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गीता चौहान: 28 इंटरव्यू में रिजेक्शन, पोलियो मगर सब के विपरीत व्हीलचेयर बास्केटबाल की एक चैंपियन खिलाड़ी

तर्कसंगत

September 9, 2019

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दिव्यांगता एक समय में अभिशाप के नज़र से देखी जाती थी. मगर अब समय बदल रहा है, शुक्र है कि लोगों के ज़ेहन में बदलाव आ रहा है. ऐसा हो भी क्यों नहीं, गीता चौहान जैसी शख़्शियत जब अपने ज़िन्दगी से एक उदाहरण पेश करती जाएँगी तो ये सोच बदलती रहेगी.

ये हम सभी जानते हैं कि दिव्यांगता अपने आप में एक कठिन चुनौती है, और उस परिस्थिति में समाज और परिवार की अवहेलना आपको और द्रवित कर जाती है. गीता चौहान के साथ भी कुछ ऐसी ही स्थिति थी जहाँ उनसे समाज, रिश्तेदार और परिवार से उस वक़्त वैसा साथ नहीं मिला जिसकी उन्हें उस वक़्त सबसे ज़्यादा ज़रूरत थी. मगर कहते हैं न आग में तप कर ही सोना और निखरता है. 

इन सारी उपेक्षाओं और शुरूआती मुश्किलों से लड़कर आज पारा बास्केटबॉल की चैंपियन गीता चौहान (अनु) को काफी अड़चनों से गुज़ारना पड़ा जिसका उन्होनें काफी दिलेरी से सामना किया.

 

 

बचपन का संघर्ष 

बचपन में एक बार बीमार पड़ने पर डॉक्टर ने पोलियो का शक मानते हुए उन्हें इंजेक्शन दिया, जिसके बाद से उनके दोनों पैर ने काम करना बंद कर दिया, बड़ी मुश्किल और इलाज के बाद उनके पैर में थोड़ी जान आई जिसके बाद वो बैसाखी के बदौलत चल  पा रही थी. यह उस समय की बात है जब उनकी उम्र केवल 6 साल थी.

बजाए इसके कि उनकी मदद की जाये और उनका हौसला बढ़ाया जाए उनके आस पड़ोस रिश्तेदारों ने उनको एक बोझ की तरह देखना शुरू कर दिया. सबसे पहली दिक्क्त आयी उनके पढ़ाई को लेकर जब उन्हें एक म्युनिसिपेलिटी स्कूल में बड़ी मुश्किल से दाखिला मगर वहां भी उनका कोई दोस्त नहीं बन सका. वो अकेली ही रहती थी. 

 

पढ़ाई और नौकरी की मुश्किलें

कॉलेज के वक़्त भी उन्हें अपने पिता जो कि एक पान दूकान चलाते थे से कोई ज़्यादा सहारा नहीं मिला. मगर उसके लिए इनके मन में कोई मलाल नहीं. हो सकता है उस वक़्त उनके पिता कि कोई मजबूरी रही होगी. बहरहाल गीता चौहान ने अपने दम पर जूनियर कॉलेज में दाखिल लिया और अपना खर्च निकलने के लिए पार्ट टाइम नौकरी भी करने लगीं. इसके पहले 11 वी में जब वो पढ़ाई के साथ काम करना चाहती थी तो 28 बार रिजेक्ट हुई थी. मगर इन सब से बिना हारे उन्होनें बीकॉम और एमकॉम की पढ़ाई पूरी की.

हम और आप होते तो न जाने क्या करते. मगर गीता थी की डटी रही अपनी ज़िद्द पर और अंत में मार्केटिंग की जॉब अपनी क़ाबलियत की बुते पर हासिल की.  

