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जानिए कि अयोध्या मसले के दोनों पैरवीकारों के आपसी रिश्ते कैसे थे?

तर्कसंगत

Image Credits: Asset Type/Jagran

November 12, 2019

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आम तौर पर बाबरी मस्जिद, अयोध्या का नाम आते ही हम सब की भौहें तन जाती है, अमूमन हम किसी एक के पक्ष या विपक्ष में अपने मत को बनाये रखते हैं, और बहुत उदार हुए तो इस मुद्दे से पल्ला झाड़ने की कोशिश करते हैं. क्यूंकि लगता है कि किसी भी एक पक्ष के साथ खड़े होंगे तो दूसरे से दुश्मनी मोल लेंगे। अब सोचिये अगर हम या आप खुद इस केस का हिस्सा होते तो क्या अपने विपक्षी से कभी सीधे सीधे बिना किसी विवाद के मिल पाते। क्या या मुमकिन होता कि केस की सुनवाई के लिए पक्ष और विपक्ष की पार्टी एक ही रिक्शे पर मुकदमे की सुनवाई के लिए जाए?

जहाँ सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर दुनिये भर की नज़रें टिकी थी और ट्विटर पर #AyodhyaVerdict पूरे दिन ट्रेंड कर रहा था, इस मुद्दे और विवाद से हमें एक ऐसी कहानी भी मिलती है जो हम सबके दिल में हर रोज़ ट्रेंड करनी चाहिए। वो कहानी है अयोध्या मामले में  मुक़दमे की पैरवी करने वाले अयोध्या के दो लोगों की अटूट दोस्ती का जी हाँ और ये दो लोग हैं हाशिम अंसारी और रामचंद्र परमहंस.

अयोध्या में दिगंबर अखाड़े के महंत रहे रामचंद्र परमहंस और अयोध्या क़स्बे के रहने वाले एक सामान्य दर्जी हाशिम अंसारी एक दूसरे के ख़िलाफ़ इस मुक़दमे की आजीवन पैरवी करते रहे लेकिन ये दुश्मनी ज़मीन पर कभी नहीं दिखी सारी नाराज़गी कागज़ी ही थी.

जहाँ अयोध्या के इस स्थानीय मसले को देश भर में वैमनस्य और हिंसा का रूप दे दिया वहीँ अयोध्या के स्थानीय लोग बताते हैं कि ये दोनों एक ही रिक्शे पर बैठकर अदालत में मुक़दमा लड़ने जाते थे.

सुप्रीम कोर्ट का फैसला आ गया सारे विवाद खत्म मगर इनकी दोस्ती की मिसाल इसी तरह से सैलून सालों तक जीवित रहनी चाहिए।

अयोध्या के स्थानीय पत्रकार महेंद्र त्रिपाठी बीबीसी को बताते हैं कि इस सांप्रदायिक सद्भाव को न सिर्फ़ दिगंबर अखाड़े के महंत सुरेश दास और हनुमानगढ़ी के महंत स्वामी ज्ञानदास समेत तमाम साधु संतों और हाशिम अंसारी के बेटे इक़बाल अंसारी ने बनाए रखा है बल्कि इसकी वजह से पूरे अयोध्या में हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच सांप्रदायिक सौहार्द क़ायम है.

साल 2016 में हाशिम अंसारी की मृत्यु के बाद उनके बेटे इक़बाल अंसारी बाबरी मस्जिद के मुख्य पक्षकार बने.

पहले की याद को ताज़ा करते हुए इक़बाल अंसारी ने बीबीसी को बताया कि उनके वालिद और महंत दोनों किसी एक जगह बैठकर ताश भी खेलते थे और जमकर हँसी-मज़ाक करते थे.

