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10 वर्षों में आठ आईआईटी में 52 आत्महत्याएं दर्ज की गईं मगर हम खामोश क्यों?

तर्कसंगत

November 18, 2019

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 हर साल देश के लाखों होनहार युवा मानसिक अवसाद ग्रसित हो कर खुदकुशी कर लेते है। ये आंकड़ा आपको चौंका सकता है कि “विश्व की 17 % जनसँख्या भारतीय है, और विश्व में होने वाली कुल आत्महत्या में से 17.5% भारत में होती है। इसका मतलब ये नहीं है कि सारे भारतीय आत्महत्या करते हैं। बल्कि सबसे उच्चतम शैक्षणिक संस्थानों में सबसे ज्यादा खुदकुशी के मामले सामने आते हैं। जैसे आईआईटी, ऐम्स और एनएलयू , जहां नामंकन के लिए कुल जमा आवेदनों में आई एआई टी की दाख़िला करने की दर 0.5% है वहीं, मेडिकल संस्थान ऐम्स जैसे कॉलेजों में नामंकन के लिए भरे गए आवेदनों के वनिस्पत दाखिला देने की दर महज 0.1% है, जो कि हावर्ड, ऑक्सफोर्ड और अम ई टी जैसे संस्थानो से काफी कम है। इस आंकड़े का मतलब केवल ये समझाना है कि इतनी सारी भारी मात्रा में फॉर्म करने पर कुछ लायक होनहार विद्यार्थी ही इन शिक्षण संस्थानों में जगह बना पाते हैं।

हाल ही में केरल के कोल्लम से आईआईटी-एम में एमए मानविकी और विकास अध्ययन की प्रथम वर्ष की छात्रा फातिमा लतीफ़ को शनिवार, 9 नवंबर को उसके छात्रावास के कमरे में फांसी पर लटका हुआ पाया गया था। उसके परिवार के सदस्यों ने उसके फोन में एक सुसाइड नोट पाया है जिसमें 19 -अय्यार ने संस्थान के संकाय सदस्यों से धार्मिक भेदभाव का आरोप लगाया है। नोट को चेन्नई पुलिस ने वापस ले लिया है।



इन आत्महत्याओं की वजह से देश भविष्य के बुद्धिजीवोंयों को खो देता हैं जो डॉक्टर या इंजिनियर बन के देश की सेवा कर सकते थे। इन आत्महत्याओं से सबसे बड़ा नुकसान दिवगंत के परिवार वालों को होता है वे ना केवल मानसिक तनाव में चले जाते है बल्कि कुछ अवसर में ये भी होता है कि परिवार का केवल एक चिराग ही इन शिक्षण संस्थानों में जा कर आत्महत्या कर बैठता है और माँ बाप अपने बुढ़ापे की लाठी खो देते हैं. जिस देश में हर एक घंटे में एक खुदकुशी की घटना होती है और हर 4 में से एक खुदकुशी का कारण अकादमिक तनाव होता है, ये उसके लिए एक चिंता का विषय है. हमारे देश में आत्महत्या अपराध है, मगर ये सोचना भी हमारी संविधान का कर्तव्य है कि कोई अपराधी क्यों बन रहा है? नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो (NCRB) ने अपने 2015 के आंकड़ों में चौंकाने वाला खुलासा किया कि भारत में हर घंटे एक छात्र आत्महत्या करता है।

सरकार से मिले 2014 के आकड़ो के अनुसर देश में ख़ुदकुशी करने वाले अधिकतर युवाओ की शैक्षिक योग्यता ग्रेजुएशन से अधिक होती है, साथ ही कुल आत्माहत्या करने वाले युवाओ में से आधे से ज्यादा पुरुष होते है। 

गौरफरमाने वाली बात ये है कि  2016 में रोहित वेमुला की आत्माहत्या की घटना के बाद तत्कालीन मानवसंसाधन मंत्री प्रकाश जावडेकर ने विश्वविद्यालयो को कुछ अति महत्वपूर्ण  निर्देश जारी किये थे जो की तत्काल प्रभाव में लागु होने चाहिए थे। 

 

  1. बेहतर उत्थान के लिए एक मजबूत प्रेरण कार्यक्रम और बाहरी छात्रों के लिए एक स्थानीय अभिभावक प्रणाली की स्थापना।
  2. छात्रों की शिकायतों पर चर्चा की जानी चाहिए और साप्ताहिक आधार पर और कुलपतियों को मासिक बैठकें आयोजित करनी चाहिए।
  3. शैक्षणिक रूप से कमजोर छात्रों के लिए उपचारात्मक शिक्षण बताते हुए कहा कि डीन को विभाग की समस्याओं की बारीकी से निगरानी करनी चाहिए।
  4. प्रभावी प्रशासन, छात्रावासों की देखरेख और छात्रावास प्रवेश नियमों का कड़ाई से अनुपालन।
  5. काउंसलिंग केंद्रों की स्थापना, छात्रों के लिए अपील की प्रणाली, विश्वविद्यालय, निगरानी समितियों और समान अवसर सेल है।

 

इसके अतिरिक्त विश्ववविद्यालयक अनुदानआयोग (UGC) 2012 के नियम भी कई सारे दिशा निर्देश इसके साथ जोड़े रखा है.  

