सप्रेक

अपनी सपनों और परिवार की ज़रूरतों को पूरा करने की धुन में है ये लड़की

तर्कसंगत

October 24, 2019

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खुदी को कर बुलंद इतना कि हर तकदीर से पहले… खुदा बंदे से खुद पूछे बता तेरी रजा क्या है… आज हम आपको रू-ब-रू कराएंगे भरतपुर की ऐसी ही एक बेटी से जो अपनी मेहनत और दृढ़ संकल्प की मदद से अपने सपने साकार करने में लगी है. ये कहानी है लोहागढ़ यानि भरतपुर जिले की बेटी की जो अपनी मेहनत के बूते अपने परिवार की आजीविका तो चला ही रही है बल्कि पढ़ाई भी करती है और एक अच्छी शिक्षक बनकर शहर की बेटियों को भी शिक्षित करने का ख्वाब बुन रही है.

उसकी बड़ी बहन सुषमा उसके इस काम में सहयोग करती है। नीतू अपनी बहन के साथ 90 लीटर दूध लेकर रोज बाइक चलाती हैं। यह सब काम वह अपने सपने पूरे करने के लिए करती हैं। नीतू के घर की आर्थिक स्थिति काफी खराब थी। इसी वजह से उनकी बड़ी बहन को स्कूल छोड़ना पड़ा। जब पैसों का इंतजाम नहीं हुआ तो पिता बनवारी लाल शर्मा ने नीतू से भी कह दिया कि वह अब पढ़ाई के बारे में सोचना बंद कर दे। लेकिन नीतू ने एक रास्ता निकाला और दूध बेचना शुरू कर दिया। अब वह हर रोज 60 लीटर दूध गांव से शहर में बेचकर कर अपने परिवार का पालन पोषण तो कर ही रही हैं साथ में अपनी पढ़ाई का भी खर्च और वक्त निकाल ले लेती हैं।

नीतू शर्मा आज अपने गांव की लड़कियों के साथ ही देश की उन तमाम लोगों के लिए प्रेरणास्रोत हैं जो थोड़ी सी मुश्किल आने पर हिम्मत हार जाते हैं। हालांकि नीतू की दिनचर्या आसान नहीं है। उसे रोज सुबह 4 बजे उठना पड़ता है और उसके बाद वह गांव के तमाम किसान परिवारों के यहां से दूध इकट्ठा करती हैं। फिर उस दूध को दूध के कंटेनर में भरकर अपनी बाइक पर रखकर शहर में बांटने करने के लिए चल देती है। उनका घर भरतपुर जिला मुख्यालय से 5 किलोमीटर की दूरी पर पड़ता है। नीतू के परिवार में पांच बहनें और एक भाई है। उनकी दो बहनों की शादी हो चुकी है, लेकिन बाकी पूरे परिवार का पूरा भार अकेले नीतू उठाती हैं।

बीए सेकंड ईय़र की पढ़ाई कर रहीं नीतू हर रोज सुबह गांव से दूध लेकर शहर पहुंचती हैं। दस बजे तक दूध बांटने के बाद वह अपने एक रिश्तेदार के यहां जाती हैं। वहां फ्रेश होने और कपड़े बदलने के बाद फिर दो घंटे के लिए कंप्यूटर क्लास लिए जाती हैं। कंप्यूटर क्लास खत्म करने के बाद लगभग 12 बजे वह अपने गांव के लिए रवाना होती है जहां दोपहर और रात में अपनी पढ़ाई करती है। शाम को फिर वह इस काम को दोहराती हैं और शाम का दूध इकट्ठा कर फिर से वापस शहर आ जाती हैं। हालांकि शाम को वह सिर्फ 30 लीटर दूध ही ले जाती हैं।

 

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दरअसल नीतू के पिता मजदूर होने के साथ ही शरीर से मजबूर भी हैं। उनकी आंखों की रोशनी कमजोर हो गई है उसके बावजूद वह एक मिल में मजदूरी करते हैं। वहां से बहुत थोड़े पैसे उन्हें मिल जाते हैं। अभी ततक वह इसी चिंता में रहते थे कि उनकी बेटियों की शादी कैसे होगी, लेकिन उनकी एक बेटी ने उनकी ये चिंता भी दूर कर दी है। नीतू कहती है कि समाज में किसी भी लड़की का बाइक चलाना अच्छा नहीं समझा जाता है, लेकिन परिवार चलाने और अपने सपने पूरे करने के लिए वह समाज की परवाह नहीं कर सकती। वह कहती है कि जब तक उसकी दो बड़ी बहनों की शादी नहीं हो जाती और वह अध्यापक नहीं बन जाती तब तक वह दूध बेचने के काम करती रहेगी।

गांव में राधा की एक छोटी सी परचून की दुकान हैं जहां दसवीं में पढ़ने वाली उनकी छोटी बहन राधा बैठती है। नीतू ने कहा कि वह अपनी बहन को भी पढ़ा लिखाकर अच्छा इंसान बनाना चाहती है। नीतू की कहानी अखबार में छपने के बाद स्थानीय लोग उसकी मदद करने के लिए आगे आए हैं। खबर को प्रकाशित करने के बाद लूपिन संस्था के समाजसेवी सीताराम गुप्ता ने नीतू शर्मा और उसकी बहनों और पिता को बुलाकर लूपिन की ओर से 15,000 रुपये का चेक दिया और उसकी पढ़ाई के लिए एक कंप्यूटर और उनकी शादियों के खर्च और उनके पिता के लिए राज्य सरकार के द्वारा चलायी जा रही योजना को दिलाने का आश्वासन भी दिया। गांव में राधा की एक छोटी सी परचून की दुकान हैं जहां दसवीं में पढ़ने वाली उनकी छोटी बहन राधा बैठती है। नीतू ने कहा कि वह अपनी बहन को भी पढ़ा लिखाकर अच्छा इंसान बनाना चाहती है।

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