मेरी कहानी

मेरी कहानी : “कोर्ट में 6 साल की लंबी लड़ाई के बाद, मैंने अपने साथ हुए हरासमेंट के केस को वापस लेने का फैसला किया”

तर्कसंगत

September 6, 2019

SHARES

भारतीय न्यायिक प्रणाली यकीनन समय पर न्याय देने के लिए नहीं जाना जाता है. मामलों को निपटाने में कई महीने, साल और कुछ मामलों में भी दशकों लग जाते हैं. हालाँकि, जैसा कि कहा जाता है, “न्याय में देरी न्याय से वंचित होना है.”
चायपानी  की संस्थापक श्रुति चतुर्वेदी ने सिस्टम के साथ अपनी इसी लड़ाई को व्यक्त करने के लिए सोशल मीडिया का सहारा लिया. एक लम्बी लड़ाई के बाद जो छह साल तक चली, चतुर्वेदी ने अपने उत्पीड़न के मामले को वापस लेने का फैसला किया.

छह साल बाद, मुझे एक ऐसे घर पर सुनवाई के लिए पहला नोटिस मिला, जहां हम अब नहीं रहते हैं. पिछले 6 वर्षों में, मैंने 2 नौकरियां बदली, अपनी कंपनी शुरू की है और 3 शहरों में अपना ऑफिस बनाया है. मेरे पिता की नौकरी के कारण मेरे माता-पिता दूसरे शहर में रहते हैं.

कोर्ट के दो नोटिस मुझे वहां भेजे गए जहां कोई भी नहीं रहता था, उसके बाद मुझे तीसरी सुनवाई के लिए एक फोन कॉल द्वारा सूचित किया गया था. यह अप्रैल 2019 की बात है जहाँ तक मुझे याद है, मुझे अगले दो दिनों में मुझे अहमदाबाद के घी कांता अदालत में उपस्थित होने के लिए कहा गया था तब तक मैं गोवा में शिफ्ट हो चुकी थी.

हर सुनवाई के लिए, मुझे काम के दिनों में अपने खर्च पर अपने शहर से अहमदाबाद की यात्रा करने होती थी, काम के घंटे भी बर्बाद होते थे मगर इन्साफ की ललक में अपने समय की कीमत चुका रही थी. अब तक 8 बार केस की सुनवाई हो चुकी है, हर बार हमें नई तारीख दी गई. हर सुनवाई के दौरान मुझे एक उम्मीद थी कि आरोपियों को सज़ा मिलेगी. मगर हर सुनवाई के बाद जो मेरे हाथ लगता वो था नयी तारीख.

इन सब से तंग आ कर, मैंने 3 सितंबर को केस वापस लेने का फैसला किया. मैंने उस बेशर्म का भी सामना किया जिसके खिलाफ मैंने केस किया था. मेरे पिता, जो इस मुश्किल के समय मेरे साथ खड़े थे मुझे लगातार मदद करते रहे उन्होंने मुझे हमेशा खुद पर काबू रखने को कहा क्योंकि हताशा की कोई भी निशानी जज को कोर्ट में ये शंका दे सकती थी की मैं मुकदमे के कारण से परेशान हूँ. मै अपने पिता को आरोपी और उसके वकील के साथ “अच्छा” और सौहार्दपूर्ण व्यवहार करते देखती तो दिल से दुखी होती, वो बस ऐसा इसलिए कि मेरे केस वापस लेने के बाद वो हम पर केस न कर दें.

जज के यह कहने के बावजूद कि यह अपराध अनुचित था और मुझे ये केस लड़ना चाहिए, मुझे इसे वापस लेना पड़ा, क्योंकि यह अब तक के कोशिशों और तकलीफों के बाद मुझमें और केस लड़ने की ताकत नहीं बची. मुझे याद है कि जब पहली कॉल मुझे 6 साल बाद सुनवाई के बारे में मिली, तो मुझे आरोपी का नाम भी याद नहीं था. मैं ये कभी भूल नहीं पाऊँगी किस तरह से केस वापस लेने वाले दिन आरोपी ने मेरी आँखों में आँख डाल कर कहा कि अगर किसी चीज़ की ज़रूरत हो तो दूकान पर आ जाओ.

 

अपने विचारों को साझा करें

संबंधित लेख

लोड हो रहा है...