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सुप्रीम कोर्ट: मंदिर वहीं बनेगा, मगर मंदिर तोड़ कर मस्जिद भी नहीं बनी थी

तर्कसंगत

Image Credits: Wikimedia/NDTV/Twitter/NALSAR/India Today

November 12, 2019

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बीते 9 नवंबर को भारतीय इतिहास में दूसरे सबसे लम्बा चलने वाले  मुक़दमे में एक अहम फैसला सुनाया गया जिस पर पूरे देश की निगाहें टिकी थीं. सुप्रीम कोर्ट ने अयोध्या मामले में अंतिम सुनवाई करी जिसमे एक राम मन्दिर की स्थापना के लिए एक ट्रस्ट बोर्ड बनाने की अनुमति दे दी गयी, साथ ही साथ, सुन्नी वक़्फ़ बोर्ड को पांच एकड़ ज़मीन देने का भी ऐलान किया जिस पर प्रस्तावित मस्जिद बनायीं जायेगी.  इस निर्णय का स्वागत काफी मिश्रित प्रतिक्रियाओं के साथ हुआ है. 

अयोध्या का असली मसला मजहबी रंग तब लेना शुरू हुआ जब 1949 में राम लल्ला की मूर्ति को मस्जिद में चोरी छुपे स्थापित की गयी और अफवाह फैलाई थी कि श्री राम मस्जिद के प्रांगण में प्रकट हुए. जिसे सुपर कोर्ट ने भी अपने फैसले में गैरकानूनी माना है, इस एक वाकये के बाद से समुदाय के बीच तनाव बढ़ गया था जिसके चलते सरकार ने इस परिसर को एक विवादित स्थल गठित कर दिया और वहाँ पर ताला लगाया गया था. 

सन 1990 से यह आपसी रंजिश एक स्मरणार्थ विवाद में तब्दील हो गया जब जिसमे राजनीतिक ताकतों ने धर्म के नाम पर एक अलग जंग छेड़ दी. इस संगीन मामले के फैसले का दोनों समुदायों को इंतज़ार था और वो भी देश भर में क्योंकि इस एक मुद्दे को लेकर कई सारे सही गलत दावे सालों से किये जा रहे थे. अंतिम नतीजे का मिश्रित प्रतिक्रियों से सम्बोधित होना तो लाज़मी था. जहां एक ओर “जय श्री राम” की हाहाकार अभी तक गूँज रही है, वहीँ दूसरी तरफ इस फैसले से संतुष्टि नहीं मिली है.  

इस फैसले का स्वागत हिन्दुओं ने काफी उत्साह से किया. एक बहुसंख्य सम्प्रदाय के लिए ऐसा निर्णय बहुत मायने रखता है, उनकी धार्मिक श्रद्धा के लिए कोर्ट का फैसला मिसाल बन गया है. मगर सबरीमला के लिए वही समुदाय इसी सुप्रीम कोर्ट के विरुद्ध खड़ा था, बहरहाल, इस फैसले के बाद जिस तरह की परिपक्वता देखने को मिली है दोनों पक्षों से वो दर्शाता है कि भारत अब इस जिन्न के साये से बाहर निकलना चाह रहा था, और संयम और भाईचारे की मिसाल कोर्ट के फैसले से ज़्यादा दोनों पक्षों का स्वीकारना दर्शाता है. न्यूज़ 18 के समाचार के मुताबिक, कट्टरपंथी आरएसएस और भाजपा की विजय इस बात से थी कि  इस समस्या का हल संविधान के मापदंडों के प्रति किया गया. लगता है कि इसी शांत मानसिकता का असर भारतीय समाज पर भी पड़ा. 

अयोध्या तो बस एक झांकी है , काशी मथुरा बाकी है “ का जो बिगुल बजा था सन 1990 में वो अब चुप्पी साधे बैठा है. राम का नाम लेते हुए उनके भक्ति में लीन कुछ रूढ़िवादी लोगों ने 1992 में बाबरी मस्जिद को ध्वस्त कर दिया और अब इसी के खंडरों में राम का भव्य मंदिर बनेगा. हालाँकि सुपरकोर्ट ने इस कुकृत्य को भी संज्ञान में लिया और कहा कि ये गलत था. कोर्ट ने इस बात की भी पुष्टि कि बाबरी मस्जिद किसी ढाँचे को तोड़ कर बनाया गया हो ये ASI की जांच से साबित नहीं होता है. फैसले के बाद ASI के डायरेक्टर रहे भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के पूर्व  निदेशक केके मोहम्मद ने कहा है कि एएसआई की ओर से दिए गए सबूतों के आधार पर ही कोर्ट इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि यहां पर एक भव्य मंदिर था. उन्होंने कहा कि यहां पर एक बार फिर से मंदिर ही बनाना चाहिए.

