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पाँच सितारा होटल की आरामदायक नौकरी छोड़ मंगेश बन गए ‘मंगरु पैडमैन’

तर्कसंगत

Image Credits: Facebook/Mangesh Jha

September 30, 2019

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बिहार के मधुबनी अंचल में स्थित खटौना गांव से ताल्लुक रखने वाले मंगेश झा को आज बहुत से लोग ‘मंगरु पैडमैन’ के नाम से भी जानते हैं। मंगेश वो शख्स हैं जो झारखंड के आदिवासी गांवों और कस्बों में जाकर औरतों व अन्य लोगों को माहवारी के प्रति जागरूक कर रहे हैं। एक संपन्न परिवार से संबंध रखने वाले मंगेश ने इंस्टिट्यूट ऑफ़ होटल मैनेजमेंट, भुवनेश्वर से होटल मैनेजमेंट की पढ़ाई कर, अपने करियर की शुरुआत ओबरॉय होटल, कोलकाता से की।

लेकिन मंगेश का लक्ष्य कुछ और ही था। इसीलिए तो मंगेश कोलकाता के बाद पुणे में भी एक अच्छे होटल की नौकरी छोड़ आये. वैसे तो वे सरकारी नौकरी की तैयारी करना चाह रहे थे, लेकिन अपने पिताजी के कहने पर उन्होंने रांची के रेडिसन ब्लू होटल में नौकरी कर ली।

 

बच्चों में शिक्षा अलख जगायी

धीरे-धीरे मंगेश झारखंड के आदिवासी इलाकों में रहने वाले लोगों की स्थिति जानने लगे और फिर उन्होंने इन लोगों की स्थिति में बदलाव लाने की ठानी। और फिर उन्होंने कभी पिछे मुड़कर नहीं देखा. वे खुद सोलर-लाइट में बच्चों को पढ़ाने लगे. चार बच्चों से शिक्षा की अलख जगाने की मुहिम आज 13 गांव को मिलाकर 500 तक पहुंच गयी है। मंगेश को जब भी काम से दो दिन की छुट्टी मिलती तो वे अपने शहर और प्रदेश को थोड़ा और अधिक जानने की चाह में निकल पड़ते। पर जैसे-जैसे वे गांवों और आदिवासी इलाकों में जाने लगे तो वहां की सच्चाई से उनका सामना हुआ। लोग कैसे अपना जीवन यापन कर रहें हैं, न कोई शिक्षा का आधार और न ही को रोजगार। मंगेश के सामने जो झारखंड था और इंटरनेट पर जो झारखंड है, उन दोनों में जमीन-आसमान का अंतर था। इसलिए उन्होंने इन लोगों की स्थिति में बदलाव लाने की ठानी। पर किसी भी समुदाय में बदलाव लाने के लिए ज़रूरी है उस समुदाय के लोगों का हिस्सा बनना। मंगेश इन गांवों में लोगों के साथ वक़्त बिताने लगे।

 

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रोज़गार में साथ

उन्होनें देखा कि रोज़गार न होने के कारण यहां सेक्स-रैकेट की समस्या पैदा हो गयी थी। जिसे खत्म करने के लिए इन लोगों को रोज़गार क्षेत्रों से जोड़ने की मुहिम चलाई गयी। उन्होंने अपने एक मित्र, जो ‘सक्षम रेडी टू वर्क’ के ऑपरेशन हेड है, से बात की। इसके सहयोग से उन्होंने गांवों के लोगों को मेडिका रांची व मेडिका सिलीगुड़ी में हाउसकीपिंग विभाग में सम्मानजनक रोज़गार दिलाया।

 

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मां बनी मार्गदर्शक

ऐसे ही धीरे-धीरे समाज सेवा करते करते उन्हें पता चला कि आज भी कई गांव की औरतें माहवारी के दिनों में पेड़ के पत्ते, राख, कपड़ा आदि इस्तेमाल करती हैं। जिस कपड़े का इस्तेमाल वे करती है, उसे बिना अच्छे से धोये और सुखाये वो लगातार प्रयोग करती हैं। मंगेश के सामने जब यह सब आया तो उन्हें समझ नहीं आया कि वो कैसे इस समस्या का समाधान ढूंढें. ऐसे में मंगेश की मां उनकी मार्गदर्शक बनीं।

मंगेश की माँ ने उन्हें सुझाव दिया कि केवल सैनिटरी पैड बांटने से इस समस्या का हल नहीं होगा क्योंकि हमारे देश में माहवारी से जुड़े मिथकों को कोई भी समस्या समझता ही नहीं है। इसलिए सबसे पहले जागरूकता जरूरी है कि आखिर क्यों औरतों व लड़कियों को माहवारी के दौरान सैनिटरी पैड ही इस्तेमाल करने चाहियें।

 

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मंगेश के अभियान से आज उनकी माँ और बहन भी जुड़ गयी हैं। उनकी माँ और बहन उन्हें घर पर पैड बनाकर देती हैं और वे उन्हें जगह-जगह वितरित करते हैं। अब उनके साथ विभिन्न गांवों से स्वयं-सेविकाएं भी जुड़ गयीं हैं और वे भी इसमें मदद करती हैं।  जल्द ही विभिन्न गांवों में पैड बनाने की यूनिट खोलने की योजना पर मंगेश काम कर रहे हैं ताकि बीहड़ ग्रामीण इलाके की महिलाओं और लड़कियों को कम कीमत पर आसानी से पैड उपलब्ध हो सके।

 

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उन्होंने प्लास्टिक पर पाबंदी के लिए लोगों को जागरूक किया। इलाके में प्लास्टिक के इस्तेमाल पर स्थानीय लोगों में रोक लगाने की अपील की। इसके बाद प्लास्टिक की जगह दोना पत्ते ने ले ली। और जल्द ही इस पत्ते का उपयोग तेज़ी से बढ़ा। मांग में तेज़ी आने के बाद महिलाओं को दोना बनाने का काम मिलने लगा।

इसके अलावा लोगों के बीच नशे के प्रति भी जागरूकता अभियान चलाया गया। आज लोग अपने स्वास्थ्य के प्रति जागरूक हुए हैं। भारत में आदर्श गांवों को स्थापित करने के लिए मंगेश का संघर्ष जारी है। जिसके लिए उन्हें सरकार के साथ-साथ आम लोगों के सहयोग की भी जरूरत है।

 

 

‘मंगरु पैडमैन’ असल ज़िन्दगी के वो हीरो हैं जो बिना किसी ख्याति के, पर शान से अपना काम कर रहें हैं। गर्व की बात है कि हमारे देश में मंगेश जैसे युवा भी हैं जो अपने ज्ञान और अनुभव को देश के सशक्तिकरण के लिए इस्तेमाल कर रहें हैं।

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