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इन्होनें लड़ी है मूक बधिरों के लिए असल लड़ाई, बदलवाए कानून, बनवाये थाने और दिलवाये आरक्षण

तर्कसंगत

September 20, 2019

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कहानी है ज्ञानेन्द्र पुरोहित की जिन्होंने समाज के ऐसे तबके को अपनी आवाज दी, जो न तो मुंह से बोल सकता है और न कानों से सुन सकता है। इन लोगों की डगर पथरीली है और भविष्य अंधकारमय। पुरोहित ने इन लोगों का हाथ बेहद मजबूती से थामा और समाज की मुख्यधारा में इन्हें लाने का बीड़ा उठाया।

 

ऐसे हुई शुरुआत

पुरोहित के भाई आनंद भी मूक-बधिर थे और ट्रेन में यात्रा के दौरान किसी ने उन्हें धक्का दे दिया। हादसे में उनकी मौत हो गई। पुरोहित को इस घटना ने आहत किया। सीए की पढाई बीच में ही छोड मूक-बधिरों को न्याय दिलाने के लिये एलएलबी किया, एलएलएम किया और जब जब ज़रुरत पड़ी तब-तब काला कोट पहन कर अदालती लडाईयां भी लड़ी। इस लड़ाई में ज्ञानेन्द्र की पत्नी भी कंधे से कंधा मिलाकर अपने पति के साथ चलने लगीं और मुश्किल राह पर चलते-चलते 15 साल गुज़र गये। इस दौरान कई सवालों से उनका सामना हुआ, नए-नए विचार आए और उन्होंने मूक-बधिरों के जीवन की कठिनाइयों को दूर करने के बीड़ा उठाया और इस दिशा में कई कार्य किए जो माइल स्टोन बन गए।

 

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मूक-बधिरों के लिए राष्ट्रगान

जब राष्ट्रगान होता है तो सभी लोग सावधान मुद्रा में खड़े होकर राष्ट्रगान गाते हैं। एक तबका ऐसा भी था जो न तो राष्ट्रगान सुन सकता था और न इसे गा सकता था। आजाद भारत में रहने वाले इन लोगों को हमेशा इस बात का दर्द सालता कि वे राष्ट्रगान नहीं गा सकते। पुरोहित ने इन लोगों की समस्या को समझा और साइनिंग लेंग्वेज में राष्ट्रगान कंपोज किया। इसके बाद उन्होंने इसे मान्यता दिलाने के लिए कड़ा संघर्ष किया। 2001 में प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से मुलाकात कर मूक-बधिर लोगों के आग्रह को उन तक पहुंचाया और आखिरकार मूक-बधिर लोगों को भी साइनिंग लेंग्वेज में राष्ट्रगान का हक मिल गया।

सन् 2000 में ज्ञानेन्द्र ने मूक-बधिरों के लिए ‘आनंद सर्विस सोसाईटी’ के नाम से संस्था शुरु की।

 

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उम्मीद और ख़ुशी बाँटते हैं

एडमिशन से लेकर नौकरी तक परेशानियों से जूझ रहे लोगों की मदद के लिए ज्ञानेंद्र पुरोहित हमेशा तत्पर नजर आते हैं। चाहे नौकरी हो या शिक्षा इन बच्चों के सामने सबसे बड़ी समस्या यह है कि वे अपनी बात नहीं रख पाते और इन्हें मिलने वाली सीट पर अन्य वर्गों (दृष्टि बाधित और अस्थि बाधित) में आरक्षित बच्चों को प्रवेश दे दिया जाता है। आस्ट्रेलिया के पर्थ में हुए वर्ल्ड डेफ कॉन्फ्रेंस में मूक-बधिरों को न्याय दिलाने के लिए के ज्ञानेन्द्र ने एक प्रेजेन्टेशन दिया, जिसके बाद वहीं की एक संस्था वेस्टर्न डेफ सोसाईटी नें उन्हें अच्छे पैकेज पर नौकरी की पेशकश की। मगर आनंद ने यह कहते हुए नौकरी ठुकरा दी कि आपके देश से ज्यादा भारत के मूक-बधिरों को उनकी जरूरत है।

 

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मूक-बधिरों  के लिए विशेष थाना

मूक-बधिरों का जब भी समाज में शोषण होता तो वे अपनी बात किसी के भी सामने नहीं रख पाते। मारपीट, छेड़छाड़ तो ठीक बलात्कार जैसे जघन्य अपराधों के शिकारों की भी कोई सुनवाई नहीं होती। लगातार दो साल तक प्रदेश के गृहमंत्री और पुलिस के आला अधिकारियों को समझाते रहने के बाद 2002 में देश का पहला मूक-बधिर थाना शुरु हुआ। अब तक यहां 180 शिकायतें दर्ज की जा चुकी हैं इनमें से 15 मामलों में आरोपियों को सजा भी दिलवाई जा चुकी है। इसी तरह के प्रकोष्ठ अब ग्वालियर, जबलपुर और रीवा में भी हैं। अब तो सामान्य थानों में भी वीडियो कांफ्रेंसिंग के जरिए एफआईआर दर्ज कर ली जाती है।

 

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मूक-बधिरों के लिए फिल्म

ज्ञानेन्द्र ने देखा कि मूक-बधिरों के पास मनोरंजन का कोई ज्यादा साधन नहीं है। मूक-बधिर भी फिल्में तो देखना चाहते हैं, मगर परेशानी ये है कि एक एक डायलॉग सांकेतिक भाषा में उनको समझायेगा कौन। तो इस परेशानी का हल ढूंढा गया। हिन्दी सुपरहिट फिल्मों को सांकेतिक भाषा में डब करने की ठानी गई। कानूनी पेचिदगियों को दूर करने के बाद इंदौर पुलिस की मदद से ज्ञानेन्द्र ने हिन्दी फिल्म शोले, गांधी, तारे जमीं पर, मुन्नाभाई एमबीबीएस को सांकेतिक भाषा में डब किया।

 

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मूक-बधिरों के आरक्षण की लड़ाई

2011-12 में ज्ञानेन्द्र ने प्रदेश में सरकारी नौकरियों में मूक-बधिरों के आरक्षण की लडाई शुरु की। निचली अदालत से लेकर हाईकोर्ट तक लडाई जीतते गये। मगर फिर से सुप्रीम कोर्ट में राज्य सरकार की अपील करने के बाद केस लडने के साथ-साथ सड़क पर उतरकर आंदोलन शुरु कर दिया। सरकार द्वारा मांगे मान लीं गईं। सरकारी नौकरियों में मूक-बधिरों के लिये आरक्षण 2 फीसदी रखा गया है। नतीजा यह है कि स्कूल शिक्षा विभाग के 39 हजार पदों पर नियुक्तियां होने वाली है जिनसे 780 मूकबधिरों के लिये आरक्षित रखी गई हैं।

इनकी वजह से ही अब मध्यप्रदेश में मूक बधिर भी अब लोकसेवा आयोग की परीक्षा देकर डिप्टी कलेक्टर बन सकते हैं। वह चाहते हैं कि मूक-बधिर बच्चे भी एक दिन कलेक्टर, मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री बनें।

 

तर्कसंगत का तर्क

हमारे देश में मूक-बधिरों का भी अच्छा मेन पॉवर है। इसका हम बेहतर ढंग से इस्तेमाल कर सकते हैं। युवाओं से मुझे काफी उम्मीदें हैं। उनमें बहु‍त धैर्य है जो पुराने लोगों में नहीं था। आज कई लोग मूक-बधिरों को रोजगार दे रहे हैं, इससे उनमें उम्मीदों का संचार हो रहा है।

 

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