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डॉ. साधना राजकुमार: चेन्नई की स्पैरो वुमन जो चेन्नई शहर में चिड़ियों को वापस ला रही हैं

तर्कसंगत

July 5, 2019

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हमारी आपकी बचपन की यादों में कई सारे किस्से कहानी किरदार होते हैं जो हम आज भी याद रखते हैं. जिन्हें हम मिस करते हैं. बचपन की एक छोटी से छोटी चीज़ भी हमारे लिए अनमोल है. ऐसी ही यादों में हम और आप खोये कितनी बार अपने घर के उन छोटे से घोसलों को याद करते हैं जो अक्सर आपके कमरे के रोशनदान और पंखे के ऊपर बने होते थे. आज कहाँ हैं वो घोसले, वो रोशनदान वो चहचहाती चिड़िया वो छत पर सुकून से शाम को बैठ उन चिड़ियों को देखने का सुख ?

यह सब ख्याल हमारे आपके ज़ेहन में आते होंगे और उतनी ही तेज़ी से व्हाट्सप्प पर आये मैसेज के टोन से चले भी जाते होंगे. मगर चेन्नई की एक नूट्रिशनिस्ट डॉक्टर साधना राजकुमार के लिए बचपन की यादें महज़ एक याद नहीं. वह अपनी इन यादों को फिर से जीना चाहती हैं अपनी ज़िन्दगी में उन चिड़ियों को वापस लाना चाहती हैं. वह अपने इस कोशिश को पर्यावरण की भलाई के लिए भी जारी रखना चाहती हैं.

 

 

माँ की एक बात से परिवर्तन

अपनी रसोई की खिड़की से बाहर देखते हुए, साधना की माँ ने एक दिन आश्चर्य व्यक्त किया कि वह अब और गौरैया नहीं दिखती, उनकी यह बात साधना को छू गयी. उन्होंनें इंटरनेट के ज़रिये इस पर रिसर्च किया और साधना को हैरानी हुई जब उन्होने जाना कि गौरैया की आबादी बहुत कम हो गई है. उन्होने सरकार के पर्यावरण विभाग को कुछ कॉल किए,जिससे कोई फायदा नहीं हुआ ,उन्होने अपने दम पर चेन्नई शहर में गौरैयों को वापस लाने का फैसला किया. साधना ने गौरैया के लिए सस्ते घोंसले के बक्से बनाने के लिए एक ‘सेव द स्पैरो ’परियोजना शुरू की और अपने दोस्तों को प्रोत्साहित करना शुरू कर दिया. 

शुरुआत में उन्होनें एक बढ़ई को संपर्क कर उससे लकड़ी के घोसले बनवाये जो वह अपने दोस्तों और मरीना बीच पर सैर करने आये लोगों को बांटती थी. शुरुआत में लोग उन्हें संशय की निगाह से देखते थे मगर धीरे धीरे उन सबको डॉ. साधना के नेक काम की जानकारी और समझ हुई.

 

 

मिट्टी के घोंसले

तर्कसंगत से बात करते हुए साधना बताती हैं  “लकड़ी के घोंसलों को इस्तेमाल करते हुए मुझे हमेशा एक गिल्ट फीलिंग होती थी, की चिड़िया को रहने के लिए घोंसला मैं कटे हुए पेड़ से दे रहीं थी” हालाँकि वह अपनी तरफ से यही कोशिश करती थी कि जो सबसे बेकार लकड़ी का टुकड़ा है उसका इस्तेमाल घोंसले को बनाने में किया जाये ताकि उनकी वजह से पर्यवरण को और ज़्यादा हानि नहीं हो. मगर कुछ समय बाद उन्होनें इस गिल्ट से भी निकलने का रास्ता खोज निकाला.

उन्होंनें खुद से मिट्टी के घोंसले बनाने का ख्याल आया इसके लिए उन्होनें कई सारे डिज़ाइन बनाये अंत में एक डिज़ाइन को फाइनल किया. अब दिक्क्त थी तो उस मिट्टी के घोंसले को बनाने वाले कुम्हार की. चेन्नई शहर में कुम्हारों का कुछ कारणों से काम करना बैन है. इस कारण से उन्हें चेन्नई से बाहर कई कुम्हारों से जा कर मिलना पड़ा, मगर कोई भी उनके द्वारा डिज़ाइन किया गया घोंसला बनाने में असमर्थ था.

