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कश्मीर की IAS ‘पैडवुमन’ जिनके कारण लड़कियों की मुश्किलें हुई आसान

तर्कसंगत

September 20, 2019

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मासिक धर्म यानि की पीरियड्स को लेकर भारत के छोटे छोटे गांव व कोनों में कई तरह की धारणाएं बनी हुई हैं, जिन्हें काफी जागरुकता के बाद तोड़ा जा रहा हैं। इन धारणाओं को तोड़ने के लिए महिलाएं ही नहीं  पुरुष भी आगे रहे है, लेकिन जब एक महिला दूसरे महिला को इस समस्या के बारे में समझाती है तो वह जल्दी समझ जाती हैं। 33 साल की डिप्टी कमिश्नर सैयद सेहरिश असगर, जो कि इस समय जम्मू कश्मीर में पोस्ट हैं। यह वहां पर मासिक धर्म के दौरान स्कूल न जा पा रही लड़कियों को स्कूल जाने के लिए जागरुक कर रही हैं।  सोशल मीडिया में काफी एक्टिव रहने वाली डॉक्टर सैयद सहरीश असगर साल 2013 बैच की आईएएस अधिकारी हैं।

 

पीरियड्स में स्कूल की छुट्टी

बुखार या अन्य बीमारी होने पर बच्चे स्कूल से एक या दो दिन की छुट्टी लेते हैं लेकिन मासिक धर्म यानि की पीरियड्स आने पर हर लड़की पांच से छह दिन तक की स्कूल से छुट्टी लेती हैं। यह माहौल जम्मू कश्मीर के वडगाम जिले के 1200 स्कूलों में देखा जा सकता हैं। वहां की 13 साल की एक छात्रा ने बताया कि रजवान के गर्ल्स मिडिल स्कूल में लड़कियां मासिक धर्म के दौरान एक हफ्ते की खेल व पढ़ाई से छुट्टी लेती हैं। आईएस अफसर का मानना है कि, देश में वैसे तो लड़कियों के पीरियड्स को लेकर कई तरह से लोगों को जागरूक किया जाता है। लेकिन इसके बावजूद कुछ क्षेत्र ऐसे हैं जहां मासिक धर्म अब भी एक विषय बना हुआ है जिसपर बात करना वर्जित है। या लोगों की मानसिकता की वजह से लड़कियां अपनी इस परेशानी को किसी से कह नहीं पाती।

 

सैयद सेहरिश असगर

 

 

नहीं मिलता है फंड

2013 के बैच से आईएएस क्लियर करने वाली डी सी सैयद ने बताया कि सरकार की ओर से इस काम के लिए किसी भी तरह का अलग बजट नहीं आता है। वह ग्रामीण विकास विभाग और एयरपोर्ट ऑथोरिटी ऑफ इंडिया से कार्पोरेट सोशल रिस्पांसिबिलिटी अंशदान से स्कूल व कॉलेज में नैपकिन की व्यवस्था करवा रही हैं। अब तक जिले केे 106 स्कूलो व 5 डिग्री कॉलेज व एख आईटीआई में ये नैपकीन मशीनें लग चुकी हैं। अब तक, मासिक धर्म स्वास्थ्य के लिए राज्य या केंद्र सरकार द्वारा कोई बजट आवंटित नहीं किया गया है। राज्य के ग्रामीण विकास के लिए आवंटित फंड्स के चलते, असगर अपनी पहल के लिए सभी खर्चों को मैनेज करने में सक्षम हो पाई हैं। इसके अलावा भारतीय हवाई अड्डा प्राधिकरण (एएआई) के कॉर्पोरेट सामाजिक दायित्व (सीएसआर) कार्यक्रम से सहायता के माध्यम से आगे की आवश्यकताओं को पूरा किया जाता है।

 

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जिले में लगाए इंसीनेटर और सैनिटरी नैपकिन डिस्पेंसर

घाटी की इस आईएस अफसर ने लड़कियों की परेशानियों को समझते हुए लोगों की सोच बदलने का जो फैसला लिया है वो वाकई काबिले तारीफ है। वो बताती हैं कि, जिस जिले में वो तैनात हैं वहां कई सारी सुविधाओं की कमी है, जिस कारण कई लड़कियों ने स्कूल छोड़ दिया। लेकिन इस बारे में जब उन्हें खबर मिली तो उन्होंने फौरन जिले के सारे हायर सेकेंडरी गर्ल्स स्कूलों और कॉलेजों के परिसर में इंसीनेटर और सैनिटरी नैपकिन डिस्पेंसर लगाने के आदेश जारी किए। स्कूलों, कॉलेजों के साथ-साथ इंसीनेटर और सैनिटरी नैपकिन डिस्पेंसर को श्रीनगर अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर रखा जाएगा। ये एयरपोर्ट जिले के अंतर्गत ही आता है।

द इंडियन एक्सप्रेस से बातचीत में उन्होंने कहा, “सभी इंसीनेटर और सैनिटरी नैपकिन डिस्पेंसर 106 उच्चतर माध्यमिक विद्यालयों, पांच-डिग्री कॉलेजों और जिले के एक आईटीआई में रखे जाएंगे। इसके अलावा, सैनिटरी नैपकिन डिस्पेंसर को डीसी के कार्यालय के साथ-साथ श्रीनगर अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर भी रखा जाएगा जो जिले में ही पड़ता है।”

 

मिलिए, कश्मीर की IAS 'पैडवुमन' से, जिन्होंने की लड़कियों की मुश्किलें आसान

 

उनकी पहल का असर

स्कूल व कॉलेज में नैपकिन मशीन लगने के बाद अब 20 प्रतिशत लड़कियां नही आ रही हैं। वहां की महिलाओं व लड़कियों के मन में पीरियड्स को लेकर जो डर है वह उसे खत्म कर उसके बारे में जागरुक कर रही है। जिससे वह आपनी रोजमर्रा की जिदंगी को आसानी से व्यतीत कर सकें।

समाज से लड़कियों के मासिक धर्म के प्रति गलत सोच रखने वाले लोगों के लिए इस तरह के आईएस अफसर की जरूरत हैं। जो मासिक धर्म को कोई बीमारी नहीं बल्कि एक साधारण बात मानती हैं।

कश्मीर में धारा 370 हटने और राज्य के विभाजन के बाद अब उनका काम क्राइसिस मैनेजमेंट का हो गया है। उनकी नई जिम्मेदारी कश्मीर घाटी में अपने प्रियजनों से हजारों किलोमीटर दूर बैठे लोगों की उनसे फोन पर बात कराने या उन्हें डॉक्टरों से मिलवाने की है। सैयद सहरीश असगर की नियुक्ति जम्मू-कश्मीर प्रशासन में सूचना निदेशक के पद पर है।

 

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