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12वीं फेल हुए, टेम्पो चलाया, सड़क पर सोये, मगर फिर भी IPS बन गए मनोज शर्मा

तर्कसंगत

Image Credits: Rewa Riyasat

October 22, 2019

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’12th फेल, हारा वही जो लड़ा नहीं ‘ शीर्षक से लिखी ये किताब ज़रूर पढ़िए, इस किताब के लेखक इस किताब के नायक मनोज शर्मा के मित्र हैं. अनुराग पाठक ने ये किताब अपने साथी मनोज शर्मा के ऊपर लिखी है. इसमें संघर्ष से भरी ऐसी दिलचस्प कहानियां आपको पढ़ने को मिलेंगी, जिसके बारे में शायद कल्पना करना भी मुश्किल है. कई बार  तो पढ़ते पढ़ते लगेगा कि ये तो मेरी ही कहानी है.

मनोज की कहानी से आप जानेंगे, हम एक बार कुछ ठान लें तो उसे कर पाने का हर नामुमकिन रास्ता भी पार कर जाते हैं. मनोज 2005 बैच के महाराष्ट्र कैडर से IPS ऑफिसर हैं. मनोज की कहानी से आप जानेंगे, हम एक बार कुछ ठान लें तो उसे कर पाने का हर नामुमकिन रास्ता भी पार कर जाते हैं. मनोज 2005 बैच के महाराष्ट्र कैडर से IPS ऑफिसर हैं.

 

12वीं में नहीं कर पाए नकल

मनोज शर्मा 2005 बैच के महाराष्ट्र कैडर के अफ़सर हैं. अभी वह मुंबई में एडिशनल कमिश्नर ऑफ़ वेस्ट रीज़न के पद पर तैनात हैं. उनका जन्म अविभाजित मध्यप्रदेश के मुरैना में हुआ था. नौवीं, दसवीं, और ग्यारहवीं में तीसरे स्थान पर रहे। उन्होंने बताया कि इसके लिए उन्होंने नकल का सहारा लिया. आदतन 12वीं की परीक्षा में भी यही करने की तैयारी थी मगर एक वीडियो इंटरव्यू में उन्होंने बताया कि हम लोगों ने तय करके रखा था कि 12वीं में नकल से पास हो जाएंगे. हमें पता था कि कहां गाइड रखनी है, कहां पर्ची छुपानी है. सोचा था कि 12वीं पास करके टाइपिंग सीखकर कहीं न कहीं जॉब कर लेंगे. जहां से जीवनयापन चल सके. लेकिन इलाके के एसडीएम ने स्कूल को टारगेट करके नकल नहीं करने दी. तभी मुझे लगा कि इतना बड़ा आदमी कौन है जो इतना पावरफुल है कि इसकी सब मान रहे हैं. तब मुझे लगा कि अब तो इतना ही पावरफुल बनना है.

 

 

कलम के बाद टेम्पो की हैंडल आ गयी हाथ

12वीं में फेल होने के बाद मनोज अपने भाई के साथ टेंपो चलाते थे. एक दिन टेंपो पकड़ गया. एसडीएम से मिलकर टेंपो छुड़ाने की बात करनी थी. मनोज उनसे मिलने तो गए लेकिन टेंपो छुड़वाने की बात करने की बजाय ये पूछा, आपने तैयारी कैसे की. तय कर लिया, अब यही बनेंगे. तैयारी के लिए ग्वालियर आ गए मगर पैसे तो थे नहीं तो भिखारियों के साथ गुज़ारा किया. अपने के साक्षत्कार में मनोज कहते हैं, मैं घर से थैला लेकर ग्वालियर आ गया. पैसे नहीं थे, इसलिए भीखारियों के पास सोता था. खाने तक को कुछ नहीं था. किस्मत ने साथ दिया और लाइब्रेरियन कम चपरासी की नौकरी मिल गई. यहां मैंने गोर्की और अब्राहम लिंकन को पढ़ा. मुक्तिबोध को जाना और फ़िर तैयारी शुरू कर दी. कवियों या विद्वानों की सभाओं में बिस्तर बिछाने, पानी पिलाने का काम भी किया. तैयारी शुरू की. एसडीएम ही बनना था लेकिन तैयारी धीरे-धीरे उच्च लेवल की करने लगे. वो कहते हैं कि लेकिन 12वीं फेल का ठप्पा मेरा पीछे नहीं छोड़ता था. यहां तक कि जिस लड़की से प्यार करता था, उससे भी  दिल की बात नहीं कह पाता था क्योंकि लगता था कि कहीं वो कह न दे कि 12वीं फेल हो.

 

दिल्ली में लोगों के कुत्ते घुमाते थे

पहला प्यार कहीं छूट न जाये इसलिए फिर से पढ़ाई शुरू की. संघर्ष कर दिल्ली आए. पैसों की जरूरत थी. बड़े घरों में कुत्ते टहलाने का काम मिला. 400 रुपये प्रति कुत्ता खर्च मिलता था. विकास दिव्यकीर्ति नाम के शिक्षक ने बिना फीस एडमिशन दिया. पहले अटेंप्ट में प्री क्लीयर किया. लेकिन दूसरे, तीसरे अटेंप्ट तक प्यार में था. जिस लड़की से प्यार करते थे उससे कहा कि तुम हां करोऔर साथ दो तो दुनिया पलट सकता हूं. फिर चौथे अटेम्प्ट में  यूपीएससी की परीक्षा 121वीं रैंक के साथ पास कर आईपीएस बन गए.

 

 

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