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वैदिक वन पद्धति के ज़रिये इंडियन ऐमज़ॉन बना रहे हैं रोहित मेहरा

तर्कसंगत

November 7, 2019

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दिल्ली और आस पास के राज्यों में ठंड के मौसम के आने के साथ ही प्रदूषण की समस्या अपने चरम पर होती थी, मगर इस साल प्रदूषण का आलम ये है कि सरकार हर तरह के कदम उठा रही है मगर प्रदूषण कम होने का नाम नहीं ले रहा. चाहे ऑड इवन पालिसी हो या कंस्ट्रक्शन  या कचरे को जलाने पर जुर्माना लगाना हो साथ ही साथ पराली जला रहे किसानों पर जुर्माना लगाना हो, दिल्ली सरकार हर तरह के प्रयास कर रही है जिससे प्रदूषण पर रोक लग सके. क्या सरकार के इतने सारे कदम से हम और आप अगले साल के लिए निश्चिंतो सकते हैं कि प्रदूषण अगले साल कम रहेगी? क्या हम और आप मान ले कि एक मात्र ऑड इवन और पराली जलने से रोकने से ये समस्या खत्म हो जाएगी? नहीं न. फिर हम ऐसा क्या करें कि अगले साल दिल्ली और आस पास की आबोहवा हम इंसानों के लायक बनी रहे?

इन सारे सवालों का जवाब रोहित मेहरा के पास हैं जो एक इनकम टैक्स अधिकारी है, मगर उन्हें ख्याति इस कारण से नहीं प्रकृती को बेहतर बनाने के लिए मिली है. लुधियाना के रहने वाले रोहित मेहरा समय समय पर पर्यवरण के प्रति अपनी जागरूकता से लोगों को भी जागरूक और संवेदनशील बनाते हैं चाहे वो पुराने बेकार बोतलों से वर्टीकल गार्डन तैयार करना हो या सीड बॉल बना कर जगह जगह आसानी से पेड़ पौधे लगाना हो.

 

 

 

अपनी इस लग्न और पर्यावरण के प्रति कटिबद्धता के कारण उन्होनें इस बार कुछ नया करने का प्रयास किया और परिणाम इतने अच्छे रहे कि अगर दिल्ली और आस पास के राज्य अगर अपनाएं तो प्रदुषण और गिरते जल स्तर की समस्या दोनों का समाधान 1 से डेढ़ साल में हासिल किया जा सकता है.

 

वृक्ष आयुर्वेद और मियावाकि तकनीक का सफल प्रयोग

रोहित मेहरा ने अपनी कोशिश में नए नए तकनीक का इस्तेमाल तो करते ही हैं, साथ थी भारतीय ग्रंथों का भी अध्ययन कर उनमें दिए उपायों का भी सफलतम प्रयोग करते हैं, इसी चीज़ का नतीजा है कि आज उन्होनें 25 से ज़्यादा मानवनिर्मित जंगल बना चुके हैं. तर्कसंगत से बात करते हुए रोहित बताते हैं ” मैंने अपने इस प्रोजेक्ट में कई सारी कठिनाइयों का सामना किया जिससे मुझे नए नए तकनीक और पुराने सफल तकनीक को खोजने का जूनून मिला, इसी का नतीजा है कि आज मैं 26 से ज़्यादा जंगल तैयार कर चूका हूँ.”

इन मानवनिर्मित जंगल के लिए रोहित पांच बड़े पेड़ के साथ पांच लत्तर वाले पेड़ लगाते हैं, पांच बड़े पेड़ जैसे नीम, आमला, बरगद, पीपल, अशोक होते हैं और लत्तर वाले पेड़ों को इन बड़े पेड़ों के बीच में लगाना होता है और तकरीबन एक दूसरे से 2.5 फ़ीट की दुरी पर लगाया जाता है.

 

 

10 रूपये प्रति वृक्ष से भी कम है लागत

अपने अनुभव को साझा करते हुए रोहित बताते हैं कि इस तरह के जंगल बनाने में ज़्यादा खर्च भी नहीं आता. सबसे पहले तो 400 से 500 वर्गफीट की जगह में जंगल तैयार हो जाता है. जिन जिन पेड़ों का इस्तेमाल किया जाता है उनके दाम भी कुल मिलाकर 100 रूपये से ज़्यादा नहीं होता. और जहाँ तक रही बात पौधों की देख रेख की तो उसमें भी आपको अमली बातों का ध्यान देना होता है वो भी केवल 6 महीने के लिए उसके बाद ये जंगल  खुद ब खुद बढ़ती चली जाती है. तो कुल मिलाकर कोई भी व्यक्ति या संस्था जो अपने आस पास प्रदूषण को कम और हवा को साफ़ रखना चाहते हैं तो ये कीमत ज़ायदा बिल्कुल भी नहीं.

