पर्यावरण

भारतीय जल संकट: क्या हम अपने पानी का प्रबंधन करेंगे?

तर्कसंगत

Image Credits: Lokmat News

July 15, 2019

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संयुक्त राष्ट्र की विश्व जल विकास रिपोर्ट के अनुसार 1980 के दशक के बाद से पानी के उपयोग में लगभग 1 प्रतिशत प्रति वर्ष की बढ़ोतरी हुई है. 2019 की रिपोर्ट बताती है कि चार अरब लोग पहले से ही हर एक साल में कम से कम एक महीने के दौरान पानी की कमी का अनुभव कर रहे हैं. वर्तमान भारत में वायु प्रदूषण को लेकर लोगों के बीच काफी जागरूकता है. हालांकि भारत के जल संकट को लेकर अभी तक उस तरह का ध्यान नही दिया गया है. दुनिया भर में पानी का संकट बढ़ रहा है. इसके प्रमुख कारणों में आबादी में बढ़ोतरी, शहरी विकास का बढ़ना और तेजी से जलवायु में परिवर्तन होना है.

 

भारत में गहरा होता संकट

नीति आयोग के एक हालिया रिपोर्ट के अनुसार लगभग 600 मिलियन भारतीयों को पानी के लिए तनाव का सामना करना पड़ रहा और साफ पानी के अपर्याप्त के कारण हर साल लगभग 2,00,000 लोगों की मृत्यु हो रही है. अध्ययन कहता है कि दिल्ली, बेंगलुरु, चेन्नई और हैदराबाद सहित करीब बीस शहरों में 2020 तक भू-जल पहुँच से बाहर चले जाएंगे, जिससे 100 मिलियन लोग प्रभावित होंगे. यदि ऐसा ही रहा, तो 2050 तक देश के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में 6% की हानि होगी. हाल के समय में भारतीय ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में कभी भी गम्भीर जल संकट से गुजर सकते है. कुछ समय पहले ही केपटाउन- दक्षिण अफ्रीका की राजधानी को गंभीर जल संकट का सामना करना पड़ा था. हालिया उदाहरणों में से चेन्नई भी एक है, जो देश का छठा सबसे बड़ा शहर है जो अभी पानी की भारी कमी का सामना कर रहा है. इससे पहले केवल छोटे शहर या ग्रामीण क्षेत्र ही प्रभावित हुए थे. लेकिन वर्तमान समय में छोटे शहर,गाँव, नगर से लेकर महानगर तक सभी प्रभावित हो रहे हैं. शिमला भी पिछले सालों में पानी के संकट से गुजरा था, हलाकि इस साल राज्य सरकार की उचित प्रबंधन से इसको निपट लिया गया है. भविष्य में  चेन्नई को शिमला से सीखना पड़ेगा. 

 

पानी की बर्बादी

शिमला में एक सरकारी एजेंसी WAPCOS लिमिटेड ने 2017-18 में जल आपूर्ति और जल मांग के आकलन के लिए एक अध्ययन किया. इस अध्ययन में पाया गया कि आपूर्ति किए जा रहे ड्रिंकिंग वॉटर का क़रीब 47 फ़ीसदी हिस्सा लीकेज के कारण बर्बाद हो रहा है. वितरण के दौरान भी 25 प्रतिशत पानी बर्बाद हो रहा था.  इसका मतलब यह था कि 70 फ़ीसदी से ज़्यादा पानी ऐसे ही बर्बाद हो रहा था. जिसमें अमान्य इमारतों-होटलों और ग़ैर क़ानूनी कॉलोनियों की भी पानी आपूर्ति शामिल थी. इसके अलावा कुप्रबंधन की भी अपनी समस्याएं थीं. यह सरकार की कुप्रबंधता को ही दर्शाती हैं. इस साल राज्य सरकार ने इसको ठीक करवा कर पानी की समस्या से शिमला को निकाला है, यह मॉडल बाक़ी शहरों के लिए अनुकरणीय भी हो सकता है. जैसे-जैसे शहरों का विस्तार होता है, वैसे-वैसे आर्द्रभूमि और झीलें विलुप्त हो जाती हैं, जो पानी को संचित रखने और भूमिगत जल के स्तर को बढाने का कार्य करती है. इसके अलावा सरकार द्वारा खराब जल प्रबंधन, पानी का अत्यधिक उपयोग, जल-संग्रह का प्रदूषण, सूखा, खराब सिंचाई प्रणाली और गलत सरकारी नीतियाँ भारत में जल संकट के कुछ प्रमुख कारण हैं.

