मेरी कहानी

मेरी कहानी: गौरैया गायब हो रही है! क्योंकि उसे घोंसला बनाना नहीं आता

तर्कसंगत

October 31, 2019

SHARES

हम बाहर जा रहे थे. कार आधा रास्ता तय कर चुकी, तभी मुझे खुटका-सा हुआ. बिटिया से पूछा- ‘तुमने खिड़की बंद तो नहीं कर दी!’ ‘हां’. ये बोलने के साथ ही उसका चेहरा कुम्हला गया था. हम तुरंत वापस लौटे. घर पहुंचे तो देखा- गौरैया का जोड़ा खिड़की के बाहर इंतजार में था. एक चिड़िया रह-रहकर खिड़की के कांच पर चोंच मारती. अंदर पहुंचकर मैंने तमाम खिड़कियां खोल दीं. जोड़ा सांय से अंदर आया और अपने बच्चों को दाना देने लगा. चहचहाहट से मेरा पूरा घर भर गया था. उसके बाद खिड़कियां कभी बंद नहीं हुईं.

 

 

गर्मियों में नानी के घर जाते तो रात में आंगन में सोते. खूब अच्छी तरह से लिपा हुआ लंबा-चौड़ा आंगन, जहां कई पेड़ होते. उन्हीं के इर्द-गिर्द चारपाई बिछती. सुबह एक साथ कई आवाजों से नींद खुलती. बड़ों की बातों, मां-मौसियों की हंसी, रसोई की खटर-पटर और गौरैया की आवाज. किसी पंक्षी को सबसे पहले और सबसे करीब से जाना तो वो है गौरैया. दिनभर आंगन में उनकी चहचहाहट गूंजती. मिट्टी के एक सकोरे में उनके लिए पानी भरा रहता. एक सकोरे में टूटे चावल रखे होते. वो दरअसल परिवार की सदस्य हुआ करतीं, जिनका बिछावन हमसे छोटा होता था. बस.

वक्त बीता. मैं कॉर्पोरेट जगत का हिस्सा बन चुका था. दिन मीटिंग्स में बीतता. रात उनकी तैयारियों में. अहमदाबाद में अपना घर सजाया. घर में खूब पेड़-पौधे भी लगाए, तब भी कोई कमी थी जो खटकती थी. सोचता, फिर बिसर जाता. काम के सिलसिले में एक रोज सफर पर था. सफर में ही एक मैगजीन दिखी. उसके कवर पर एक चिड़िया चहक रही थी. घोंसले में मुंह खोले छोटे-छोटे बच्चे एक-दूसरे से चोंच लड़ा रहे थे. देखते ही मैगजीन मैंने लपककर उठा ली. आर्टिकल पढ़ना शुरू किया. वो गायब होती गौरैया के बारे में था.

लौटा तो लैपटॉप, फाइलें अलग रख दीं और गौरैया को घर बुलाने की तैयारी करने लगा. मैंने गत्तों से घोंसला बनाया. उसपर रंग किया. बच्चे देख रहे थे कि पापा ऑफिस का काम छोड़कर गत्ते-रंग लिए बैठे हैं. उन्हें भी मजा आ रहा था. हमने मिशन- गौरैया शुरू किया. मिट्टी के सकोरे लाए गए, उनपर दाना-पानी रखा. हम रोज सुबह आंखें खोलते और सबसे पहले बगीचे का जायजा लेते. बचपन मानो लौट आया था. बस, गौरैया का आना बाकी था. एक रोज तड़के ही उठ गया. देखा तो गौरैया के कई जोड़े बगीचे में थे. मैं बिना कोई खटका किए देखता रहा और लौट आया. जोड़े बढ़ते गए. अब मेरे बगीचे में अलग-अलग मौसमों में लगभग 26 तरह के पंक्षी आते हैं.

 

 

गौरैया गायब हो रही है! क्योंकि उसे घोंसला बनाना नहीं आता. वो बसने के लिए हमेशा किसी संद (कोने) की खोज में रहती है. जैसे घर का वेंटिलेटर या कोई ऐसा कोना, जहां आहटें कम से कम हों.
उसी जगह ये कुछ फूस-तिनके रख देती है और उसे ही अपना घर मान लेती है. अब अपार्टमेंट होते हैं. कोनों की गुंजाइश कम से कम. चौकोर-आयताकार डिब्बों की शक्ल में बने घरों में गौरैया का घर खो गया है. कहीं अगर वो फूस-तिनके रखने की गुस्ताखी कर भी ले तो तुरंत वो ‘कचरा’ डस्टबिन में चला जाता है. काफी कुछ पढ़ा. कुछ अपने ही बगीचे में आ रहे पंक्षियों को देख-देखकर समझा.
साल 2008 से स्कूलों में जाकर वर्कशॉप लेने लगा. बच्चों को गत्ते के बेकार डिब्बों को तोड़-मोड़कर घोंसला बनाना सिखाता. सब मिलकर उन्हें रंग-रोगन करते. उन्हें बताता कि गौरैया का होना हमारे लिए कितना जरूरी है. धीरे-धीरे बच्चे और फिर बड़े भी जुड़ने लगे. स्कूल- कॉलेज से होता हुआ ये सिलसिला बढ़ता चला गया. अब तो ऑनलाइन भी घोंसले मंगाए जा सकते हैं. हालांकि मेरा मानना है कि घर पर ही घोंसला तैयार करना सबसे बढ़िया है.

