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सरकारी सर्वे : 5 में से सिर्फ 1 मुद्रा लाभार्थी ने शुरू किया नया कारोबार

तर्कसंगत

Image Credits: Financial Express

September 5, 2019

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श्रम और रोजगार मंत्रालय के तहत श्रम ब्यूरो द्वारा आयोजित प्रधानमंत्री मुद्रा योजना सर्वेक्षण की ड्राफ्ट रिपोर्ट में पाया गया है कि अप्रैल 2015-दिसंबर 2017 के 33 महीने के दौरान 1.12 करोड़ अतिरिक्त रोजगार सृजित किए गए. इसमें से 51.06 लाख स्व-नियोजित या कामकाजी मालिक थे जिनमें उनके ही परिवार के अवैतनिक परिवार के सदस्य भी शामिल थे, जबकि 60.94 लाख कर्मचारी या किराए पर काम करने वाले कर्मचारी थे.

अगर इसे आसानी से समझा जाए तो इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार इस संदर्भ में, 33 महीनों में अतिरिक्त नौकरियों की संख्या कुल दिए गए ऋणों के मुकाबले 10 प्रतिशत से भी कम थी. सर्वेक्षण में 97,000 लाभार्थियों के रूप में कई का अध्ययन किया गया और अप्रैल-नवंबर 2018 के बीच आयोजित किया गया।

इसके मुख्य निष्कर्ष:

* पहले तीन वर्षों के दौरान 12.27 करोड़ ऋण खातों के माध्यम से मुद्रा की तीन श्रेणियों – शिशु, किशोर और तरुण के तहत कुल 5.71 लाख करोड़ रुपये का ऋण स्वीकृत किया गया था. एक ऋण की औसत राशि  46,536 रुपये थी.

* 2017-18 में स्वीकृत कुल ऋण राशि का 42% शिशु ऋण (50,000 रुपये तक) में दिया गया,  34% किशोर (50,000 रुपये से 5 लाख रुपये) और 24 % तरुण ऋण (5 लाख से 10 लाख रुपये) में दिया गया.

* शिशु ऋण के माध्यम से 66%  नई  नौकरियों का सृजन हुआ; किशोर ने 18.85% नई  नौकरियों और तरुण ने 15.51% नौकरियों का निर्माण किया.

रिपोर्ट के मुताबिक सर्वे में शामिल किए गए 94,375 लाभार्थियों में से सिर्फ19,396 (20.6 फीसदी) ने ही मुद्रा लोन को नया बिजनेस स्थापित करने के लिए इस्तेमाल किया. जबकि बाकी 74,979 (79.4 फीसदी) लाभार्थियों ने अपने मौजूदा बिजनेस के विस्तार में इसे खर्च किया.

संबद्ध कृषि ने 22.77 लाख अधिक रोजगार (कुल का 20.33 प्रतिशत) बनाया. मैन्युफैक्चरिंग (विनिर्माण) से केवल 13.10 लाख (11.7 प्रतिशत) रोज़गार का सृजन हुआ.

 

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इमेज क्रेडिट : इंडियन एक्सप्रेस

 

हालांकि सर्वेक्षण में लाभार्थियों से कई सवाल पूछे गए जैसे कि क्या वे ऋण लेने के बाद उन्होनें एक नई फैक्ट्री लगाई? आदि मगर इस रिपोर्ट में नई इकाइयों और मौजूदा इकाइयों द्वारा बनाई गई अतिरिक्त नौकरियों में ब्रेक अप को साझा नहीं किया गया है.

द इंडियन एक्सप्रेस द्वारा मुद्रा सर्वेक्षण के बारे में श्रम और रोजगार मंत्रालय को भेजे गए सवालों का भी कोई जवाब नहीं मिला है.

सूत्रों ने कहा कि श्रम ब्यूरो ने 34.26 करोड़ जन धन खाता धारकों को भी लाभार्थियों की श्रेणी में शामिल करना चाहा है, खास कर उन अकाउंट को जिन्हें बैंकों द्वारा मुद्रा लाभार्थियों के रूप में 5,000 रुपये का ओवरड्राफ्ट दिया गया था.

केंद्र सरकार ने बेरोजगारी पर राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण कार्यालय (एनएसएसओ) की रिपोर्ट का जवाब देने के लिए इस सर्वेक्षण के निष्कर्षों का उपयोग करने की योजना बनाई थी. इसी साल चुनाव के ठीक बाद जारी की गई एनएसएसओ की रिपोर्ट के मुताबिक साल 2017-18 में बेरोजगारी दर पिछले 45 साल के सर्वोच्च स्तर 6.1 फीसदी पर थी.

सर्वेक्षण के अनुसार सेल्फ एम्प्लॉयड या “स्व-नियोजित” उन व्यक्तियों के रूप में परिभाषित करता है जो अपने स्वयं के प्रतिष्ठान का संचालन करते हैं या अपने खाते में या एक या कुछ भागीदारों के साथ एक पेशे या व्यापार में स्वतंत्र रूप से लगे होते हैं” इसमें  “एक प्रतिष्ठान में काम करने वाले अवैतनिक परिवार के सदस्यों को भी शामिल कर सकते हैं”.

एक श्रमिक या वर्कर एक प्रतिष्ठान का मालिक हो सकता है, उनके साथ अन्य घरेलू सदस्य सह-मालिक या साझेदार के रूप में काम कर सकते हैं या नियमित और वेतनभोगी कर्मचारियों के रूप में भी.

कर्मचारी का मतलब  “मालिक को छोड़कर वो लोग जो मजदूरी के लिए हो या नहीं और इस इकाई से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से जुड़े हुए काम में इसके सभी प्रशासनिक, तकनीकी और लिपिक कर्मचारी, पर्यवेक्षण या प्रबंधन और उत्पादन देखते हों.”

मुद्रा योजना अप्रैल 2015 में बैंकों, NBFC और माइक्रो फाइनेंस इंस्टीट्यूशंस (MFI) जैसे विभिन्न वित्तीय संस्थानों के माध्यम से गैर-कॉर्पोरेट लघु व्यवसाय क्षेत्र को वित्त पोषण प्रदान करने के लिए शुरू की गई थी.

मंत्रालय द्वारा कराए गए इस सर्वेक्षण में सृजित की गईं अतिरिक्त नौकरियों के प्रकार की भी झलक है. कुल 1.12 करोड़ नौकरियों में से लगभग आधे (51.06 लाख) ‘स्व-रोजगार या कामकाजी मालिक’ वाली श्रेणी में थे, जिसमें बिना वेतनवाले परिवार के सदस्य भी शामिल हैं, जबकि 60.94 लाख नौकरियां ‘कर्मचारी या काम पर रखे गए कर्मचारी’ वाली श्रेणी में थीं.

सर्वेक्षण शुरू होने से पहले लगभग 5 करोड़ व्यक्ति (3.1 करोड़ स्व-नियोजित, 1.95 करोड़ काम पर रखे गए कर्मचारी) ऐसे प्रतिष्ठानों में कार्यरत थे, जिन्हें मुद्रा ऋण का लाभ मिला था.

 

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