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झारखंड : बीवी के इलाज के लिए नवजात बच्ची को बेचा मगर बीवी भी नहीं बची

तर्कसंगत

Image Credits: Nyoooz

September 9, 2019

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यह खबर पढ़कर हैरानी और मायूसी दोनों ही घेर लेती है. हमारे समाज या कहें कि शहरी समाज में हर ओर ज़्यादातर चीज़ें बेहतर होती दिखती हैं, मगर ग्रामीण क्षेत्र की कहानी वहां की मुश्किलें और परेशानी हम महसूस भी नहीं कर सकते केवल पढ़ सकते हैं. झारखंड के एक गाँव की कहानी हमें परस्पर इस बात का एहसास करते रहेगी कि कैसे बीमारी और ग़रीबी एक आदमी की सारी उम्मीदों को कुचल कर रख देती है उसकी खुशियों को चीन लेती हैं.

खबर है कि झारखंड में एक गरीब दंपती ने अपनी मासूम बच्ची को 10 हजार रुपये में बेच दिया. फिर भी बच्ची की मां की जान नहीं बची. पिता भी गंभीर रूप से बीमार हैं. बच्ची को बेचने वाले दंपती का नाम चरवा उरांव (45) और झिबेल तिर्की हैं. झिबेल की मौत के बाद उसका अंतिम संस्कार भी चंदे के पैसों से किया गया.

प्रभात ख़बर के अनुसार यह वाक्या गुमला शहर से केवल दो किलोमीटर दूर पुग्गू पंचायत के चंपानगर गांव का है जो नेशनल हाइवे-43 के ठीक किनारे है और चरवा का घर मारुति शो-रूम के ठीक सामने है. चरवा की मां भोंदो उराइन ने बताया कि उसका बेटा चरवा एक सप्ताह से बीमार है. बहू झिबेल तिर्की गर्भवती थी. 22 अगस्त को घर में ही एक बच्ची को जन्म दिया. बेटी के जन्म के बाद झिबेल की स्थिति नाजुक हो गयी. गांव की सहिया की पहल पर उसे अस्पताल में भर्ती कराया गया, लेकिन अधिक रक्तस्राव की वजह से झिबेल की स्थिति नाजुक हो गयी. घर पर चरवा बीमार था और झिबेल अस्पताल में भर्ती थी. घर में फूटी कौड़ी नहीं था. राशन कार्ड नहीं होने की वजह से गोल्डेन कार्ड भी बनाना संभव नहीं था.

इसलिए झिबेल और चरवा के इलाज के लिए नवजात बच्ची को 10 हजार रुपये में बेचने का फैसला हुआ. 23 अगस्त, 2019 को बच्ची को बेचा गया और तीन दिनबाद 26 अगस्त को झिबेल की मृत्यु हो गयी. ज्ञात हो कि चरवा और झिबेल के पहले से सात बच्चे हैं. यह आठवीं बच्ची थी, जिसे इलाज के लिए बेचना पड़ा.

 

रिक्शा चलाकर करता है गुज़ारा

चरवा रिक्शा चलाकर परिवार का पालन-पोषण करता था. वहीं, झिबेल एक दुकान में मजदूरी करती थी. चरवा के पास एक रिक्शा है. रिक्शा खराब होने के बाद वह घर पर ही रहने लगा. पत्नी झिबेल तिर्की शहर के एक दुकान में मजदूरी करती थी. इन दोनों के पहले से सात बच्चे हैं. इसमें चार लड़की व तीन लड़का है. सभी की उम्र चार साल से 18 साल तक है.

चरवा की बूढ़ी मां को नहीं मिलती पेंशन

पुग्गू पंचायत के समाजसेवी गोविंदा टोप्पो ने बताया कि चरवा के परिवार को किसी सरकारी योजना का लाभ नहीं मिल रहा. उसकी बूढ़ी मां को पेंशन भी नहीं मिलती. घर में खाने के लिए अनाज नहीं हैं. न तो उसके पास राशन कार्ड है, न पक्का मकान. शौचालय भी इस परिवार को नहीं मिला. बैंक खाते में फूटी कौड़ी नहीं है. गरीबी के कारण ही चरवा ने अपनी बेटी को 10 हजार में बेचा है.

शर्मिंदा हैं मुखिया बुधू टोप्पो

पुग्गू पंचायत के मुखिया बुधू टोप्पो ने माना कि चरवा उरांव का परिवार गरीबी में जी रहा है. उन्होंने राशन कार्ड बनवाने के लिए चरवा से आधार कार्ड की फोटो कॉपी मांगी थी. मुखिया ने कहा कि वह शर्मिंदा हैं कि चरवा उरांव के परिवार के लिए वह कुछ नहीं कर पाये. चरवा की पत्नी झिबेल की मौत गरीबी के कारण हुई है. गांव के लोगों ने चंदा करके उसका अंतिम संस्कार किया है. मुखिया ने कहा कि वह अपने फंड से चरवा उरांव के परिवार की मदद करेंगे.

 

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