काफ़ी सक्रिय रहे हैं और अक्सर भाजपा सरकार और प्रधानमंत्री मोदी के बारे में तल्ख़ टिप्पणियां करते रहे हैं. पुलिस कार्रवाई का उन्हें 2018 में फिर से सामना करना पड़ा जब उन्हें 5 सितम्बर 2018 को सीआईडी ने गिरफ़्तार कर लिया.

उस समय कहा गया कि 1998 पालनपुर ड्रग प्लांटिंग केस में हाईकोर्ट के आदेश के बाद उनकी गिरफ़्तारी हुई. उनके साथ सात अन्य लोगों की भी गिरफ़्तारी हुई थी.आरोप था कि संजीव भट्ट जब बनासकांठा के डीसीपी थे, उस वक्त एक वकील को नार्कोटिक्स के झूठे मामले में फंसाने का आरोप लगा. उस वक्त करीब 8 ऐसे नार्कोटिक्स मामले थे जिसमें विवाद हुआ था. इनमें कुछ आरोपी राजस्थान के हैं. राजस्थान के आरोपियों ने संजीव भट्ट पर झूठा केस दायर कर उनसे पैसे ऐंठने का आरोप लगाया था.

बीती जनवरी में संजीव भट्ट की पत्नी श्वेता भट्ट और उनके बेटे शांतनु की कार एक ट्रक की टक्कर में क्षतिग्रस्त हो गई थी. इस दुर्घटना में दोनों बाल बाल बच गए थे. श्वेता ने उस समय किसी साजिश की आशंका जताई थी. संजीव भट्ट के फ़ेसबुक अकाउंट से श्वेता संजीव भट्ट ने बीते 14 मई को लिखे एक पोस्ट में दावा किया कि संजीव भट्ट पर बदले की कार्रवाई की जा रही है.

उन्होंने लिखा, “एक व्यक्ति को एक साल से अधिक समय तक जेल में रखने को कैसे सही ठहराया जा सकता है, वो भी 23 साल पुराने एक मामले में, जिसे बदले की भावना और अपनी सुविधा से दोबारा खोला गया.”

उन्होंने लिखा है, “संजीव को अभी भी जेल में रखा गया है और उन्हें ज़मान के एक बुनियादी नागरिक अधिकार से भी वंचित रखा गया है. उनका अपराध सिर्फ इतना था कि उन्होंने ईमानदारी से अपनी ड्यूटी की.”

 

अनधिकृत अनुपस्थिति के लिए बर्खास्त

भट्ट को 2011 में सेवा से निलंबित कर दिया गया और 19 अगस्त, 2015 को सेवा से “अनधिकृत अनुपस्थिति” के आधार पर बर्खास्त कर दिया गया। उन्हें 11 आरोपों में सेवा से समाप्त कर दिया गया था, जिसमें “बेहतर अधिकारी (DG (IG & IGP)) के आदेशों की अवहेलना करना, कानूनी रूप से अधिकृत सरकारी कर्मचारियों से लॉग बुक की कस्टडी लेना, सरकारी संपत्तियों की अवैध रूप से रख-रखाव करना, सरकारी सेवकों से दुर्व्यवहार करना, सरकारी वाहनों को रखना शामिल था।

2003 में, साबरमती जेल से जेल अधीक्षक के रूप में भट्ट का अचानक स्थानांतरण एक बहुत बड़ा विवाद हो गया। उनके तबादले से 4,000 कैदी भूख हड़ताल पर चले गए और छह दोषियों ने उनकी कलाई काट दी- ऐसी घटना जो पहले कभी नहीं हुई। कैदियों ने “भट्ट को वपस लाओ” का जाप किया। साबरमती जेल में अपने ढाई महीने के कार्यकाल में भट्ट कैदियों के बीच पसंदीदा बन गए। उन्होंने जेल के मेन्यू पर गजर का हलवा पेश किया और कैदियों से बात की। यह कैदियों के साथ उनके दोस्ताना स्वभाव के कारण था जिसके कारण उनका स्थानांतरण हुआ। हालाँकि, भट्ट का दावा है कि उनके स्थानांतरण के पीछे मुख्य कारण यह था कि उनके पास सबूत थे कि हरेन पांड्या के असली हत्यारे तुलसीराम प्रजापति थे, जो सोहराबुद्दीन शेख के करीबी सहयोगी थे, न कि असगर अली। असगर ने भट्ट को साबरमती जेल में भट्ट को यह बात बताई थी। हरेन पांड्या ने पहले जस्टिस कृष्णा अय्यर की अध्यक्षता वाली संस्था को अंडरकवर की गवाही दी थी कि मोदी गोधरा की घटना के बाद हिंदुओं को “उनके गुस्से को हवा देना” चाहते थे। वह 2003 में मारा गया था।

भट्ट के खिलाफ कई लंबित मामलों के कारण उनका प्रमोशन ठप हो गया था। वह एक दशक तक एसपी के रूप में रहे जब उनके बैचमेट को पुलिस महानिरीक्षक रैंक में पदोन्नत किया गया।

 

कई अहम पदों पर काम किया

आईआईटी मुंबई से पोस्ट ग्रेजुएट संजीव भट्ट वर्ष 1988 में भारतीय पुलिस सेवा में आए और उन्हें गुजरात काडर मिला. वो राज्य के कई ज़िलों, पुलिस आयुक्त के कार्यालय और अन्य पुलिस इकाइयों में काम चुके हैं.

दिसंबर 1999 से सितंबर 2002 तक वे राज्य ख़ुफ़िया ब्यूरो में ख़ुफ़िया उपायुक्त के रूप में कार्यरत थे. गुजरात के आंतरिक सुरक्षा से जुड़े सभी मामले उनके अधीन थे.

इनमें सीमा सुरक्षा और तटीय सुरक्षा के अलावा अति वीवीआईपी लोगों की सुरक्षा भी शामिल थी. इस दायरे में मुख्यमंत्री की सुरक्षा भी आती थी.

संजीव भट्ट नोडल अफ़सर भी थे, जो कई केंद्रीय एजेंसियों और सेना के साथ ख़ुफ़िया जानकारियों का आदान-प्रदान भी करते थे. जब वर्ष 2002 में गुजरात में दंगे हुए थे, उस समय भी संजीव भट्ट इसी पद पर थे.

 

अपने विचारों को साझा करें

संबंधित लेख

लोड हो रहा है...