 

 

अंत में इनकी मुलाक़ात पेरुमल नाम के कुम्हार से हुई जो चेन्नई से बाहर वेमपमपट्टू नाम के एक जगह पर रहते हैं, उन्होनें कहा कि कोशिश करेंगे. आशा की किरण देख कर डॉ. साधना ने उन्हें डिज़ाइन देकर घर वापस आयी. कुछ असफल कोशिश के बाद पेरुमल घोंसला बनाने में कामयाब हुए. डॉ. साधना बताती है ” मैंने घोंसले की डिज़ाइन सोचते वक़्त यह ध्यान रखा कि उसमें छोटी चिड़िया के घूमने के लिए पर्याप्त जगह हो” छोटी चिड़िया जो शुरुआत में उड़ नहीं सकती उन्हें चलने के लिए घोंसले में पर्याप्त जगह है. इस घोंसले के फायदे के बारे में बात करते हुए डॉ. साधना बताती हैं कि यह घोंसला गर्मी के मौसम में ठंडा भी रहता है, प्राकृतिक है और इसमें चिड़िया आसानी से आकर रहना शुरू कर देती हैं.

 

 

मोबाइल टावर कारण नहीं हैं

कुछ समय पहले रिलीज़ हुई एक फिल्म के बारे में बात करते हुए डॉ. साधना कहती हैं कि ” यह अच्छा है कि उस फिल्म की वजह से लोगों को चिड़िया या पक्षियों की याद आयी मगर, फिल्म में चिड़ियों की घटती आबादी के कारण जो दिए हैं यह पूरी तरह से सही नहीं है” उन्होनें कहा कि “हम मोबाइल टावर को दोष दे कर आराम से बैठ जाते हैं कि हम इन चिड़ियों के लिए कुछ नहीं कर सकते मगर सच इसके उलट है.” चिड़ियों की गिरती आबादी के पीछे के कारण कुछ और है :

  • घोसले बनाने के लिए सिकुड़ती जगह
  • सही ढंग से भोजन का न मिलना
  • पानी की कमी
  • पेड़ पौधों की कमी
  • मानवीय संवेदनहीनता

डॉ. साधना का कहना है कि चिड़िया हमारे आस पास में मच्छरों की आबादी पर भी अंकुश लगाती है. अपनी इन सारी बातों को वो घोंसले बांटते वक़्त हर किसी से साझा करती हैं. उन्होनें अभी तक तकरीबन 2000 से ज़्यादा घोंसले बाँट दिए हैं.

 

 

अपने बनाये घोंसलों के साथ वो लोगों को कुछ महत्वपूर्ण टिप्स भी देती हैं जिससे चिड़िया उन घोंसलों में जल्द से आ सके. “गौरैया food chain में अपना सही स्थान खो रही हैं, हमें उनकी ज़रूरत से ज़्यादा ज़रूरत है ” यही संदेश फैलाना साधना का अनूठा प्रयास है और यह वास्तव में प्रेरणादायक है.”

 

 

“Save The Sparrow ” की मदद से कुम्हारों के जीवन में परिवर्तन

डॉ. साधना अपनी इस मुहीम में पेरुमल की काफी शुक्रगुज़ार हैं. उनका कहना है कि उनके मदद के बगैर यह सब कुछ करना मुमकिन नहीं था. अपनी इस पहल के बदौलत वह पेरुमल जैसे कुम्हारों के ज़िन्दगी में भी परिवर्तन लाना चाहती हैं.

अभी तक डॉ. साधना ने सारे घोंसले मुफ्त में ही बांटे हैं, और उसके लिए जो कुछ भी शुल्क कुम्हारों को दिया गया है वो उन्होनें अपने जेब से खर्च किये हैं. तर्कसंगत से बात करते हुए डॉ. साधना कहती हैं कि अगर लोग उन पेरुमल की मदद करना चाहते हैं तो वो मुझसे सम्पर्क कर सकते हैं. यहाँ तक कि अगर कोई यह कला सीखना चाहता है तो पेरुमल दूसरी जगह जाकर वहां के कुम्हारों को मिट्टी के घोसले बनाने की कला सीखा भी सकते हैं. उनकी मदद करने के लिए या उनकी मदद से अपने घर आँगन में चिड़ियों को एक घोंसला देने के लिए आप उनसे  संपर्क कर सकते हैं.

 

तर्कसंगत का तर्क

अपनी बचपन की याद से प्रेरित पर्यावरण और समाज के उपेक्षित कुम्हारों को रोज़गार को नए आयाम देने के लिए हम डॉ. साधना राजकुमार की सराहना करते हैं. साथ ही हम ये उम्मीद करेंगे कि उनकी इस कहानी से प्रेरित हो कर हम और आप अपने घर छत, बॉलकनी में फिर से चिड़ियों की उस मासूम चहचहाहट को हक़ीक़त में तब्दील करें. डॉ. साधना से संपर्क करने के लिए उनसे 9445249240 पर संपर्क किया जा सकता है.

 

 

 

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