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दिव्यांग हैं मगर देशी जुगाड़ और ई-वेस्ट से बना रहे हैं ई-बाइक

तर्कसंगत

Image Credits: ANI Twitter/The Better India

September 13, 2019

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एक दिव्यांग इनोवेटर के तौर पर प्रसिद्धि हासिल कर रहे विष्णु पटेल की कहानी शुरू से आसान नहीं थी. उनको बचपन में पोलियो हुआ था, जिसकी वजह से वे ठीक से चल नहीं पाते. मगर ये उनकी कमज़ोरी कहीं से भी नहीं थी. बल्कि, उन्होंने हर एक मुश्किल से दो दो हाथ कर अपनी राह बनाई.

विष्णु पटेल के बेटे निखिल पटेल ने बेटर इंडिया से बात करते हुए बताया, “बचपन में मेरे दादाजी ने पापा के पैर का इलाज करवाने की बहुत कोशिश की, लेकिन पापा पूरी तरह ठीक नहीं हो पाए. पर पापा ने कभी भी इस चीज़ को अपने काम के बीच में नहीं आने दिया. भले ही वे बहुत ज़्यादा पढ़-लिख नहीं पाए, पर उनका दिमाग बहुत तेज़ है. फिर पिछले कुछ सालों से उनको कान में भी दिक्कत होने लगी और अब वे बिल्कुल भी नहीं सुन पाते हैं.”

 

ई वेस्ट से ई रिक्शा

विष्णु पटेल ने हाल ही में बिना किसी प्रोफेशनल ट्रेनिंग और मदद के, अलग-अलग तरह के कचरे का इस्तेमाल कर ‘ई-बाइक’ बनाई है. इस बाइक की खासियत यह है कि इसे पुरानी चीज़ों, जैसे कि वाहनों के पुराने कल-पुर्जे, लैपटॉप-मोबाइल आदि की बैटरी जैसी चीज़ों से बनाया गया है.

 

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पटेल परिवार का कॉपर वायर ड्राइंग डाईज़ का बिज़नेस है, जिसे विष्णु पटेल ने ही शुरू किया था और अब निखिल इसे संभाल रहे हैं. विष्णु भले ही पांचवी तक पढ़े हैं, पर तकनीक और मैकेनिकल कामों में उनकी दिलचस्पी हमेशा से रही है. अपनी युवावस्था से लेकर अब तक विष्णु पटेल ने बहुत से व्यवसायों में अपना हाथ आजमाया है. कभी सिनेमा दिखाने के लिए अपना छोटा-सा मूवी थिएटर शुरू किया, तो कई सालों तक डायमंड का काम किया और फिर वायर ड्राइंग डाईज़ की अपनी मैन्युफैक्चरिंग यूनिट खोल ली. उनकी मैन्युफैक्चरिंग यूनिट में जो भी मशीन लगीं हैं, उनमें से कई खुद विष्णु पटेल ने बनाई हैं.

 

 

किसी भी तरह के इलेक्ट्रॉनिक और मैकेनिकल वेस्ट को वो फेंकते नहीं हैं, बल्कि उसे संभाल कर रखते हैं, क्योंकि जो बाकी लोगों के लिए कबाड़ है, उसमें विष्णु पटेल किसी नयी चीज़ का भविष्य देखते हैं. हालांकि, उन्होंने कोई प्रोफेशनल पढ़ाई या ट्रेनिंग तो की नहीं थी, पर ऐसे में डिजिटल टेक्नोलॉजी उनके काम आई.

 

यू ट्यूब में दिलचस्पी

विष्णु पटेल को उनके परिवार वालों ने स्मार्ट फ़ोन पर यूट्यूब आदि चलाना सिखाया. वैसे तो विष्णु ठीक से सुन नहीं सकते, पर उन्हें कुछ न कुछ देखते रहने का शौक था. इसी शौक के चलते उन्हें यूट्यूब पर ‘डू इट योरसेल्फ’ विडियोज़ के बारे में पता चला और उन्होंने दुनिया भर से अपलोड होने वाली ऐसी विडियो देखना शुरू किया.

विष्णु पटेल के परिवार को भी यकीन नहीं था कि वे यह काम करने में सफ़ल हो पायेंगें क्योंकि इस दौरान उन्होंने बहुत-सी चुनौतियों का सामना किया. सबसे पहले तो सुनने में परेशानी होने की वजह से उनके लिए विडियोज़ को समझ पाना भी मुश्किल था, वे सिर्फ़ विडियो देखकर ही चीज़ें सीखते थे. इसके अलावा संसाधनों और पैसे की भी काफ़ी समस्या रही.

 

पहली ई बाइक से हुआ विश्वास

जब विष्णु पटेल ने पहली ई -बाइक बनाई, तो उनके बेटे और परिवार को विश्वास हुआ कि वे इस व्यवसाय में आगे कुछ अच्छा कर सकते हैं. उन्हें अपना यह पहला इनोवेशन खत्म करने में 4 से 6 महीने लगे. इस पूरे काम को उन्होंने अपनी मैन्युफैक्चरिंग यूनिट के ही एक छोटे से कोने में बैठकर किया.अभी भी उनके पास कोई वर्कशॉप नहीं है, जहाँ वे अपने इनोवेशन पर काम कर सकें.

उन्होंने आगे बताया कि दिव्यांगता की वजह से उनके पिता ने बहुत संघर्ष किया है और इसलिए अपने इनोवेशन के माध्यम से वे अन्य दिव्यांग लोगों के लिए कुछ करना चाहते हैं. साथ ही, उनका सपना है कि वे अपने इन इनोवेटिव कार्यों से ‘मेक इन इंडिया’ में भी योगदान दें.

विष्णु पटेल, ऐसी और भी इ-बाइक बनाना चाहते हैं, जिससे कि समाज का भी भला हो और देश की उन्नति में भी यह सहायक बनें. अपनी आगे की योजना में उनकी कोशिश सोलर ऊर्जा का इस्तेमाल करने की है. सोलर पैनल में एक बार की लागत काफ़ी होती है, इसलिए अभी विष्णु के लिए मुमकिन नहीं कि वे सोलर पैनल लगायें.

पर भविष्य में, जब भी उनके पास पर्याप्त फंड्स होंगें, तो उनकी कोशिश रहेगी कि उनके सभी इनोवेशन सौर ऊर्जा से संचालित हों. हालांकि, उन्हें उनकी वर्कशॉप लगाने के लिए लगभग 20 लाख रूपये तक की राशि की ज़रूरत है, जो एक साथ जुटा पाना उनके और उनके परिवार के लिए बहुत मुश्किल है.

तर्कसंगत ये उम्मीद करता है कि इनकी तकनीक को बड़ी कंपनियों का भी साथ मिले ताकि इनके हुनर को सही पहचान और जगह मिले

 

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