वरिष्ठ इतिहासकार रोमिला थापर द हिन्दू प्रकाशन में यह ज़ाहिर किया कि सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले ने इन कट्टरपन्तियों को मस्जिद को एक खंडर तक सीमित करने के लिए कोई सजा नहीं दी गयी और उस पर मंदिर बनाने की अनुमति भी दी गयी. उनका ये भी कहना है, “इस विवाद के ऐतिहासिक तथ्यों को बिल्कुल नज़रअंदाज़ करते हुए कोर्ट ने धर्मिक भावनाओं को तवज्जो दी है, हमारे न्यायतंत्र पर और भरोसा तब ही होगा जब उनका फैसला आस्थाओं से ज़्यादा तथ्यों के बलबूते पर होगा.”

ऐसा निर्माण अल्पसंख्यकों के लिए एक निराशाजनक सन्देश तो था ही साथ ही एक राहत भरा भी फैसला रहा जहाँ उन पर अब ये तोहमत कोई नहीं लगा सकता कि बाबर ने मंदिर तोड़ कर मस्जिद बनवायी थी. पूर्व न्यायधीश ए के गांगुली ने इंडिया टुडे को दिए अपने साक्षात्कार में ये खा की “ये निर्णय सुनके मुझे बहुत दुःख पहुंचा है, हमारी संविधान पूरी जनता को इन्साफ देने की बात करता है पर आज इन्होनें अल्पसंख्यकों को कोई न्याय ही नहीं दिया” हैदराबाद के जाने माने लॉ कॉलेज NALSAR के कुलपति फैज़ान मुस्तफा ने  द प्रिंट को बताया कि अगर इस भूमि को बराबर हिस्से में बांटा  जाता ऐसा फाइल्स आगे के समय में काफी दिक्क्तें ला सकता है.  उन्होनें आगे कहा “कोर्ट कहती है कि 1528 से 1856 के बीच नमाज़ होने का प्रमाण पेश नहीं किया जा सका.1528 से लेकर 1857 का काल तो मुस्लिम शासन का था. उस समय में तो वहां निश्चित तौर पर नमाज हो रही होगी. कानून के जानकार के तौर पर मुझे फैसले में विरोधाभास लगता है.” अदालत ने व्यावहारिक समझ दिखाई है और इतने बड़े मसले को हल कर दिया है लेकिन कानून के शासन के लिए, धर्मनिरपेक्ष संवैधानिक लोकतंत्र के लिए यह फैसला कानून के प्रावधानों के अनुरूप नहीं लगता है.

बहरहाल इस मामले में अगर ये कहा जाये कि भीतरी परिसर को लेकर हिन्दू और मुस्लिम पक्ष में विवाद होते रहे. 16 दिसंबर 1949 तक नमाज़ भी होती रही. मगर फैसले के समय बाहरी परिसर पर हिन्दुओं के लगातार कब्ज़े के आधार पर ही उनके पक्ष में फैसला हुआ तो गलत नहीं होगा.

इंडियन एक्सप्रेस के एक रिपोर्ट में ये भी बताया गया है कि अभी के लिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने काशी और मथुरा पर कोई ज़ोर ना देने का दावा किया है. 

 

तर्कसंगत का तर्क

तर्कसंगत इस सोच के साथ अपने शब्दों पर विराम लगाएगा कि इस फैसले में अच्छी बात ये है कि दोनों हो पक्षों ने इस फैसले को सहर्ष स्वीकार किया तारीफ वक़्फ़ बोर्ड की ज़्यादा बनती है क्यूंकि फैसला उनके विरुद्ध ही माना जायेगा, उसे देखते हुए कोई भी अप्रिय घटना या भड़काऊ ब्यान किसी भी तरफ से नहीं आये.  यह समय देश के आम लोगों की भी ज़रूरतों पर ध्यान देने का है.अयोध्या में मंदिर बनने से पहले इस शहर के ज़रूरतों पर भी ग़ौर करना है. वहां के लोगों के लिए रोज़गार, शिक्षा, स्वास्थ्य, के लिए क्या सुविधाएं हैं जमीनी स्तर पर? भगवान राम और उनके नाम पर वोट बटोरना अब शायद बंद हो. हम उम्मीद करते हैं कि अब अयोध्या, केंद्र और देश अपनी सही ज़रूरतों पर ध्यान केंद्रित करेगा. निदा फ़ाज़ली का एक शेर इस पूरे मसले का लब्बोलुआब पेश करता है और बताता है कि असल इबादत या प्रभु की सेवा है क्या :

घर से मस्जिद है बहुत दूर चलो यूँ कर लें
किसी रोते हुए बच्चे को हँसाया जाए

 

लेखिका : आकांक्षा सक्सेना

 

 

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