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दलित बहनों ने स्कूल द्वारा उपेक्षा के बावजूद जीते कई पुरस्कार

तर्कसंगत

Image Credits: New Indian Express

September 3, 2019

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तमिलनाडु के लिए जातिगत भेदभाव नया नहीं है और, हमारे कई शिक्षण संस्थान अक्सर ऐसे होते हैं जहाँ छोटे बच्चे ये सब सीखते हैं और भेदभाव का अभ्यास शुरू करते हैं. लेकिन, सेल्वारानी और कीर्तना की कहानी से पता चलता है कि जातिवाद की समस्या कितनी व्यवस्थित है और ऐसा करने वाले शिक्षक इन जैसे मामलों में कितने अपराधी हैं.

बीस वर्षीय जीएस सेल्वरानी ने एक निजी स्कूल में हुए भेदभाव के बारे में बात करने का साहस जुटाया. इनकी बहन कीर्तना अभी कक्षा -12 वीं में पढ़ती है. एक दलित परिवार में जन्मे, दोनों ने कई उप्लब्शियाँ प्राप्त की हैं. कुछ साल पहले, राज्य सरकार ने कला और संस्कृति के क्षेत्र में उन्हें कलई इलामानी पुरस्कार से सम्मानित किया है.

 

 

भरतनाट्यम, चित्रकला, योग और सिलंबम में दोनों बहनों ने अब तक कई पुरस्कार जीते हैं. उन्होनें  द न्यू इंडियन एक्सप्रेस को बताया की कई बार कथित तौर पर उनके शिक्षकों द्वारा उन्हें मंच पर मुख्य अतिथि से पुरस्कार लेने नहीं जाने दिया जाता था. सेल्वारानी कहती हैं ”2017 में, मुझे जिला कलेक्टर के हाथों से पुरस्कार लेने के बाद उनके साथ फोटो खींचे जाने  पहले पीछे खिंच लिया गया था.”

“मुझे मेरी अपनी जाति और त्वचा के रंग के लिए नीचा दिखाया जाता था,” कीर्तना कहती हैं. “मुझसे सवाल किया गया था कि एक दलित लड़की भरतनाट्यम और अन्य कला प्रतियोगिताओं को कैसे जीत सकती है. मेरे दोस्तों और शिक्षकों का मानना था कि केवल उच्च जाति के परिवारों में पैदा हुए लोग ही उन कला रूपों में उत्कृष्टता प्राप्त कर सकते हैं.” सेल्वारानी ने 2014-15 में चित्रकला के लिए कलाइ इलमानी पुरस्कार और 2008-09 में भरतनाट्यम के लिए कीर्तना ने वही पुरस्कार जीता था.

मई 2019 में, दोनों बहनों ने तीन घंटे तक सिलंबम (सिलंबम भारत का एक हथियार आधारित मार्शल आर्ट है, जो विशेष रूप से भारतीय उपमहाद्वीप में तमिलकम से आता है, जहाँ इसकी उत्पत्ति लगभग 1000 ईसा पूर्व हुई मानी जाती है) का प्रदर्शन करके एक स्थानीय रिकॉर्ड बनाया. कीर्तना ने 2015 में सिलंबम में जोनल चैंपियनशिप जीती थी. उन्हें एक निजी कोच द्वारा प्रशिक्षित किया गया था. कीर्तना ने बताया “हम 6-7 वर्षों से उनके अधीन प्रशिक्षण ले रहे थे. जैसे ही मैंने जोनल चैंपियनशिप जीती, उन्हें हमारे स्कूल द्वारा सभी बच्चों को प्रशिक्षित करने के लिए रखा गया था. हम खुश थे. लेकिन तब हमें एहसास हुआ कि स्कूल प्रबंधन ने कोच को हमें अलग कक्षाएं देने से रोकने के लिए मना लिया था.”

 

 

“अगले वर्ष, मुझे सिलंबम प्रतियोगिता में भाग लेने की अनुमति नहीं दी गई क्योंकि मैं एक दलित परिवार से थी. बाद में, मेरी माँ ने जिला खेल अधिकारी से मुलाकात की और शिकायत दर्ज कराई, और मुझे इस कार्यक्रम में शामिल होने के लिए विशेष स्वीकृति दी गई.” यह आयोजन चेन्नई के नेहरू स्टेडियम में किया गया था, और कीर्तना ने तीसरा पुरस्कार जीता था.

लड़कियों के माता-पिता, जी सेल्वराज और एस आनंदवल्ली चाहते थे कि उनके बच्चे किसी न किसी कला के रूप में उत्कृष्ट प्रदर्शन करके जाति व्यवस्था की बेड़ियों को तोड़ दें. उनके पास कोई रास्ता नहीं था मगर इन लड़कियां ने एक से अधिक कलाओं में महारथ हासिल की हैं. “जाति ने दलित बच्चों को इन कलाओं में आगे बढ़ाने से हमेशा रोका है. लेकिन हम इसके खिलाफ लड़ना बंद नहीं कर सकते. हमारे बच्चे लड़ते रहेंगे, ”आनंदवल्ली कहती हैं.

“हम अपनी सफलता से खुश हैं, लेकिन अगर हमारे शिक्षकों और दोस्तों द्वारा हमारा मज़ाक नहीं किया गया होता तो हम और खुश होते. हम ये सुनते-सुनते थक गए, कि छोटी जाति की ये लड़कियां कैसे जीत सकती हैं और हमें ये बताया जाता है कि हमारी सफलता सरकारी रियायतों की वजह से है.” सेल्वरानी पोलिटिकल साइंस के अंतिम साल की पढ़ाई कर रही हैं. वह आईएएस अधिकारी बनने की इच्छा रखती है. एक बार जब सेल्वारानी स्कूल से पढ़ कर बाहर निकली तो फिर कीर्तना ने भी अपना स्कूल बदल लिया.

 

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