मेरी कहानी

मेरी कहानी : #BasEkCall आत्महत्या की रोकथाम के लिए नेशनल हेल्पलाइन नंबर जारी करें

तर्कसंगत

September 10, 2019

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अपनों का हमें छोड़ कर चले जाना हमें काफी तकलीफ देता है. मगर एक चीज़ जो उस तकलीफ को कुरेदती रहती है वो है उनके जाने के पीछे का राज़ उनके साथ ही चला जाये, हमें ये पता ही न चले कि वो किस कारण से छोड़ कर चले गए. ये एक दर्द हमें हर पल हर वक़्त जाने वाले के याद के साथ मन में एक टीस की तरह चुभती रहती है. कुछ लोग इस टीस को भी भूल जाते हैं या भूलना सीख लेते हैं. आज 10 सितम्बर विश्व आत्महत्या निषेध दिवस पर हम आपके साथ बाँटने जा रहे हैं एक बहन की कहानी जिसने इसी तरह अपने सबसे प्यारे भाई को खो दिया और वो भी अब उसी टीस, दर्द, आशंका, सवाल के साथ जी रही है कि उसका भाई उसे छोड़ कर क्यों गया? मगर इसके साथ जुड़ी हमारी, आपकी ख़ामोशी या नज़रन्दाज़ी वाले रवैये को भी बदलने की कोशिश उन्होनें की है, उनकी कहानी को महसूस कीजिये और उनकी एक पहल में उनका साथ दीजिये।

रात के करीब 8:45 रहे होंगे जब मेरे फोन की घंटी बजी। मैं अपने कमरे में थी। मैं किसी तरह डैड की आवाज़ सुन पा रही थी, शायद वो घर से बाहर जा रहे थे। मुझे कुछ समझ नहीं आया और मैंने उन्हें दुबारा फोन किया। उन्होंने कुछ सेकंड के बाद फोन उठाया और मुझे तब एहसास हुआ कि वो रो रहे थे। मैंने उस दिन से पहले कभी भी डैड को रोते हुए नहीं देखा था। और तभी उन्होंने कुछ ऐसा कहा जो मेरे दिल-दिमाग में ज़िंदगी भर के लिए एक चीख की तरह जा बसा, “राघव हमें छोड़कर चला गया!”

मेरा छोटा भाई बस 18 साल का था।

वो मेरा सबसे अच्छा दोस्त था, मेरे हँसी की वजह था। वो हमेशा दूसरों की मदद के लिए खड़ा रहता था पर जब उसे मदद की ज़रूरत थी तो उसने किसी को नहीं पुकारा।

6 जनवरी, 2019 को आत्महत्या ने मुझसे मेरे भाई को छीन लिया।

ये कोई नयी कहानी नहीं है और ना ही अनोखी है। ये लाखों परिवार की कहानी है जो आए दिन अपने भाई, अपनी बहन, अपनी माँ, अपने पिता या अपने दोस्त को इस खामोश हत्यारे का शिकार बनते देखते हैं।

विश्व स्वास्थ्य संगठन (World Health Organisation, WHO) के अनुसार आत्महत्या युवा व्यस्कों में मौत का दूसरा सबसे बड़ा कारण है। लैंसेट पब्लिक हेल्थ जर्नल की एक ग्लोबल स्टडी (1990-2016) के दौरान भारत में आत्महत्या को लेकर पहली बार चौंकाने वाले आंकड़े सामने आए।

2016 में भारत में आत्महत्या के सबसे ज़्यादा मामले देखे गए। ये आंकड़ा हर साल बढ़ता जा रहा है।

अपनी रिसर्च के दौरान एक और कड़वा सच मेरे सामने आया। हमारे देश में आत्महत्या की रोकथाम(Suicide Prevention) के लिए बने अधिकांश हेल्पलाइन नंबर काम ही नहीं करते हैं। मैंने 15 नंबरों पर खुद कॉल कर के देखा, कुछ बंद थे और कुछ पर जवाब नहीं मिला। केवल तीन नंबर पर कॉल करने पर जवाब मिला।

मेरे भाई ने आत्महत्या से पहले किसी को नहीं पुकारा, शायद उसके मन में रहा होगा कि कोई सुनेगा नहीं। पर मुझे इसे बदलना है, आत्महत्या का ख्याल आने वालों को बताना है कि कोई ना कोई ज़रूर उनकी पुकार सुनेगा। साथ ही मैं ये भी चाहती हूँ कि सरकार भी मानसिक स्वास्थ्य के मुद्दे पर बड़ा कदम उठाए।

मेरी पेटीशन पर हस्ताक्षर करें और स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय से कहें कि वो आत्महत्या की रोकथाम के लिए एक नेशनल हेल्पलाइन नंबर जारी करें। 10 सितंबर को विश्व आत्महत्या रोकथाम दिवस (World Suicide Prevention Day) से पहले सरकार हेल्पलाइन नंबर जारी कर के सभी भारतीयों से कहे कि मदद बस एक फोन कॉल दूर है।

हमारे देश में दिमाग के डॉक्टर के पास जाने वाले व्यक्ति को पागल कह दिया जाता है। दिमाग भी हमारे ही शरीर का एक हिस्सा है, इसकी बीमारी भी अन्य बीमारियों की तरह ही है और इसका इलाज ज़रूरी है और संभव भी है।

मैं अकेले तो इस सोच को विकसित नहीं कर सकती पर अगर आप सब और साशन-प्रशासन हमारा साथ दें तो मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी सोच को बदला जा सकता है। मेरी पेटीशन पर हस्ताक्षर करें और इसे ज्यादा से ज्यादा शेयर करें।

आइये आत्महत्या की दहलीज़ पर खड़े लोगों को ज़िंदगी के घर में वापस लाएं। चलिए हर भारतीय से कहें कि मदद #BasEkCall दूर है। #StandAgainstSuicide

 

 

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