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मिलिए दिल्ली की पहली महिला पोस्टमैन से

तर्कसंगत

September 30, 2019

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घर के काम के साथ बाहर का काम भी संभालना हर किसी के बस का नहीं होता। दिल्ली की इंद्रावती इस काम को बखूबी निभा चुकी हैं, सुबह घर का सारा काम निपटाकर इंद्रावती दफ्तर पहुंचतीं और वहां से चिट्ठियों का झोला उठाकर पैदल ही निकल पड़ती थीं उन्हें सही पते तक पहुंचाने।

इंद्रावती दिल्ली की पहली महिला डाकिया हैं, जो 1982 से डाकिया का काम पूरी लगन और ईमानदारी से कर चुकी हैं और अब रिटायर हो चुकी हैं। बहुत-से और रोजगार क्षेत्रों के जैसे ही डाकिया का यह काम भी पुरुष प्रधान है। पर देश की राजधानी दिल्ली की पहली महिला डाकिया इंद्रावती ने इस तथ्य को बदल दिया।

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अपने बारे में न्यूज़ 18 से बात करते जुए वो कहती है कि इस काम से प्यार मुझे शुरू से नहीं था। मैंने तो कभी डाकिया बनने के बारे में सोचा भी नहीं था। मेरा तो बाल विवाह हो गया था। पढ़ाई भी मैंने रोहतक, मेरे ससुराल में जाकर पूरी की। मेरे ससुर ने ही कहा कि गांव वालों को लगता है तुम आगे पढ़ाई कर सकती हो इसलिए 10वीं की परीक्षा तो दे दो। परीक्षा पूरी करने के बाद मैंने सरकारी नौकरी के लिए फॉर्म भर दिया। मेरे जीजाजी ने ही भरा था, मुझे तो पता भी नहीं था कि मैं पोस्टमैनी का फॉर्म भर रही हूँ। जब परीक्षा देने बैठी तब पता लगा कि ये तो क्लर्क का नहीं, डाकिये का काम है। टेस्ट तो अच्छे से दे दिया लेकिन घर आकर बहुत रोई, रोई कि मैं ये डाकिये का काम नहीं करूंगी। ससुराल वालों ने समझाया डाकिए का काम लड़कियों से नहीं करवाते। तुझे दफ्तर का ही कुछ काम देंगे। लेकिन हो कुछ और ही गया।

मैंने उस परीक्षा में टॉप किया और मुझे डाकिये का ही काम दिया गया। मैं क्या बताऊं मेरा हाल कितना बुरा था। दिल्ली के गोल डाकखाने में मेरी पोस्टिंग हुई। शुरू शुरू में बस रोती ही रहती थी। लगता था कैसे कर पाऊंगी. शर्म आती थी, लोग क्या कहेंगे, देखो लड़की डाकिये का काम कर रही है। पहले चिट्ठी छंटाई का काम मिला, कुछ पल्ले ही नहीं पड़ता था। फिर दो तीन दिन की ट्रेनिंग में समझाया गया कि काम कैसे करना है। फिर डाक बांटने के काम पर भी निकली। पहले पहल लोग ऐसे देखते जैसे बारात देखते हैं। लेडी डाक बांट रही है, छोटी सी गुड़िया आ रही है, देखो कितना भारी बैग उठा रखा है। लेकिन वक्त के साथ इस नौकरी से मेरी दोस्ती होती चली गई। पता भी नहीं चला कि कब मुझे इस काम में मज़ा आने लगा। अब तो मैं शान से कहती हूँ कि हां मैंने यह नौकरी की है।

 

हालांकि, बाद में काफी कुछ बदल गया। इंद्रावती ने बताया कि कुछ समय में लोग उन्हें जानने लगे। उनके इसी काम की तारीफ होने लगी। बल्कि उनकी नियुक्ति के 7-8 साल बाद एक और महिला डाकिया आईं और धीरे-धीरे संख्या बढ़ने लगी।

शुरू-शुरू में जब इंद्रावती चिट्ठी देने जाती, तो कोई यकीन ही नहीं करता कि वे डाकिया हैं और उन्हें अपना कार्ड दिखाना पड़ता। वे कहती हैं कि कई बार आस-पास के लोग उन्हें रूककर देखने लगते थे।

दो बच्चों की माँ और चार बच्चों की दादी, इंद्रावती ने सुनिश्चित किया कि शादी के बाद भी उनकी बहु की पढाई जारी रहे और उन्होंने उसकी पढ़ाई पूरी करवाई।

 

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उन्होंने बताया कि उन्होंने पोस्ट ऑफिस में लगभग सभी विभागों में काम किया है तो उन्हें सभी कार्यों के बारे में अच्छे से पता है।

उनका कहना है वैसे भी डाकिया तो घर का सदस्य जैसे होता है। उनका अपनी ड्यूटी एरिया में लोगों से इतनी अच्छी बातचीत और मेलजोल था कि आज भी सब उन्हें याद करते हैं। वो लोगों को चिट्ठियां पढ़कर सुनाती। बुरी ख़बर होती तो पढ़कर नहीं सुनाती थी, बस यूं ही संकेत में बोल देती थी। अच्छी ख़बर जैसे पास होने की, बेटा हो गया, मिलिट्री की ख़बर, रिश्तेदारी की ख़बर पढ़कर सुनाती थी। लोग उनका इंतज़ार करते थे, ‘इंदिरा आंटी’ आएंगी और चिट्ठी पढ़कर सुनाएंगी। वो उन परिवारों के लिए सिर्फ डाकिया नहीं थी, उसे कहीं बढ़कर थी और अब भी हैं।

हाल ही में जब वे रिटायर हुईं तो उनके दफ्तर व घर में कार्यक्रम रखा गया, जहां उनसे वे लोग भी मिलने आये जिनके घर वे रेगुलर चिट्ठियां पहुंचाती थीं।

इंद्रावती कहती हैं, “शायद अब वक़्त है कि हमें पोस्ट ‘मैन’ की जगह पोस्ट’पर्सन’ शब्द का इस्तेमाल शुरू कर देना चाहिए। ताकि यहां भी लैंगिक समानता को बढ़ावा मिले।”

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