हमारे आसपास कोई भी चीज निकम्मी नहीं है. बच्चों से कहता हूं कि अपनी कल्पना को छुट्टा छोड़ दो और फिर घोंसला सजाओ. साइज और कुछेक बातें भर याद रखनी हैं.

 

 

 

मैंने फाइनेंस में एमबीए किया और फिर सालों तक कॉर्पोरेट कंपनियों के साथ काम किया है. 9 घंटे की नौकरी के बाद मेरा बाकी वक्त पंक्षियों को घरों में वापस लौटाने पर खर्च हो रहा है. एक बच्चे ने मेरा नामकरण किया था. दो साल पहले की बात है. मैं एक स्कूल पहुंचा था. प्रिंसिपल ने बच्चों से पूछा- इन्हें जानते हो. तभी एक बच्चे ने जोश से कहा- हां, ये स्पैरो मैन हैं. तब से ही ये नाम ऐसे जुड़ा कि खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मन की बात में इसका जिक्र किया. अब अहमदाबाद में मैं अपने असल नाम से कम और इस नाम से ज्यादा पहचाना जाने लगा हूं. आपके स्मार्टफोन पर सबसे बढ़िया अलार्मक्लॉक से कहीं प्यारी है इसकी चहचहाहट.

 

 

बित्तेभर की चिड़िया पर गुस्सा होने वाले लोगों से भी मेरा पाला कई बार पड़ा. ‘पिछले साल की बात है. मैं एक वर्कशॉप ले रहा था. तभी किसी ने हाथ ऊपर उठाया. वर्कशॉप के दौरान सवाल-जवाब भी होते रहते हैं. मैंने उनतक माइक पहुंचाने का इशारा किया. माइक हाथ में लिए वो शख्स एकदम से फफक पड़ा. थोड़ा संभलने के बाद उसने जो बताया, वो कोई नई बात नहीं थी लेकिन तब भी हैरानी की बात तो थी. उसने बताया कि उसके घर अक्सर गौरैया आती. जल्द ही कुनबा बढ़ने लगा. साथ में कचरा भी. आसपास तिनके, रुई, घास-फूस बिखरे दिखते. ये सब तो फिर भी चल जाता था लेकिन चहचहाहट को कैसे रोकें. लिहाजा वो शख्स चिड़िया-मार हो गया.’ उसने बताया- मैं पूरी घेरबंदी करता. खिड़की-दरवाजे बंद कर देता और फिर उन्हें मार दिया करता. धीरे-धीरे मेरे घर पर उनका आना एकदम बंद हो गया. अब मुझे उनका न होना अखरने लगा है.
गौरैया से लगभग नफरत करने वाला वो शख्स वर्कशॉप में ये जानने पहुंचा था कि उन्हें वापस कैसे बुलाए.

मैंने बच्चों को घर के बेकार पड़े कार्टून बॉक्स से घोंसला बनाना सिखाया है. मेरी यह कोशिश है कि मैं ये कला, सोच आपने वाली पीढ़ी में संजो दूँ, जिससे भविष्य में हम गोरैया के प्रति संवेदनशील हो. अपनी इन कोशिशों को संजो कर और आने वाली पीढ़ियों के सुपुर्द करने के लिए मैंने दो किताबें भी लिखी है.

 

 

आज मेरे मार्गदर्शन में देश की अलग-अलग यूनिवर्सिटी के छात्र अपने कई शोध कार्यों और प्रोजेक्ट्स पर काम कर रहे हैं. उड़ीसा, हरियाणा आदि से कई छात्र, जो कि जीव विज्ञान का अध्ययन कर रहे हैं, वे अक्सर मुझसे सलाह लेते हैं। साथ ही CEPT, NID जैसे संस्थानों के बच्चे अपने आर्किटेक्ट प्रोजेक्ट्स के लिए मुझे संपर्क करते हैं.

अब तक मैं 100000 से भी ज़्यादा घोंसले लोगों को बाँट चुका हूँ अगर इन घोंसलों में से 10% भी यदि कामयाब होते हैं तो समझूंगा कि हमारा काम हो गया.

मुझे हाल ही में अमेरिका में आयोजित ग्रीन स्कूल कांफ्रेंस में आमंत्रित किया गया जहाँ मुझे अपने इस प्रयोग को दुनिया से साझा करने का अवसर मिला.

 

 

इसके साथ ही साथ मेरा कार्यक्रम अमेरिका के एक चैनल पर भी प्रसारित किया गया जहाँ मेरे अनुभव और मेरे किताबों के बारे में चर्चा की गयी.

 

 

अपने जीवन के इस मुहीम या यूँ कहूं कि प्रयोग में मैंने ये पूरी कोशिश की है कि जैसा बचपन मैंने जिया है, जो बचपन की यादें मेरी ताज़ा हुई हैं उन्हीं सब यादों और पलों को मैं आने वाले पीढ़ियों को दोबारा दे सकूँ. गौरैया जैसी पक्षी के साथ हम सभी की बचपन की यादें जुड़ी हैं क्यूंकि वो हममरे घर का एक हिस्सा हुआ करती थी.

मेरी यही गुज़ारिश है कि आप भी अपने आस पास घर में बाग़ बगीचे में कुछ ऐसे उपाय करें की वो चहचहाहट आपके कानो में दोबारा सुनाई दे. अगर इसके लिए आपको मेरी मदद की ज़रूरत है तो मुझे बड़ी ख़ुशी होगी आप मुझसे निःशुल्क विचार विमर्श करने के लिए मेरे फेसबुक पेज पर सम्पर्क कर सकते हैं.

 

 

अपने विचारों को साझा करें

संबंधित लेख

लोड हो रहा है...