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दूसरी पुण्यतिथि : पहले एयरफोर्स मार्शल अर्जन सिंह की एक अधूरी ख्वाइश और कुछ रोचक किस्से

तर्कसंगत

Image Credits: Twitter/Navbharat Times

September 17, 2019

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भारतीय वायु सेना ने सोमवार को मार्शल अर्जन सिंह को उनकी दूसरी पुण्यतिथि पर श्रद्धांजलि दी. दुनिया में बहुत कम वायुसेना अध्यक्ष होंगे जिन्होंने मात्र 40 साल की उम्र में ये पद संभाला हो और सिर्फ 45 साल की उम्र में ‘रिटायर’ हो गए हों. एयरफोर्स में पांच सितारा रैंक हासिल करने वाले इकलौते अफसर. महज़ 19 साल की उम्र में पायलट ट्रेनिंग के लिए चुने जाने वाले शख्स, जो 44 साल की उम्र में एयरफोर्स चीफ बने. अर्जन सिंह का फ्लाइंग रिकॉर्ड भी बहुत तगड़ा रहा. उन्होंने अपने शानदार करियर के दौरान 60 से भी ज्यादा तरह के एयरक्राफ्ट उड़ाए. उनको फ्लाइंग का इतना शौक था कि वो अपनी नौकरी के आखिरी दिन तक प्लेन उड़ाना नहीं भूले.

अप्रैल 2016 में अर्जन सिंह के 97वें जन्मदिन के मौके पर पश्चिम बंगाल स्थित पनागढ़ एयरफोर्स बेस का नाम उनके नाम पर रखा गया. इसे अब एमआईएफ अर्जन सिंह के नाम से जाना जाता है. ऐसा पहली बार हुआ था जब एक जीवित ऑफिसर के नाम पर सैन्य प्रतिष्ठान का नाम रखा गया था.

अर्जन सिंह छात्र जीवन से होनहार थे और उन्होंने डेढ़ मील तैराकी प्रतियोगिता में फ्री स्टाइल तैराकी में ऑल इंडिया रिकॉर्ड बनाया था. पायलट प्रशिक्षण के लिए 1938 में उन्हें रॉयल एयर फोर्स कॉलेज, क्रेनवेल के लिए चुना गया. उस समय उनकी उम्र महज 19 साल थी. भारतीय कैडेट्स के अपने बैच में उन्होंने कोर्स में टॉप किया. कॉलेज के दिनों में वह तैराकी, एथलेटिक्स और हॉकी टीमों के उप कप्तान भी रहे.

 

जब अंग्रेज़ भी कोर्ट मार्शल नहीं कर पाए

अर्जन सिंह का उस वक्त कोर्ट मार्शल होते-होते रह गया था जब वह एक फ्लाइंग ऑफिसर थे और एक ट्रेनी पायलट का उत्साहवर्धन करने की कोशिश कर रहे थे. दरअसल उन्होंने केरल में एक घर के ऊपर अपने प्लेन से बहुत ही नीची उड़ान भरी. दरअसल वो घर कॉरपोरल रैंक के अफसर की थी. अर्जन एयरक्राफ्ट को काफी नीचे उड़ा रहे थे और उन्होंने कॉरपोरल के घर के कई चक्कर लगाए. एयरक्राफ्ट की आवाज सुनकर कॉरपोरल के साथ-साथ मोहल्ले के लोग भी घरों से बाहर निकल आए. मोहल्लेवालों के लिए इतने नजदीक से एयरक्राफ्ट देखना नया अनुभव था. लेकिन ब्रिटिश अधिकारियों को ये पसंद नहीं आया. अर्जन सिंह की शिकायत पहुंची जब इस बारे में पड़ताल की गई और उनसे पूछा गया तो उन्होंने कहा कि इस तरह की तकनीक हर कैडट को फाइटर पायलट बनाने के बहुत जरूरी हैं और वह इसके जरिए अपने ट्रेनी पायलट को ट्रेन कर रहे थे. दूसरे वर्ल्ड वॉर की वजह से ब्रिटिश सेना को ट्रेंड पायलट्स की ज़रूरत थी. ऐसे में वो चाहते हुए भी अर्जन को बाहर नहीं कर सकते थे.

 

दिसंबर 1942 की अर्जन सिंह की एक तस्वीर
इमेज कर्टसी: लल्लनटॉप

 