इन सारी कवायदों के बावजूद देश के शैक्षणिक संस्थानों से ख़ुदकुशी की खबरे आती रहती है। रोहित वेमुला के के बाद एआई एआई टी  मद्रास की छात्र फातिमा लतीफ की आत्महत्या की वजह धर्म पक्षपात बताइ जा रही है।

इन सारी कवायदों और चौकाने वाले आकड़ो के सामने आने के बावजूद सरकार इन सारी  घटनाओं  से आँखे मुंदती नजर आ रही है, सवाल ये है की देश अपने भविष्य के डॉक्टरों और इंजीनियरो को कब तक खोता रहेगा?

 

RTI का खुलासा

सुप्रीम कोर्ट के वकील और मानसिक स्वास्थ्य कार्यकर्ता, गौरव कुमार बंसल द्वारा दायर एक आरटीआई ने खुलासा किया कि पिछले 10 वर्षों में आठ आईआईटी में 52 आत्महत्याएं दर्ज की गईं। आईआईटी-मद्रास 14 आत्महत्याओं के साथ सूची में सबसे ऊपर है। इस साल संस्थान से फातिमा का यह चौथा आत्महत्या का मामला था।

आरटीआई रिपोर्ट ने आगे खुलासा किया कि मानव संसाधन विकास मंत्री की अध्यक्षता में पिछली बार आईआईटी परिषद ने अप्रैल 2017 में छात्रों पर मानसिक तनाव पर चर्चा की थी। परिषद ने विभिन्न अतिरिक्त उपायों को अपनाते हुए शैक्षणिक, आकांक्षात्मक, सामाजिक और जीवन शैली की समस्याओं की पहचान की।

अजहर के अनुसार, छात्र निकाय परिषद के कार्यान्वयन की तत्काल आवश्यकता है जो आईआईटी में मानसिक स्वास्थ्य विभाग के साथ मिलकर काम करेगा। हालांकि, आईआईटी में धार्मिक भेदभाव के मामले शायद ही हों, पढ़ाई के दबाव के कारण आत्महत्या करने वाले छात्र डीम्ड संस्थान में बड़े पैमाने पर व्याप्त हैं।

फातिमा की मौत से ठीक एक दिन पहले, आईआईटी-दिल्ली की एक 18 वर्षीय छात्रा शुक्रवार को कैंपस में अपने हॉस्टल बिल्डिंग की पांचवीं मंजिल से गिर गई थी। उसने बुधवार 13 नवंबर को एम्स ट्रॉमा सेंटर में दम तोड़ दिया। हालांकि, कोई सुसाइड नोट नहीं मिला है, पुलिस ने कहा कि लड़की की मां ने कहा है कि उसकी बेटी ने घटना के दिन उसे फोन किया था और बताया था कि ‘वह अपनी पढ़ाई के कारण तनाव में’।

हर साल लगभग दो लाख छात्र संयुक्त प्रवेश परीक्षा लिखते हैं, जो देश के सबसे कठिन प्रतियोगी परीक्षाओं में से एक है, जिसमें प्रतिष्ठित आईआईटी में प्रवेश पाने का सपना देखा जाता है। लेकिन दो चरण की परीक्षा के अंत में, केवल 11000 चुने जाते हैं।

आईआईटी का टैग प्राप्त करने और बनाए रखने की कठिन यात्रा प्रवेश के साथ समाप्त नहीं होती है। यह सहकर्मी के दबाव की लागत के साथ आता है; एक साथ पढ़ाई, उदासीनता और सामान्य भेदभाव।

आईआईटी गुवाहाटी के पूर्व छात्र धवनिल पटेल के अनुसार, आईआईटी में साथियों का दबाव बहुत अधिक है और यह आत्मविश्वास और अंततः प्रदर्शन को प्रभावित करता है। पटेल ने कहा, “भले ही आप जेईई में 5,00,000 में से 1000 वें स्थान पर हों, आपके पास सबसे कम ग्रेड हो सकते हैं क्योंकि 100-सुपर-बुद्धिमान लोग आपके आसपास हैं और यह आपको एक औसत दर्जे का लगता है।”

उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि उनके समय में IIT में मेन्टल काउंसलिंग का लाभ लेना जैसे कोई चीज़ नहीं थी क्योंकि पूरे परिसर के लिए केवल एक ही कॉउंसलर हुआ करता था।

पटेल ने आगे बताया कि विदेश में बहुराष्ट्रीय कंपनियों में इंटर्न करने के लिए (साथियों, माता-पिता, संस्थान और खुद से) भी बहुत दबाव है और मोटी तनख्वाह के साथ वहां नौकरी करते हैं। अक्सर छात्रों को सिलिकॉन वैली में नौकरी पाने के लिए दौड़ लगाते देखा जाता है। कई बार ऐसा करने में असफल होने से छात्रों में अवसाद भी होता है।

 

लेखक : शेरोन सिंह 

 

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