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एनसीआरटी : प्री-स्कूल में बच्चों की लिखित या मौखिक परीक्षा नहीं होनी चाहिए

तर्कसंगत

Image Credits: India Today/Telangana Today

October 16, 2019

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राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद (NCERT) ने कहा है कि प्री स्कूल में किसी भी बच्चे की कोई लिखित या मौखिक परीक्षा नहीं होनी चाहिए. एनसीईआरटी ने इस प्रकार की परीक्षाओं को हानिकारक एवं अवांछनीय प्रक्रिया करार देते हुए कहा कि इससे अभिभावकों में अपने बच्चे के लिए जो आकांक्षाएं पैदा होती है, वे सही नहीं होती.

परिषद ने कहा कि प्री-स्कूल के छात्रों के आकलन का मकसद उन पर ‘पास’ या ‘फेल’ का ठप्पा लगाना नहीं है. एनसीईआरटी के एक अधिकारी ने कहा, ‘किसी भी हाल में बच्चों की मौखिक या लिखित परीक्षा नहीं ली जानी चाहिए. इस चरण पर आकलन का मकसद बच्चे पर ‘पास’ या ‘फेल’ का ठप्पा लगाना नहीं है.’

 

क्या हैं दिशानिर्देश

एनसीईआरटी ने जो दिशानिर्देश तैयार किए हैं, उनमें मूल्यांकन के कई तरीकों का जिक्र किया गया है. इनमें से कुछ निम्नलिखित हैं –

 

  • हर बच्चे के मूल्यांकन के लिए अलग चेकलिस्ट, पोर्टफोलियो और दूसरे बच्चों के साथ उनके संवाद व घुलने-मिलने के तरीकों को आधार बनाया जाना चाहिए.

 

  • शिक्षकों को बच्चों की गतिविधियां परख कर उनके अलग-अलग नोट्स बनाने चाहिए. कैसे कोई बच्चा समय व्यतीत कर रहा है, भाषा का किस तरह उपयोग कर रहा है, उसके स्वास्थ्य और पोषण की आदतें क्या हैं व अन्य बातों को परखा जाना चाहिए.

 

  • हर बच्चे का एक फोल्डर बनाया जाए, जिसमें उसकी पूरी जानकारी हो। वह फोल्डर बच्चे के अभिभावकों को भी दिखाया जाए.

 

मानव संसाधन विकास मंत्रालय के तहत एनसीईआरटी पाठ्यक्रम बनाने, विकसित करने व इनमें बदलाव करने का कार्य करता है. इस परिषद ने कहा है कि प्री स्कूल के दौरान होने वाले मूल्यांकन से किसी बच्चे पर पास या फेल का टैग नहीं लगाया जाना चाहिए.

एनसीईआरटी के एक अधिकारी ने कहा कि ‘अभी हमारे देश में प्री-स्कूल की व्यवस्था इस तरह बनी हुई है कि छोटी उम्र से ही बच्चों पर सीखने के औपचारिक तरीके थोप दिए जाते हैं. उन्हें अंग्रेजी सीखने, होमवर्क और टेस्ट देने का तनाव रहता है. ये सही नहीं है.’

अधिकारी ने कहा, ‘‘इस समय हमारे देश प्री-स्कूल कार्यक्रम बच्चों को बोझिल दिनचर्या में बांध देते हैं. ऐसे भी कार्यक्रम है जहां विशेषकर अंग्रेजी को ध्यान में रखते हुए बच्चों को संरचित औपचारिक शिक्षा दी जाती है, उन्हें परीक्षा देने या गृहकार्य करने को कहा जाता है और उनसे खेलने का अधिकार छीन लिया जाता है. इस अवांछनीय एवं हानिकारक प्रक्रिया से अभिभावकों में अपने बच्चों को लेकर जो आकांक्षाएं पैदा होती हैं, वे सही नहीं हैं.”

 

 

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