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जलियाँवाला बाग़ की ज़मीन को 5.5 लाख में खरीद चुका है ये परिवार, सालों से कर रहा है इसकी देखभाल

तर्कसंगत

Image Credits: Manorama Online/Jiyo Bangla

September 27, 2019

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अमृतसर के जलियांवाला बाग में प्रवेश करते ही आप मानो उस अभागे दिन में लौट जाते हैं जब आजादी के दीवानों पर अंधाधुंध गोलीबारी हुई थी. सैकड़ों लोग शहीद हो गए. आप जब घूमते हुए उन जगहों को देख रहे होते हैं जहां पर अब गोलियों के निशान नजर आते हैं, तब आपको एक शख्स दाएं-बाएं घूमता हुआ नजर आता है. इसका नाम है सुकुमार मुखर्जी. सुकुमार जलियांवाला बाग की व्यवस्था देखते हैं. उनके परिवार की तीन पीढियां जलियांवाला बाग मेमोरियल ट्रस्ट का मैनेजमेंट देख रही हैं. मूल रूप से बंगाल के हावड़ा का रहने वाला मुखर्जी परिवार सुबह-शाम इसकी व्यवस्था को देख रहा होता हैं.

अमृतसर के जलियाँवाला बाग़ में भी करीब 5000 भारतीय, रोलाक्ट एक्ट के विरोध में प्रदर्शन कर रहे थे. इस बाग़ में ब्रिगेडियर जनरल आर.ई.एच डायर ने अपने सैनिकों के साथ प्रवेश किया और अपने सैनिकों को अँधा-धुंध गोलियां चलाने का आदेश दे दिया. गोलियों के लगभग 1650 राउंड चलाये गए, जिनमें 1500 से ऊपर निर्दोष, औरतों, बच्चों, बूढों और जवानों की मृत्यु हो गयी और कई घायल हो गए.

उस दिन, जलियाँवला बाग में उन 5,000 लोगों के बीच, डॉ. शष्टि चरण मुखर्जी भी थे, जो मूल रूप से पश्चिम बंगाल के हुगली के रहने वाले एक डॉक्टर थे. पर इंडियन नेशनल कांग्रेस के अध्यक्ष, मदन मोहन मालवीय के साथ काम करने के लिए वे अलाहबाद आकर बस गए थे.1919 में मालवीय ने डॉ. मुखर्जी को अमृतसर में पार्टी के एक सत्र के लिए एक अच्छी जगह ढूँढने के लिए कहा. डॉ. मुखर्जी को इस बात की ज़रा भी भनक नहीं थी, कि यही काम उन्हें 1500 मासूमों की ह्त्या का चश्मदीद गवाह बना देगा.

इस नरसंहार के बाद उन्होनें इन्डियन नेशनल कांग्रेस को पत्र लिखकर कहा कि उन्हें जलियांवाला बाग़ की ज़मीन खरीदने की पेशकश की क्यूंकि घटना के सबूत हमेशा के लिए मिटा देने के इरादे से अंग्रेज़, जलियांवाला बाग़ की ज़मीन को एक कपड़ा-बाज़ार में तब्दील कर देना चाहते थे. साल 1920 में यह पेटीशन पारित हो गया और ज़मीन की कीमत 5.65 लाख रूपये रखी गयी. अब केवल पैसे का इंतज़ाम करना था सो उन्होनें गाँधी जी के साथ मिलकर किया. जब ज़मीन की नीलामी हुई तब उन्होनें यह ज़मीन जीत ली.

तब से लेकर आजतक उनका परिवार इस ज़मीन की देखभाल कर रहा है. पहले उनके बेटे उत्तम चरण मुख़र्जी को 1962 में डॉ. मुख़र्जी की मृत्यु के बाद इसकी देखभाल का ज़िम्मा दिया गया और अब उनके पोते सुकुमार मुख़र्जी इस बाग़ की देखभाल कर रहे हैं.

हालांकि मुखर्जी को इस बात का गुस्सा है कि कैमरन जलियांवाला स्मारक पर आने वाले पहले ब्रिटिश प्रधानमंत्री थे, लेकिन उन्होंने इस त्रासदी के लिए किसी तरह की माफी नहीं मांगी.

सुकुमार मखर्जी धारा प्रवाह पंजाबी बोलते हैं. सुकुमार जलियांवाला बाग के चप्पे-चप्पे या कहें कि यहां के हर पत्थर के इतिहास से वाकिफ हैं. वे रोज इधर आने वाले देश-विदेश के पर्यटकों को इधर जो कुछ 13 अप्रैल, 1919 में घटा उसकी जानकारी देते हैं. सामान्य सी पैंट-कमीज पहने सुकुमर यहां आने वाली भीड़ में बीच-बीच में गुम भी हो जाते हैं. वे उन पर्यटकों को कस भी देते हैं, जो जलियांबाग की दिवारों या किसी अन्य जगह को खराब करने की कोशिश करते हैं.

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