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उज्जैन: 20 करोड़ की लागत से बना जिला अस्पताल और ट्रामा सेंटर बन के रह गया है रेफरल अस्पताल

तर्कसंगत

Image Credits: Patrika

November 13, 2019

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अच्छे स्वास्थ्य की कीमत हम सभी को अच्छे से मालूम है. स्वास्थ्य सेवाओं के बढ़ते खर्च के साथ प्राइवेट हॉस्पिटल का भी खर्च हमें इस बात के लिए मज़बूर करता है कि हम सरकार द्वारा संचालित अस्पताल में इलाज कराएं। देश भर में सरकार द्वारा संचालित अच्छे अस्पतालों की गिनती ऊँगली पर की जा सकती है. इन अस्पतालों में भीड़ देश भर से आती है क्यूंकि उनके खुद के जिला अस्पताल बेहतर इलाज नहीं दे सकते.

इसी क्रम में उज्जैन के आगर मालवा जिला अस्पताल की स्थिति दयनीय अपने उद्घाटन से बनी हुई है. इस जिला अस्पताल का उद्घाटन फरवरी माह में ही सम्पन्न हुआ था. दैनिक भास्कर के रिपोर्ट की मानें तो इस पूरे जिला अस्पताल को बनाने के लिए कुल 20 करोड़ 68 लाख रूपये खर्च हुए थे. आज की तारीख में हालत ये है कि ये मात्र एक रेफरल अस्पताल मात्र बन कर रह गया है.

अस्पताल की कागजी सुविधाएं

इस नए जिला अस्पताल में 18 ओपीडी,  गाइनिक ओटी, आँख के ऑपरेशन की ओटी, दंत विभाग, सोनोग्राफी, टीबी वार्ड, कुपोषित बच्चों के लिए एनआरसी, लेबोरेटरी, रैम्प, 18 वार्ड, हर वार्ड के पास बाथरूम, एक कीचन, पैथालाॅजी, दवा वितरण कक्ष तथा 10 स्क्वेयर फीट का स्टोर रूम के व्यस्था की बात थी और कमोबेश उस आधार पर इसे बनाया भी गया। मरीजों तथा डॉक्टरों के आने-जाने के लिए दो लिफ्ट भी लगाई गई है. इसके ठीक पीछे जिला अस्पताल के पास ही 3340 वर्ग मीटर में बने ट्रामा सेंटर भी बनवायी गयी  जिसमें मेजर ओटी दो, दो आईसीयू, 16 बेड के ब्लड बैंक, हीमो डायलिसिस, पोस्ट मार्टम रूम, शिनाख्त न होने वाले शव को सुरक्षित रखने के लिए मर्चुरी का प्रावधान था.

वास्तविक सुविधाएं

ये बात हुई मोटे तौर पर इस सरकारी जिला अस्पताल में कागज़ पर उपलब्ध सुविधाओं की. अब चुकीं ये अस्पताल जिला अस्पताल बड़ौद चौराहे से ही 2 किमी है और शहर से इसकी दूरी 3 किमी से कम नहीं है. ऐसे में दुर्घटना से पीड़ित मरीज़ यहाँ अक्सर आते हैं मगर उनके शुराट्टी मरहम पट्टी कर आगे उज्जैन में रेफेर कर दिया जाता है. कुल 23 डॉक्टरों के लिए स्वीकृत पदों की जगह पर यहाँ केवल 13 डॉक्टर काम कर रहे हैं. स्थनीय लोगों के अनुसार यहाँ लगभग दिन में 500 लोग ओपीडी सेवा लेने आते ही हैं. जिनमें 8 से 10 सड़क दुर्घटना के मरीज़ होते हैं.

अस्पताल में नाक, कान, गला, हड्डी ,स्त्री रोग , एनेस्थीसिया आदि विभाग के डॉक्टर ही नहीं है तो इसलिए कोई भी ऑपरेशन यहाँ नहीं होता है. सबसे बड़ी दिक्क्त यहाँ के लोगों को तब होती है जब कोई महिला गर्भवती होती है तो उसे यहाँ से कोई उपचार नहीं मिलता अपितु उसे रेफर कर दिया जाता है. हड्डी टूटने के स्थिति में भी वही होता है क्यूंकि यहाँ कोई हड्डी से जुड़ा डॉक्टर नहीं है.

स्वास्थ्य विभाग द्वारा स्वीकृत पदों की संख्या यहाँ सारे विभागों के लिए कुल मिलकर 30 विशेषज्ञ डॉक्टरों की है मगर उपलब्ध हैं केवल 4. 26 पद सीधे सीधे तौर पर रिक्त हैं.

ये हॉल केवल इस जिला अस्पताल का नहीं इसके साथ बने ट्रामा सेंटर का भी है जहाँ संसाधनों की कमी के कारण काम सुचारु रूप से चालू नहीं हो पाया है. ट्रामा सेंटर में केवल ब्लड बैंक, एक्सरे डायलिसिस आदि की सुविधाएं चलायी जा रही हैं.

सी एस जिला अस्पताल डॉ. जे सी परमार का कहना है कि स्वीकृत 176 पदों में से केवल 74 पद पर नियुक्ति हुई है. 102 पद खाली हैं, स्टाफ नर्सों की 100 स्वीकृत पदों की जगह महज़ 60 नर्स काम कर रही हैं. वार्डबॉय के 24 पदों की जगह केवल 3 लोगों की नियुक्ति हुई है. इन सब के बावजूद उपस्ठित डॉक्टर और कर्मचारी अपनी यथसम्भव शक्ति के अनुरूप काम करते हैं और मरीज़ों को स्वयें प्रदान कर रहे हैं.

8 हजार 787 वर्गमीटर में बना जिला अस्पताल पहले 100 बिस्तर वाला था, लेकिन 26 मई 2018 में आगर दौरे पर आए तत्कालीन मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने लोगों की मांग के बाद 200 बिस्तरों का करने की घोषणा कर दी थी. संसाधन भी उसी अनुरूप जुटाए गए है, लेकिन स्टाफ की स्वीकृत संख्या जो पुराने जिला अस्पताल में थी वहीं है.

तर्कसंगत का तर्क

स्वास्थ्य सेवाओं को समाज के हर छोटे बड़े हिस्से के लोगों तक पहुँचाना मध्य प्रदेश सरकार का अंतिम लक्ष्य होना चाहिए. सरकारी ख़जाने से 20 करोड़ की लागत से बने उस अस्पताल का क्या फायदा जो महज़ रफेरल अस्पताल बन कर रह जाए. तर्कसंगत की यह भी अपेक्षा है स्थानीय सांसद और विधायकों से कि वो इस जिल अस्पताल और उससे जुड़े ट्रामा सेंटर को कार्यान्वित करने का जल्द स जल्द प्रयास करें ताकि सरकार के पैसे सदुपयोग हो और स्थानीय लोगों को राहत मिले.

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