 

उपाय और सरकारी योजनाएं

इस तरह की समस्याओं से भविष्य में निदान पाने के लिए सरकारी (राज्य) और गैर-सरकारी संगठनों की भूमिका अहम हो जाती है. जल संकट से निपटने के लिए सरकार को कुछ अच्छे नीतियों के साथ काम करना पड़ेगा जैसे कि सरकार को बेहतर नीतियों और विनियमों को विकसित करने और लागू करने पर जोर देना होगा, वितरण के बुनियादी ढांचे में सुधार करना होगा, समुदाय-आधारित प्रशासन और उसमें सबकी भागीदारी तय करना होगा, पानी के कैचमेंट और कटाई में सुधार करना होगा, ऊर्जा कुशल अलवणीकरण संयंत्रों को विकसित करना होगा, सिंचाई और कृषि प्रथाओं में सुधार करना होगा, उपभोग और जीवनशैली को बदलने के लिए आम लोगो को शिक्षित करना होगा, समग्र रूप से पारिस्थितिक तंत्र का प्रबंधन करना होगा, अंतर्राष्ट्रीय ढांचों का निर्माण और संस्थागत सहयोग सुनिश्चित करना होगा, प्रदूषण से निपटना होगा, अनुसंधान एवं विकास / नवोन्मेष पर ध्यान केंद्रित करना होगा, विकासशील देशों से जल परियोजनाओं / प्रौद्योगिकी के हस्तांतरण को सुनिश्चित करना होगा, जलवायु परिवर्तन और जनसंख्या वृद्धि को नियंत्रित करना होगा.

 

रीसाइक्लिंग और सिंचाई

जल संकट के कई और भी पहलू है और उनका समाधान भी है. जिस पर तात्कालिक  ध्यान देना भी ज़रूरी है. वर्तमान में भारत केवल 15 प्रतिशत अपशिष्ट जल का पुनर्चक्रण करता है और 8 प्रतिशत से कम वर्षा के पानी का संरक्षण करता है जो कि वैश्विक औसत से काफी कम है. इस तरह के पानी के संकट से बाहर आने के लिए शहर अपनी स्वयं की पुनर्जीवन योजना विकसित कर सकते हैं. शहरी जल निकायों को बहाल करने और संरक्षण करने की नीतियों से भारत के शहरों को भविष्य में पानी की कमी से निपटने में मदद मिल सकती है. सरकार भारतीय नदियों को इंटर-लिंक परियोजना के माध्यम से भी जल संकट का सही प्रबंधन कर सकती है, जिसका उद्देश्य भारतीय नदियों को जलाशयों और नहरों के नेटवर्क से जोड़कर भारत में जल संसाधनों को प्रभावी ढंग से लागू करना है. सही प्रबंधन नहीं होने के कारण देश के कुछ हिस्सों में बाढ़ और तो अन्य हिस्सों में पानी की कमी की स्थिति बन जाती है.

भारत के कृषि को सुधार किए बिना इस देश की पानी की कमी को दूर नहीं किया जा सकता है. धान और गन्ना,दोनों फसलें ही जल-रोधी है. भारतीय भू-क्षेत्र में संचित स्वछ जल का लगभग 60 प्रतिशत पानी सिचाई में खर्च हो जाता है. पंजाब में उत्पादित एक किलोग्राम चावल के लिए लगभग 5,000 लीटर पानी की आवश्यकता होती है, तो वही महाराष्ट्र में एक किलो चीनी के लिए लगभग 2,300 लीटर पानी की आवश्यकता होती है. इसको सही से निपटने के लिए सही और प्रभावी प्रबंधन की नितांत आवश्यकता है.

 

तर्कसंगत का तर्क

उम्मीद है की सरकार की नीतिगत ढाँचा निश्चित रूप से जल संकट से बाहर निकलने में मदद करेगा. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने दूसरे कार्यकाल के पहले ‘मन की बात’ में पानी की हर बूंद को बचाने और जल संरक्षण को स्वच्छ भारत अभियान की तर्ज पर एक जन आंदोलन बनाने का स्पष्ट आह्वान किया है और हाल ही में भारत सरकार ने “जल शक्ति मंत्रालय” एक नया मंत्रालय बनाया है. यह दर्शाता है की सरकार जल संकट को ले कर काम करना तो चाहती है लेकिन ये कितना कारगर होगा यह तो आने वाला वक़्त ही बताएगा. बस इतना ध्यान रखना है की कहीं देर ना हो जाए.

 

लेख : राहुल कुमार

 

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