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[वीडियो] क्या सिनेमाघरों में राष्ट्रगान के समय खड़ा होना अनिवार्य है ?

तर्कसंगत

Image Credits: Youth Ki Awaaz

October 30, 2019

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सोशल मीडिया में कुछ दिनों से ऐसे वीडियो वायरल होते दीखते हैं जहाँ किसी मल्टीप्लेक्स सिनेमाघर में राष्ट्र गान के समय खड़ा नहीं होने पर, लोगों में हाथापाई की नौबत आ जाती है. इस विवाद में पड़ने से बेहतर ये है कि हम इस चीज़ को समझें कि मात्र सिनेमाघर में राष्ट्रगान के समय खड़ा होना हमारे देशभक्त होने का सबूत कैसे है? या सिनेमाघरों में राष्ट्रगान बजाना कानून है? आखिर क्या वजह है कि हमारे अंदर का देशभक्त ऐरकण्डीशनर मल्टीप्लेक्स में केवल किसी के राष्ट्रगान के समय खड़ा न होने पर हमारे खून में देशभक्ति की गर्मी ले आता है?

हाल ही में एक वीडियो वायरल हुआ है जो बेंगलुरु के एक सिनेमा हॉल में कुछ लोगों के समूह को दिखाया गया है, जो फिल्म की स्क्रीनिंग से पहले राष्ट्रगान बजने के दौरान बैठे रहने वाले लोगों पर चिल्लाते हुए दिख रहे हैं। उनमें से एक व्यक्ति यह कहता है  “देश के लिए 52 सेकंड भी नहीं बचे हैं, लेकिन आपके पास यहां बैठकर तीन घंटे की फिल्म देखने का दुस्साहस है? क्या आप पाकिस्तानी आतंकवादी हैं?”  “हमारे सैनिक हमारे लिए कश्मीर में लड़ रहे हैं और आप लोग यहां बैठे हैं और राष्ट्रगान के लिए भी खड़े नहीं हुए। यहां से बाहर निकलें,”  ऐसी भी बात उस भीड़ में एक व्यक्ति के मुंह से सुनी गयी। वीडियो में सोशल मीडिया में तीखी प्रतिक्रियाएं दी गई हैं, जिसमें वीडियो पर समर्थन और विरोध दोनों में राय दी गई है।

 

 

कानून क्या कहता है ?

जस्टिस दीपक मिश्रा और अमिताव रॉय की पीठ ने 30 नवंबर, 2016 को सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया कि मूवी शो से पहले सभी सिनेमा हॉल में राष्ट्रगान बजाना अनिवार्य है। अपने निर्णय में सुप्रीम कोर्ट ने कहा “प्रतिबद्ध देशभक्ति और राष्ट्रवाद” की भावना जगाने के लिए यह आदेश आवश्यक था।” आदेश में कहा गया कि “हॉल में उपस्थित सभी लोग राष्ट्रगान के प्रति सम्मान दिखाने के लिए खड़े होने के लिए बाध्य हैं।”

हालाँकि सिनेमा हॉल में राष्ट्रगान बजाने के अनिवार्य दिशा निर्देश को सुप्रीम कोर्ट ने 9 जनवरी, 2018 को वापस ले लिए। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि मूवी शो से पहले सिनेमाघरों में राष्ट्रगान बजाना वैकल्पिक है। यह फैसला केंद्र सरकार के उस अनुरोध पर आधारित था, जिसमें सरकार ने राष्ट्रगान बजाने पर दिशा निर्देशों को लागू करने के लिए एक समिति गठित करके इस आधार पर सुप्रीम कोर्ट से आदेश को संशोधित करने का अनुरोध किया था।

सुप्रीम कोर्ट के इस निर्णय को वापस लेने वाली पीठ में न्यायमूर्ति डी वाई चंद्रचूड़ उस पीठ का हिस्सा थे। उन्होंने फिल्म देखने वालों के लिए राष्ट्रगान बजाने के औचित्य पर सवाल उठाते हुए मौखिक टिप्पणियां कीं। जस्टिस चंद्रचूड़ ने पूछा, “कल, सिनेमा हॉल में जाने के दौरान लोगों को शॉर्ट्स और टी-शर्ट पहनने से रोकने की मांग हो सकती है, क्योंकि राष्ट्रगान बजाया जा रहा है। इस तरह की मॉरल पुलिसिंग का अंत कहां है?” न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ ने कहा, “हमें यह क्यों मानना ​​चाहिए कि यदि आप राष्ट्रगान बजाने के दौरान खड़े नहीं होते हैं तो आप देशभक्त नहीं हैं?”

