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ऑटो राजा : शैतान से संत बने एक ऑटो ड्राइवर की कहानी

तर्कसंगत

September 26, 2019

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दुनिया भर में लाखों लोग गरीबी में अपना जीवन जीते हैं। ये उनकी ज़िन्दगी का सबसे बुरा समय होता है। इन्हीं में से कई लोग इन वंचितों की मदद करने की आवश्यकता महसूस करते हैं, और इस सोच के पीछे काम भी करते हैं। टी राजा ऑटो राजा एक ऐसे ही व्यक्ति है जिन्होनें वंचितों के लिए अपना जीवन समर्पित कर दिया है। यह एक कहानी है एक पापी जो संत में बदल गया। तर्कसंगत  ने टी राजा ऑटो राजा के साथ बातचीत की जो एक ऑटो चालक के साथ साथ  न्यू आर्क मिशन ऑफ इंडिया के सह-संस्थापक हैं।

प्रस्तुत हैं साक्षात्कार के अंश।

 

कृपया हमें अपने बचपन के बारे में बताएं।

मेरे पिता टेलीफोन लाइनमैन थे। मुझे कभी नहीं पता था कि माता-पिता का प्यार क्या है। मैं बुरी आदतों जैसे कि चोरी करना, शराब पीना और जुआ खेलना आदि के चक्कर में बहुत कम उम्र में ही पड़ गया। मैं अपने घर से भाग कर चेन्नई आ गया जहाँ मैं दो साल तक सड़कों पर रहा। मेरे जीवन में सब कुछ व्यर्थ था। मैं छात्रों के पैसे चुराया करता और फिर एक दिन मुझे स्कूल से निकाल दिया गया। इधर उधर फ़िज़ूल में घूमना, चोरी करना ही मेरा काम था। इसके बाद मैंने अपनी बुनियादी जरूरतों को पूरा करने के लिए काम करने का फैसला किया। मैंने ऑटो-रिक्शा चलाना शुरू किया और बॉडीगार्ड के रूप में भी काम किया।

 

 

इस बदलाव की प्रेरणा क्या थी?

मुझे एक जेल में ले जाया गया और लगभग बीस दिन मैंने उस गन्दी जगह में बिताया था। यह मेरे लिए सबसे असहाय समय था। मैंने उसी वक़्त भगवान के साथ एक सौदा किया और सोचा कि अगर मैं जेल से बाहर निकला, तो, बदले में, मैं एक ईमानदार आदमी का जीवन जीऊंगा। यह मेरे जीवन का महत्वपूर्ण मोड़ था, और मुझे नहीं पता कि मेरी प्रार्थना ऊपर वाले ने सुनी या नहीं, लेकिन मेरा बुखार कम हुआ और मेरे माता-पिता मुझे घर ले गए। मैंने अपनी बात रखी और शादी की, माता-पिता से कुछ पैसे उधार लिए और बेंगलुरु में एक ऑटो-रिक्शा चलाने लगा।

शहर के चारों ओर घूमते हुए, मैंने सड़क पर लोगों को देखा, बहुत से बेसहारा सर्द सर्दियों में बिना कपड़ों के अपने दिन बिता रहे थे। मुझे ये सब देख कर दुःख होता। मैंने खुद को असहाय महसूस किया मगर इसके लिए 1997 में न्यू आर्क मिशन बनाने का फैसला किया। मैंने एक दिन एक आदमी को अपने घर लाने का फैसला किया जिसे मैंने सड़क पर देखा था। मैंने उसे नहलाया और उसके घावों को साफ किया। मेरे प्रयासों में किसी ने भी मेरा साथ नहीं दिया। मेरे पड़ोसी मुझे इन लोगों को लाने पर अपमानित किया करते थे। लेकिन इससे मुझे कोई फर्क नहीं पड़ा। इसके बाद मैंने अपना घर बेसहारा लोगों के लिए खोल दिया। मैंने तेरह लोगों के साथ बेंगलुरु के कवलबीरसांद्रा में एक शुरुआत की, जिन्होंने मुझे ऑटो राजा कहना शुरू कर दिया। मेरी पत्नी और बच्चे इन लोगों का ध्यान रखते जब मैं घर से दूर होता। पैसे की कमी होने के बावजूद मैं इन लोगों को जाने नहीं दे सकता था क्योंकि उनका मेरे अलावा कोई नहीं था।

 

 

आपने अपनी आर्थिक स्थिति को कैसे संभाला ?

मेरे पास एक ऑटो-रिक्शा है और उसी की कमाई मैं इन पर खर्च करता। मेरी पत्नी, बच्चे और मैं उनके साथ एक ही घर में रहते हैं। समय के साथ, कई लोग आए और मदद की पेशकश की। कई लोगों ने इन मज़बूर लोगों को खिलाने के लिए पैसे दान किए और कुछ ने उनकी चिकित्सा देखभाल की व्यवस्था की। हम एक बड़े खुशहाल परिवार की तरह रहते हैं।


ऐसे लोगों के बारे में अब आपको कैसे पता चलेगा?

जब मैं ऑटो चला रहा होता हूं, तो मैं ऐसे लोगों को देखता हूँ जिन्हें मदद चाहिए होती है और मैं उन्हें अपनी जगह पर लाता हूँ। कई बार पुलिस मुझे उनके बारे में बताती है और मैं उन्हें यहां ले आता हूँ। यहाँ हर उम्र के लोग है और वो सब मुझे डैडी कहते है! यह मुझे वास्तव में खुश करता है।

 

 

आपने पिछले 22 वर्षों में अपने संगठन में क्या प्रगति देखी है?

हालात अब बेहतर हुए हैं। अब हमारे पास एक डॉक्टर है जो लोगों से मिलने और जांच करने के लिए स्वेच्छा से आता है। हमने बेघर लोगों को सड़कों से उठाने के लिए एक एम्बुलेंस का प्रबंधन भी किया है। इसके अलावा, हम पुलिस के साथ मिलकर काम करते हैं जो हमें पहचानने और हमें बेसहारा लाने में मदद करती है।


कोई सन्देश जो आप हमारे पाठकों को देना चाहें ?

जी हाँ, मैं सभी को बताना चाहता हूँ कि भले ही मदर टेरेसा का जन्म यूगोस्लाविया में हुआ था, लेकिन उन्होंने हमारे देश में आकर निराश्रितों की सेवा की और उनकी भी यहाँ मृत्यु प्राप्त हुई। फिर हम लोग अपने देश में एक दूसरे की सेवा क्यों नहीं कर सकते? आइए उनके नक्शेकदम पर चलें और दूसरों की मदद करें।


टी राजा ऑटो राजा को “एनडीटीवी मैन ऑफ द ईयर” और “सीएनएन-आईबीएन रियल हीरोज” पुरस्कार से सम्मानित किया गया है।

 

तर्कसंगत का तर्क

आज जहाँ हम खुद के अलावे किसी और की नहीं सोचते, हर कोई अपने ही काम में व्यस्त है। अगर कुछ करना भी चाहता हो तो अपने जेब को देख मायूस हो जाता हो, वैसे समय में ऑटो राजा की कहानी यही सीख देती है कि अगर आपकी सोच सही है तो अच्छे काम के लिए आपको अच्छे साधन मिल ही जायेंगे। लोग आपकी मदद को आगे आते ही जेनेगे जैसे इनकी मदद को आगे आये।

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