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भारत में मेडिकल कॉलेज बढ़ रहे हैं जब मेडिकल सीटें नहीं

तर्कसंगत

Image Credits: Times Of India

August 30, 2019

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सरकार ने बुधवार को मौजूदा जिला / रेफरल अस्पतालों के अलावे 75 सरकारी मेडिकल कॉलेजों को 2021-22 तक खोलने की घोषणा की है. इससे 15700 नए मेडिकल सीट बढ़ जायेंगे.

सरकार ने पहले चरण के तहत 58 मेडिकल कॉलेजों को 2018 तक चालू करने की मंजूरी दी थी और 2021-22 तक 24 नए मेडिकल कॉलेज स्थापित किए जाने थे. टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार, फेज -1 के तहत 39 मेडिकल कॉलेज चालू हुए हैं, जबकि बाकी 19 मेडिकल कॉलेज 2020-21 तक शुरू किये जाने थे.

 

मेडिकल कॉलेज हैं मगर सीट कहाँ हैं?

इंडिया टुडे द्वारा प्रकाशित आरटीआई रिपोर्ट के अनुसार, सरकार द्वारा 10,000 का दावा किए जाने के खिलाफ पिछले पांच वर्षों में फरवरी 2019 तक केवल 920 एमबीबीएस सीटें जोड़ी गई थीं. मेडिकल कॉलेजों की संख्या बनाम सीटों की संख्या का यह अनुपात, इस सवाल को भी जन्म देता है- कॉलेजों की बढ़ती संख्या के बावजूद पर्याप्त सीटें क्यों नहीं हैं?

आरटीआई कार्यकर्ता चंद्रशेखर गौड़ ने खुलासा किया कि आंध्र प्रदेश और राजस्थान जैसे राज्यों में क्रमशः स्वीकृत 150 और 350 सीटों के बजाय केवल 50 नई एमबीबीएस सीटें जोड़ी गईं.

जबकि झारखंड, एमपी, तमिलनाडु, उत्तराखंड, पश्चिम बंगाल और मणिपुर जैसे राज्यों में एक भी सीट नहीं जोड़ी गई है. दूसरी ओर, पंजाब (100 सीटें), ओडिशा (200 सीटें), और गुजरात (170 सीटें) ने अपने मेडिकल कॉलेजों को अपग्रेड किया और एमबीबीएस सीटों की संख्या में वृद्धि की.

 

डॉक्टर मरीज़ अनुपात

RTI के खुलासे से सरकार के दावे का पता चलता है और 2021-22 तक लक्ष्य पूरा होने पर सवाल उठते हैं. डब्ल्यूएचओ के दिशानिर्देशों के अनुसार, 600 लोगों के लिए एक डॉक्टर आदर्श अनुपात है. भारत में, प्रत्येक 11,528 लोगों के लिए एक सरकारी एलोपैथिक डॉक्टर है.

 

कोई रिसर्च नहीं

घटते  डॉक्टर-रोगी अनुपात के अलावा, और भी अधिक चिंताजनक बात यह है कि विशिष्ट डॉक्टरों की कमी और चिकित्सा के क्षेत्र में अनुसंधान की कमी. पिछले 10 वर्षों से, 576 चिकित्सा शिक्षण संस्थानों में से 332 ने एक भी शोध पत्र तैयार नहीं किया है.

केवल कुछ मेडिकल कॉलेजों जैसे कि एम्स, नई दिल्ली, पीजीआई, चंडीगढ़, सीएमसी, वेल्लोर और एसजीआईएमएस, लखनऊ ने अनुसंधान किया है जो अंतरराष्ट्रीय सहकर्मी-समीक्षा पत्रिकाओं में प्रकाशित हुआ है. भारत का लगभग हर तीसरा डॉक्टर विदेशों में रेजीडेंसी ट्रेनिंग और / या अभ्यास के लिए भारत छोड़ देता है. यदि अच्छे डॉक्टरों नहीं बने, तो भारत में गंभीर परिणाम हो सकते हैं.

 

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