राष्ट्रीय गौरव का अपमान निवारण अधिनियम, 1971 की धारा 3 के अनुसार, “जो कोई भी जानबूझकर भारतीय राष्ट्रगान के गायन को रोकता है या इस तरह के गायन की किसी भी सभा में गड़बड़ी का कारण बनता है, उसे एक अवधि के लिए कारावास की सजा दी जाएगी, जिसका विस्तार तीन साल हो सकता है, या जुर्माने के साथ, या दोनों के साथ। ” इस कानून में राष्ट्रगान के दौरान कहीं भी ‘बैठे’ या ‘खड़े’ होने का उल्लेख नहीं है। जैसा कि प्रावधान से देखा जा सकता है कि यह उस व्यक्ति को दंडित करता है जो जानबूझकर “राष्ट्रगान को रोकता है” या “राष्ट्रगान के गायन में लगी किसी भी सभा में गड़बड़ी का कारण बनता है।” इसलिए राष्ट्रगान के दौरान खड़े नहीं होने को राष्ट्रीय गौरव का अपमान निवारण अधिनियम, 1971 के तहत अपराध के रूप में नहीं माना जाता है।

हालाँकि सुप्रीमकोर्ट सुप्रीम कोर्ट का स्पष्ट निर्देश है कि किसी व्यक्ति को कार्यकारी आदेशों के अनुसार तब सम्मान दिखाना चाहिए, जब राष्ट्रगान बजाया जाए या गाया जाए।

गृह मंत्रालय ने भी इस संबंध में एक निर्देश जारी किया है: “जब भी राष्ट्रगान गाया जाता है या बजाया जाता है तो दर्शक सावधान की मुद्रा में खड़े होंगे। हालांकि, जब समाचार रील या वृत्तचित्र के दौरान राष्ट्रगान को फिल्म के हिस्से के रूप में बजाया जाता है तो दर्शकों से खड़े होने की अपेक्षा नहीं की जाती है, क्योंकि यह फिल्म की प्रदर्शनी को बाधित करने के लिए बाध्य करेगा और राष्ट्रगान की गरिमा बढ़ाने के बजाय अव्यवस्था और भ्रम पैदा करेगा।”

सीधा सीधा अर्थ क्या है ?

राष्ट्रीय गौरव का अपमान निवारण अधिनियम, 1971 – राष्ट्रगान के गायन के दौरान खड़े होने से इनकार करने पर दंडित नहीं करता है लेकिन सुप्रीम कोर्ट के आदेश का उल्लंघन हो सकता है। यह भी ध्यान दिया जा सकता है कि सुप्रीम कोर्ट ने ऐसे व्यक्तियों को छूट दी है जो शारीरिक रूप से अक्षम है जैसे व्हील चेयर उपयोगकर्ता,ऑटिज्म से पीड़ित, मस्तिष्क पक्षाघात पीड़ित व्यक्ति, मल्टीपल डिसेबिलिटी, पार्किंसन, मल्टीपल स्केलेरोसिस, कुष्ठ रोग, मस्कुलर डिस्ट्रॉफी और बहरे और दृष्टिहीन हैं।

तर्कसंगत का तर्क

राष्ट्र के सम्मान के प्रतिक के रूप में राष्ट्रगान का सम्मान अनिवार्य है और होना भी चाहिए। मगर इसके साथ राष्ट्रगान बजाने वाले जगह की भी एक गरिमा, एक संवेदनशीलता होनी चाहिए, आज तक सरकारी कार्यालय में दिन की शुरुआत राष्ट्रगान के साथ शुरू होते देखि है? अगर हमारे विद्यालयों को छोड़ दिया जाए तो इसके बाद हमें राष्ट्रगान साल में दो दिन ही बजते मिलते हैं, लेकिन सिनेमाघरों में ये हर शो के समय बजना अनिवार्य है, यानी हर दो घंटे में पब्लिक देशभक्त होने का सबूत देते दिखती है। बेहतर ये हो कि राष्ट्रगान को ऐसी जगहों में बजाने से बचे जिस जगह की संवेदनशीलता हम सब के ज़ेहन में वैसी नहीं है जो उसे बजाने के लिए उपयुक्त हो, और अगर सिनेमाघर उसके लिए उपयुक्त है तो जल्द ही पब, होटल बार इत्यादि में भी राष्ट्रगान का बजाना अनिवार्य कर दिया जाए।

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