उनके मुताबिक, “होली-दिवाली, नवरात्र, ईद सभी त्योहारों पर एक-दूसरे के यहां जाना होता था. यही वजह है कि हम लोग भी अपने हिन्दू भाइयों के त्योहारों में शामिल होते हैं और वो हमारे त्योहारों में. साल 1992 में बाबरी मस्जिद गिरने के बाद कुछ बाहरी लोगों ने हमारे घर पर भी हमला किया था जिसका महंत जी ने बहुत विरोध किया था.”

हाशिम अंसारी वही व्यक्ति थे जो साल 1949 में गर्भगृह में मूर्तियां रखे जाने के मामले को फ़ैज़ाबाद की ज़िला अदालत में ले गए थे जबकि उनके ख़िलाफ़ हिन्दू पक्षकार के तौर पर दिगंबर अखाड़े के महंत रामचंद्र परमहंस अदालत पहुंचे और साल 1950 में उन्होंने वहां पूजा-अर्चना के लिए अर्जी दाख़िल की

 

जब तक रहे झगड़ों से बचाये रखा

दोनों ने दशकों तक इस मुक़दमे में एक दूसरे के खिलाफ पैरवी की लेकिन आपस में किसी तरह का बैर कभी नहीं पाला. साल 2003 में महंत रामचंद्र परमहंस की 92 वर्ष की उम्र में मृत्यु हुई .

दिगंबर अखाड़े के महंत सुरेश दास उस समय की बात याद करते हुए बीबीसी को बताते हैं , “महंत जी की मौत की ख़बर से हाशिम अंसारी को बहुत सदमा पहुंचा था. रात भर वो उनके शव के ही पास बैठे रहे और दूसरे दिन उनके अंतिम संस्कार के बाद ही अपने घर गए. वो कई दिनों तक परेशान रहे.”

रामघाट के पास रहने वाले दिनेश केसरवानी कहते हैं कि इनकी दोस्ती की वजह से अयोध्या में आज तक कभी हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच कोई झगड़ा नहीं हुआ. देश में भले इस को विवाद का मुद्दा बनाया गया हो मगर अयोध्या के स्थानीय लोगों ने कभी अपने बीच कोई वैमनस्य आने नहीं दिया.

दिनेश के मुताबिक, “अयोध्या के हिन्दू-मुसलमान आज भी सद्भाव से रहते हैं. यहां का माहौल बाहरी लोगों ने कई बार ख़राब करने की कोशिश की लेकिन ऐसी ही दोस्ती के चलते ये माहौल कभी ख़राब नहीं हो पाया.”

 

दोस्ती की धरोहर

जहाँ एक तरफ पूरा देश अयोध्या मसले को विरासत से चली आ रही विवाद की तरह देखता है इसके उलट हाशिम अंसारी और रामचंद्र परमहंस ने इसे दोस्ती की मिसाल बनाया है. रामचंद्र परमहंस के गुज़र जाने के बाद हाशिम अंसारी ने महंत ज्ञानदास से मिलकर दोस्ती की परंपरा आगे बढ़ाई और सुलह की कोशिशों को जारी रखा. साल 2016 में 96 साल की उम्र में हाशिम अंसारी की भी मृत्यु हो गई तो उस मौक़े पर महंत ज्ञानदास ने कहा कि मैंने अपना मित्र खो दिया है.”

“हाशिम अंसारी की इसी परंपरा को उनके बेटे इक़बाल अंसारी ने भी आगे बढ़ाया. कुछ दिन पहले ही रामजन्मभूमि के पुजारी महंत सत्येंद्र दास की ओर से बड़ा भंडारा किया गया था जिसमें इक़बाल अंसारी के साथ मुस्लिम समुदाय के तमाम लोग मौजूद थे.”

हाशिम अंसारी की दोस्ती न सिर्फ़ महंत रामचंद्र परमहंस से थी बल्कि अन्य साधु-संतों और महंतों से भी उनके मधुर रिश्ते थे. निर्मोही अखाड़े के महंत भास्करदास के साथ भी उनके वैसे ही रिश्ते थे और अक़्सर कई कार्यक्रमों में वो उनके साथ दिखते थे.

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