 

 

इन पौधों को सलीके से लगाने के बाद आपको केवल इन्हें जानवरों से बचाना होगा, पानी से सिंचाई की व्यवस्था करनी होगी, अपन घर के गीले कचरे और पराली खाद का काम करते हैं और ये सब कुछ केवल आपको 6 महीने तक ध्यान में रखना है. ये जानकार हैरानी होगी कि इन जंगल को सही से लगाने के बाद ये सामान्य से 10 गुना ज़्यादा तेज़ी से बढ़ते हैं और 30 गुना ज़्यादा घना होता है.

 

शुरू में लोगों को तैयार करने की दिक्कत

तर्कसंगत के साथ रोहित बात करते हुए कहते हैं कि शुरुआत में लोग अपनी ज़मीन में जंगल लगाने देने से कतराते थे, मगर जब उन्हें लकड़ी के दाम का प्रलोभन दे कर समझते तो वो मान जाते, मगर आश्चर्य की बात ये है कि अब जब 6 महीने बाद भी जंगल बन कर तैयार हैं तो लोग अब उसे लकड़ी के पैसों के लिए काटना नहीं चाहते.

रोहित मेहरा तर्कसंगत को बताते हैं कि लोग अपने पूर्वजों के नाम पर भी ये पंचवटी जंगल लगा रहे हैं और एक बार ऐसा करने के बाद उन्हें ये प्रतीत होता है कि वो अपने पूर्वजों की ही छत्र छाया में स्वच्छ सांस ले रहे हैं. ज़ाहिर है पूर्वजों के नाम से जंगल लग जाने के बाद लोगों में इन पेड़ों के लिए भावनात्मक रिश्ता बन जाता है, और यहीं रोहित मेहरा जी की कोशिश सफल हो जाती है क्यूंकि अब इसके बाद ये सोच भावनात्मक रूप से बन जाती है कि वो उन पेड़ों में अपने पूर्वजों को देखता है.

 

 

रोहित मेहरा ने अमृतसर, लुधियाना, जीरा, गुडगाँव, सूरत, बरोदा, कपूरथला आदि जगहों पर लोगों के फैक्ट्रीज, घरों,खाली ज़मीनों, फार्म हाउस में ये जंगल लगा चुके हैं. इन सारी जगहों पर इनके साथ कुछ दिलचस्प किस्से भी जुड़े हैं. एक किस्से के बारे में बात करते हुए रोहित तर्कसंगत को बताते हैं कि एक मशहूर राइस ब्रान के तेल कंपनी के मालिक ने कारखाने से निकलने वाली प्रदूषण को कम करने के लिए इन्हे अपनी कंपनी के कैंपस में जगह दी वो भी मुफ्त में जिससे कि वो जगह आज मजदूरों के काम करने के लिए भी अधिक अनुकूल बन गया है और वह का वातावरण स्वच्छ हो चुका है.

 

वृक्ष आयुर्वेद की महत्व को लोगों ने समझा

लुधियाना के बड़े व्यापारी की माँ को सांस की तकलीफ थी और उससे निजात पाने के लिए उन्होनें रोहित को अपने फार्म हाउस में जगह दिया और इनके बताये उपायों से अगले 6 महीने वह के भरा पुरा जंगल था जिसके बीच में उसने रहने के लिए छोटा सा कॉटेज भी बनवाया जिससे कि उनकी माँ को अब सांस की तकलीफ में सुधर हो रहा है.

 

 

ऐसा नहीं की जो समाज में ज़्यादा संभ्रांत हैं वही इस उपाय का फायदा उठा रहे हैं. रोहित ने ऐसी ही एक बात की मिसाल तर्कसंगत को भी बताई। एक प्राइवेट स्कूल के पास ये अपनी पेड़ लगाने की मंशा को लेकर पहुंचे मगर स्कूल के पास पर्याप्त जगह नहीं थी, वहीँ दूसरी ओर एक सरकारी स्कूल के पास जगह थी मगर  दूसरी तफ सरकारी स्कूल के पास पर्याप्त जगह थी जंगल लगाने और 6 महीने तक उसकी देख रेख के लिए पैसे नहीं थे. रोहित मेहरा ने दोनों स्कूल से बात कर सरकारी स्कूल में जगह दिला दी और प्राइवेट स्कूल उसका खर्च उठने को तैयार हुआ.

 

 

अपनी इस कोशिश को आगे बढ़ाने के लिए रोहित मेहरा CII से भी संपर्क में हैं जिससे ज़्यादा से ज़्यादा कारखाने अपने कैंपस में ये जंगल लगाए जा सकें. कई सारी कंपनियां भी उन्हें अपने यहाँ आमंत्रित किया है जिससे वो पर्यावरण में अपने द्वारा फैलाये गए प्रदूषण को कम कर सकें.

इस बात को हम सभी लोगों को समझना होगा जिससे आने वाली पीढ़ी स्वस्थ और स्वच्छ वातावरण में सांस ले तो शुरुआत हमें अपने घर, गली, मोहल्ले से करनी होगी और इस बदलाव को यथार्थ रूप में लाने के लिए रोहित मेहरा सभी की मदद कर रहे हैं. आप चाहें तो उनसे फेसबुक पर संपर्क कर अपने पूर्वजों के नाम पर यह जंगल लगा सकते हैं.

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