 

 

लगा की ज़िन्दगी अब पटरी पर आ रही है. इसी बीच गीता की दोस्ती अपने कॉलेज के दोस्त सुजीत से अच्छी हो गयी. उनके साथ समय बिताकर इन्हें लगा कि ये ज़िन्दगी और भी बहुत कुछ कर सकती हैं और उनके कहने पर ही CA की पढाई भी शुरू की. सुजीत ने गीता की हर सम्भव मदद की. मगर नियति को कुछ दूसरी चीज़ मंज़ूर थी. अपने काम के कारण सुजीत को मुंबई से बैंगलोर शिफ्ट होना पड़ा, इन दोनों ने इस दूरी को भी अपने प्यार की मज़बूती से पार करने का मन बना लिया. एक बार सुजीत को सरप्राइज देने के लिए जब ये मुंबई से बैंगलोर पहुंची तो खुद अचम्भित हो गयी. सुजीत एक रोड एक्सीडेंट के कारण अस्पताल में भर्ती थे, जिसके कुछ दिन बाद उनकी मौत हो गयी. 

इस समय की कल्पना आप शायद कर सकेंगे कि जिसकी ज़िन्दगी में ख़ुशी एक धुप छांव का खेल खेल रही हो उस लड़की पर क्या बीतेगी, जब जब लगता की ज़िन्दगी एक खूबसूरत मोड़ ले रही है, उस मोड़ पर ठोकर मिलती.

 

व्हीलचेयर बास्केटबॉल की शुरुआत

सारी मुशकिओं के बावजूद भी गीता चौहान ने खुद को समेट कर खड़ा किया. 2012 में सुजीत की मौत के बाद वो 5 साल तक डिप्रेशन में रहीं, और तब एक ऑनलाइन फ्रेंड के ज़रिये उन्हें व्हीलचेयर बास्केटबॉल के बारे में पता चला जो उनकी  ज़िन्दगी में नया मोड़ ले कर आया. तब तक वो अपनी रिलायंस मनी की ब्रांच मैनेजर की नौकरी छोड़ कर खुद का बिज़नेस शुरू करने की सोच रह थी.

 

 

फिर उन्होनें महाराष्ट्र की ओर से व्हीलचेयर बास्केटबॉल खेलना शुरू किया. उन्होनें पहली बार 2017 में चौथे नेशनल व्हीलचेयर बास्केटबॉल में हिस्सा लिया. 2018 में दूसरी बार पांचवे नेशनल व्हीलचेयर बास्केटबॉल में तमिलनाडु के खिलाफ फाइनल मैच में 12 पॉइंट्स के साथ वो उस टूर्नामेंट की टॉप स्कोरर थी, और जीत के लिए उन्हें गोल्ड मैडल भी मिला था. इसके बाद 2019 के छठे नेशनल व्हीलचेयर बास्केटबॉल में भी इन्होने गोल्ड मैडल जीता है. 

गीता ने मार्च 2018 में बैंकॉक, थाईलैंड में एशियन पैरा गेम्स क्वालिफाइंग ट्रायल में भारत का प्रतिनिधित्व किया.

सिर्फ इतना ही नहीं अपनी खेल का लोहा मनवाते हुए उन्होनें अपने लिए भारतीय महिला व्हीलचेयर बास्केटबॉल टीम में जगह बनाई है जो 2019 नवंबर AOZ चैंपियनशिप में हिस्सा लेगी. AOZ चैंपियनशिप 2020 में जापान के टोक्यो में होने वाले पैरालिम्पिक्स का क्वालीफ़ायर टूर्नामेंट है.

अपनी खेल के दम पर वो अंतर्राष्ट्रीय प्रतियोगतिओं में भारत का प्रतिनिधत्व कर चुकी हैं. गीताअब व्हीलचेयर टेनिस में भी हाथ आज़मा रही हैं.

 

 

 इन्होनें चेन्नई में आयोजित ओपन नेशनल व्हीलचेयर टेनिस चैम्पियनशिप 2018 में युगल में उपविजेता का खिताब जीता है. बैंगलोर में आयोजित नेशनल व्हीलचेयर टेनिस चैम्पियनशिप 2018 में भाग लिया है. इसके साथ ही ये मैराथन रनर भी रह चुकी हैं इन्होनें वलसाड में आयोजित व्हीलचेयर मैराथन में 10 KM की दुरी 40 मिनट 3 सेकंड में पूरी की है.

गीता चौहान की ज़िन्दगी प्रेरणा की जीतीजागती मिसाल है, जिसकी कल्पना कर भी लिया जाए तो उसे जीना हर किसी के बस की बात नहीं.

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