पाकिस्तान में घुस कर बम बरसाना था सपना

1965 में जब पाकिस्तान ने भारत के खिलाफ ऑपरेशन ग्रैंड स्लैम लॉन्च किया था तो उसी वक्त जम्मू-कश्मीर के अखनूर पर हमला बोल दिया. रक्षा मंत्रालय को खबर मिली तो वह चौकन्ना हो गया और सभी सेना प्रमुखों को बुला लिया. इसी मीटिंग में अर्जन सिंह से पूछा गया था कि पाक टैंकों को पस्त करने के लिए वह कितनी देर में हमला कर सकते हैं. इस अर्जन सिंह ने कहा कि बस 1 घंटा चाहिए. लेकिन हकीकत ये है कि महज़ 26 मिनट बाद ही इंडियन एयरफोर्स के प्लेन पाकिस्तान पर हवाई हमला करने के लिए उड़ान भर चुके थे. फिर भी, अर्जन सिंह को पाक के साथ युद्ध जल्दी खत्म होने का हमेशा मलाल रहा. अर्जन खुद भी पाकिस्तान जाकर बम बरसाना चाहते थे. लेकिन रक्षामंत्री ने इसकी इजाज़त नहीं दी. शायद रक्षा मंत्री उनके सरीखे एयरफोर्स चीफ़ को खोना नहीं चाहते थे.

 

इमेज कर्टसी: गाँव कनेक्शन

 

बहादुर के साथ दिलदार

अर्जन सिंह न सिर्फ बहादुर थे बल्कि बड़े दिल वाले थे. उन्होंने एयर फोर्स के सैनिकों की मदद के लिए दिल्ली के पास स्थित अपने खेत और फार्म तक बेच दिया था. इससे उन्हें 2 करोड़ रुपये मिले जो उन्होंने सेवानिवृत्त एयर फोर्स के सैनिकों के लिए बने ट्रस्ट को दे दिया था. अपने करियर में अर्जन सिंह ने 60 अलग-अलग तरह के विमानों में उड़ान भरी. उन्होंने द्वितीय विश्व युद्ध के पहले इस्तेमाल होने वाले बाईप्लेन से लेकर सुपरसोनिक मिग-21 तक की उड़ान भरी। उन्होंने पहली बार वायुसेना अध्यक्ष के तौर पर अकेले मिग-21 की उड़ान भरी थी.

 

रिटायरमेंट के दिन तक एयरक्राफ्ट उड़ाना नहीं भूले थे अर्जन सिंह.

 

पद्म विभूषण से सम्मनित

उन्हें 1965 के युद्ध में उनके असाधारण नेतृत्व कौशल के लिए पद्म विभूषण से भी सम्मानित किया गया. 1971 में अर्जन सिंह को स्विटरजलैंड में भारत का राजदूत नियुक्त किया गया. तीन साल बाद उनको केन्या में देश का उच्चायुक्त नियुक्त किया गया. 1978 में उन्होंने अल्पसंख्यक आयोग के सदस्य के तौर पर भी अपनी सेवा दी. बाद में वह इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ टेक्नॉलजी, नई दिल्ली के चेयरमैन बने और 1983 तक पद पर रहे. 1989 में उनको दिल्ली का उपराज्यपाल बनाया गया.

 

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इमेज कर्टसी: उत्तरप्रदेश.ऑर्ग

 

मिग 21

अर्जन सिंह के एयर चीफ रहते हुए एयरफोर्स का काफी कायाकल्प हुआ था. एयरफोर्स को नए जमाने के सुपरसोनिक फाइटर प्लेन, टैक्टिकल ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट, असॉल्ट हेलिकॉप्टर के साथ कई आधुनिक हथियार मिले थे. हैदराबाद में एयरफोर्स एकैडमी शुरू हुई थी. मॉडर्न रडार और कम्युनिकेशन नेटवर्क पर भी काम शुरू हुआ था. चीन से लड़ाई हारने के बाद भारतीय वायुसेना विस्तार और आधुनिकीकरण की योजना बना रही थी. उस समय भारत के पास मुश्किल से 20 स्कवार्डन रहे होंगे. अधिकतर विमान पुराने पड़ चुके थे. भारत के पहले मिग 21 तब आए जब अर्जन सिंह एयर चीफ बन रहे थे.

27 जुलाई, 2015 को पूर्व राष्ट्रपति डॉ. अब्दुल कलाम के निधन के बाद उनका पार्थिव शरीर दिल्ली के पालम एयरपोर्ट पर लाया गया.तब कलाम के अंतिम दर्शन के लिए राष्ट्रपति और पीएम समेत कई नेता पहुंचे थे. लेकिन सबकी नजरें कांपते हाथों से सैल्यूट करते योद्धा अर्जन सिंह पर थीं. वे आए तो व्हीलचेयर पर थे, लेकिन कलाम पार्थिव शरीर को देखते ही खुद चलकर पास आए और तनकर सलामी भी दी.

 

दिल्ली में डॉ. कलाम को सल्यूट करके अर्जन सिंह

 

98 साल की उम्र में दिल्ली स्थित आर्मी हॉस्पिटल रिसर्च ऐंड रेफरल में 16 सितंबर को उन्होंने आखिरी सांस ली. अपने जीवन के अंतिम दिनों तक अर्जन सिंह गोल्फ खेलते रहे। एक वक्त ऐसा भी आया जब वो चल नहीं पाते थे तब वो अपनी व्हील चेयर पर बैठकर लोगों को गोल्फ खेलते हुए देखा करते थे.

 

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